लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
'क्रोष्टु + आम्' यहां नुट् का तृज्वद्भाव के साथ विप्रतिषेध है अतः प्रकृत-
वार्त्तिक द्वारा पूर्वविप्रतिषेध से नुट् हो नामि (१४६) से दीर्घ करने पर—'क्रोष्टूनाम्' ।
'क्रोष्टु + ङि' (इ) यहां 'इ' यह अजादि तृतीयादि विभक्ति परे है अतः विकल्प
से तृज्वद्भाव हो गया । तृज्वद्भावपक्ष में ऋतो ङि० (२०४) से अर् गुण हो कर
'क्रोष्टरि' रूप बना । तदभावपक्ष में अच्व घे (१७४) से ङि को औ तथा उकार को
अकार कर वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि करने से 'क्रोष्टौ' रूप सिद्ध हुआ ।
'हे क्रोष्टु + सु' । सम्बुद्धि में तृज्वद्भाव के निषेध के कारण तृज्वत्क्रोष्टु (२०३)
प्रवृत्त न हुआ । ह्रस्वस्य गुण (१६६) से गुण तथा एङ्घ्रस्वात्० (१३४) द्वारा
सम्बुद्धि के सकार का लोप हो कर 'हे क्रोष्टो' रूप बना । 'हे क्रोष्ट लिखना अशुद्ध
है । 'क्रोष्टु' शब्द की रूपमाला यथा—
प्रथमा क्रोष्टा क्रोष्टारौ क्रोष्टारः
द्वितीया क्रोष्टारम् ,, क्रोष्टून्
तृतीया क्रोष्ट्रा, क्रोष्टुना क्रोष्टुभ्याम् क्रोष्टुभिः
चतुर्थी क्रोष्ट्रे, क्रोष्टवे ,, क्रोष्टुभ्यः
पञ्चमी क्रोष्टुः, क्रोष्टोः ,, ,,
षष्ठी ,, ,, क्रोष्ट्रोः, क्रोष्ट्वोः क्रोष्टूनाम्
सप्तमी क्रोष्टरि, क्रोष्टौ ,, ,, क्रोष्टुषु
सम्बोधन हे क्रोष्टो ! हे क्रोष्टारौ ! हे क्रोष्टारः !
अभ्यास (३१)
(१) ऋत उत् में तपर करने का क्या प्रयोजन है ? सविस्तर टिप्पणी करें ।
(२) पूर्वविप्रतिषेध और परविप्रतिषेध किसे कहते हैं ? इन दोनों का वि-
प्रतिषेधे परं कार्यम् इस एक ही सूत्र से कैसे प्रतिपादन किया जाता है ?
(३) रातस्सस्य सूत्र की व्याख्या करते हुए इस बात को स्पष्ट करें कि नियम-
सूत्रों के प्रत्युदाहरण ही वस्तुतः उदाहरण होते हैं ।
(४) किस आन्तर्य के कारण क्रोष्टु शब्द के स्थान पर क्रोष्टृ आदेश हो
जाता है ?
(५) 'हे क्रोष्ट !' प्रयोग के शुद्धाशुद्ध होने का विवेचन करें ।
(६) सूत्रनिर्देशपूर्वक निम्नस्थ प्रयोगों की सिद्धि करें—
१ क्रोष्टु । २ ऋष्ट । ३ क्रोष्टूनाम् । ४ क्रोष्टारौ । ५ भानो ।
६ क्रोष्ट्रा । ७ शम्भव । ८ शम्भो । ९ क्रोष्टा । १० क्रोष्टरि ।
(यहां ह्रस्व उकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
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