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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 633 में से

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पृष्ठ 293

२४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अधिक अन्यत्र देखे जाते हैं। उपदेष्टृ और धातृ शब्दा को भी यहां उज्ज्वलदत्त ने
अपनी उणादिवृत्ति में गिन रखा है। सरस्वतीकण्ठाभरणकार धारेश्वर भोज, दण्ड-
नारायण, प्रक्रियासर्वस्वकार नारायणभट्ट, प्रक्रियाकौमुदी की प्रसादटीका के रचयिता
विट्ठलाचार्य और दुर्गसिंह प्रभृति इन का उल्लेख नहीं करते।
विशेष—स्वसृ, यातृ, देवृ, ननान्दृ, नृ और सव्येष्टृ ये छ शब्द भी यद्यपि
औणादिक हैं तथापि ये ऋप्रत्ययान्त हैं, तृन्नन्त वा तृजन्त नहीं। अत इन के दीर्घ या
दीर्घाभाव का यहां प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। इन में से स्वसृ शब्द का ही सूत्र में
ग्रहण है अत उसे ही उपधादीर्घ होगा अन्य किसी ऋप्रत्ययान्त शब्द को नहीं।
शङ्का—यदि नप्तृ, नेष्टृ आदि सातो शब्द पूर्वोक्तरीत्या तृन्नन्त वा तृजन्त हैं
तो इन की उपधा को दीर्घ अप्-तृन्-तृच्-स्वसृ इतने से ही सिद्ध हो सकता है, क्योंकि
सूत्र में तृन् और तृच् को दीर्घ कहा ही है। पुन सूत्र में इन के पृथक् उल्लेख का
क्या कारण है ?
समाधान—इस प्रकार सिद्ध होने पर सूत्र में इन के पुन ग्रहण का एक
महत्त्वपूर्ण प्रयोजन है। ग्रन्थकार के शब्दा में ही देखिये—
[लघु०] नप्त्रादीनां ग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम्। तेनेह न—पिता, पितरौ,
पितरः। पितरम्। शेषं धातृवत्। एवं जामात्रादयः। ना। नरौ॥
अर्थ—नप्तृ आदि तृन्नन्त वा तृजन्त शब्दो का ग्रहण व्युत्पत्तिपक्ष में नियम के
लिये है। अर्थात् यदि व्युत्पत्तिपक्ष में औणादिक शब्दो को तृन्नन्त वा तृजन्त समझा
जाये तो नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ और प्रशास्तृ इन सात शब्दो की उपधा
को ही अप्तृन् तृच्० सूत्र से दीर्घ हो अन्य किसी औणादिक तृन्नन्त वा तृजन्त की उपधा
को दीर्घ न हो। उणादिनिष्पन्नानां तृन्तृजन्तानां दीर्घश्चेद् ? नप्त्रादीनामेव, न तु पित्रा-
दीनामिति नियमोऽत्र बोध्यः।
व्याख्या—कुछ लोग औणादिक शब्दों को व्युत्पन्न और कुछ अव्युत्पन्न मानते
हैं। अव्युत्पन्न मानने वालों के पक्ष में नप्तृ आदि शब्दो में न कोई धातु और न कोई
प्रत्यय माना जाता है। अतः उन के मत में अप्-तृन्-तृच्-स्वसृ इतने सूत्रमात्र से काम
नहीं चल सकता। उन के मत में नप्तृ, नेष्टृ आदि शब्दो का उपधादीर्घविधानार्थ
ग्रहण करना आवश्यक है ही।
अब रहे व्युत्पत्तिपक्ष वाले, ये लोग औणादिक शब्दो में प्रकृति, प्रत्यय, आगम,
विकार और आदेश आदि सब यथावत् मानते हैं। नप्तृ आदि शब्दो को ये लोग
किया है। दण्डनारायण ने अपनी वृत्ति में 'अप्तृ' का अर्थ 'यज्ञ' किया है। वर्त्त-
मान उपलब्ध संस्कृत-साहित्य में इस का पता नहीं चलता। परन्तु 'अप्तोर्याम,
अप्तोर्यामन्' यादि शब्दों के देखने से प्रतीत होता है कि यज्ञ अर्थ में इस का कही
प्रयोग अवश्य हुआ होगा। इसी प्रकार 'चोर' आदि अर्थों में 'हन्तृ' शब्द के
प्रयोग भी अन्वेषणीय हैं।