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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

[१०]

किया। सूत्रकारद्वारा विस्मृत या अदृष्ट विषयों पर भी उन्होंने पर्याप्त प्रकाश डाला।१
कात्यायन को वार्त्तिककार वा वाक्यकार भी कहा जाता है। कुछ लोगों का विश्वास
है कि वार्त्तिककार एक नहीं अनेक हुए हैं, कात्यायन उन सब में अन्तिम थे। कात्या-
यन के कुछ शताब्दी बाद महामुनि पतञ्जलि ने पाणिनीयव्याकरण को परिष्कृत करने
का अपूर्व कार्य कर इस व्याकरण की कीर्तिपताका चहु दिशाओं में फहरा दी। पाणि-
नीयव्याकरण पर पतञ्जलि का लिखा महाभाष्य नामक ग्रन्थ अत्यन्त प्रामाणिक और
अपनी प्रवाहपूर्ण सरलतम शैली का अपूर्व भाष्य है। पतञ्जलि का समय पाश्चात्यों
की दृष्टि में ईसापूर्व १५० के लगभग बहुसम्मत है।
पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि ये तीनों पाणिनीय व्याकरण के प्रमुख
आचार्य या मुनित्रय कहलाते हैं। इस व्याकरण में इन का ही प्रामाण्य स्वीकार किया
जाता है। इन में भी उत्तरोत्तर मुनि पूर्वपूर्व से अधिक प्रामाणिक माना जाता है।
अत एव कहा जाता है—उत्तरोत्तर मुनीनां प्रामाण्यम्।
इस प्रकार सैकड़ों वर्षों तक पाणिनीयव्याकरण अपने असली रूप अर्थात्
अष्टाध्यायीसूत्रपाठ के क्रमानुसार पठनपाठन में प्रचलित रहा। परन्तु जब संस्कृत का
स्थान अपभ्रंश वा प्राकृत आदि भाषाओं ने लेना शुरू किया और संस्कृत केवल
साहित्य में ही प्रयुक्त होने वाली शिष्टभाषा मात्र रह गई तब लोगों को ज़रा असु-
गमता का भास हुआ। तब सूत्रक्रम के साथ प्रक्रियाक्रम का भी प्रचलन आरम्भ हुआ।
इस के फलस्वरूप पाणिनिसूत्रों का आश्रय करते हुए रूपावतार, प्रक्रियाकौमुदी,
प्रक्रियासर्वस्व, सिद्धान्तकौमुदी आदि अनेक ग्रन्थ बने। परन्तु जिस प्रकार पाणिनि
का व्याकरण अपने से पूर्ववर्त्ती सब व्याकरणों में मूर्द्धस्थानीय बन पड़ा था, ठीक उसी
प्रकार भट्टोजिदीक्षित की सिद्धान्तकौमुदी भी प्रक्रियामार्ग का सर्वोत्तम ग्रन्थ बनी।
दीक्षितजी की यह कृति प्रक्रियामार्ग की पराकाष्ठा वा चरमसीमा समझनी चाहिये।
इस में अष्टाध्यायी के समस्त सूत्रों का प्रक्रियानुसार भिन्न क्रम से समावेश है। अत
एव भारत में उन के ग्रन्थ का महान् आदर हुआ और वह पठनपाठन में शीघ्र प्रच-
लित हो गया। दीक्षितजी पाणिनीयव्याकरण में कृतभूरिपरिश्रम थे। अष्टाध्यायी-
सूत्रक्रमानुसार लिखा गया उन का शब्दकौस्तुभ नामक ग्रन्थ उन के पाण्डित्य का परि-
चायक है। भट्टोजिदीक्षित का काल ईसा की सत्रहवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता
है। ये महाराष्ट्र ब्राह्मण थे परन्तु इन का निवास काशी में था। इन के पिता का
नाम लक्ष्मीधर पण्डित तथा गुरु का नाम शेषकृष्ण था। दीक्षितजी के पुत्र भानु-
जिदीक्षित की अमरकोष पर व्याख्यासुधा नामक व्याख्या अत्यन्त प्रसिद्ध है। इन के
१. यद् विस्मृतमदृष्टं वा सूत्रकारेण तत्स्फुटम्।
वाक्यकारो ब्रवीत्येष तेनादृष्टं च भाष्यकृत् ॥
उक्तानुक्तदुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्त्तते ।
तं ग्रन्थं वार्त्तिकम्प्राहुर्वार्त्तिकज्ञा विचक्षणाः ॥

पौत्र हरिदीक्षित सुप्रसिद्ध वैयाकरण नागेशभट्ट के गुरु थे। दीक्षितजी केवल वैयाकरण
ही न थे किन्तु धर्मशास्त्र, कर्मकाण्ड आदि के भी महापण्डित थे। इन के बनाये ग्रन्थों
की संख्या ३१ बताई जाती है।
इन्ही दीक्षितजी के शिष्य वरदराज ने¹ आरम्भ से ही सिद्धान्तकौमुदी के
अध्ययन मे विद्यार्थियो की असमर्थता को देखते हुए मध्यसिद्धान्तकौमुदी (मध्यकौमुदी)
और लघुसिद्धान्तकौमुदी (लघुकौमुदी) नामक दो ग्रन्थ सिद्धान्तकौमुदी को संक्षिप्त
कर के लिखे। इन्हें सिद्धान्तकौमुदी का संक्षिप्त संस्करण भी कहा जा सकता है।
सिद्धान्तकौमुदी मे जहां पाणिनि के समस्त ३६६५ सूत्र व्याख्यात हैं वहां मध्यकौमुदी
में २३१५ तथा लघुकौमुदी मे १२७२ सूत्र गुम्फित किये गये हैं। वरदराज का ध्येय
पाणिनीयव्याकरण में बालकों को सरलता से प्रवेश कराना था। यह बात दोनों ग्रन्थों
के आरम्भ में स्वयं उन्होंने स्वीकार की है²। इन दोनों संक्षिप्त संस्करणों में लघु-
सिद्धान्तकौमुदी (लघुकौमुदी) नामक ग्रन्थ विशेषरूप से प्रचलित हुआ है। इस ग्रन्थ
से पाणिनीयव्याकरणरूप महाप्रासाद के प्रत्येक अङ्ग का संक्षिप्त पर पर्याप्त उपयोगी
परिचय छात्र को प्राप्त हो जाता है। प्रायः विद्यार्थी प्रारम्भ में एक-दो वर्षों में इसे
पढ़ कर तदनन्तर सिद्धान्तकौमुदी के अध्ययन मे प्रवृत्त हुआ करते हैं।
१. वरदराज का काल भी दीक्षितजी वाला काल है। वरदराज दाक्षिणात्य थे।
इन के पिता का नाम दुर्गातनय था। इन्होंने मध्यकौमुदी और लघुकौमुदी
के अतिरिक्त सारकौमुदी और गीर्वाणपदमञ्जरी नामक अन्य दो ग्रन्थ
भी लिखे हैं। वरदराज ने यद्यपि सिद्धान्तकौमुदी का संक्षिप्त संस्करण ही लघु-
कौमुदी बनाया है तथापि प्रकरणों की दृष्टि से लघुकौमुदी का क्रम सिद्धान्त-
कौमुदी के क्रम से बहुत श्रेष्ठ है। सिद्धान्तकौमुदी में अव्ययप्रकरण के बाद स्त्री-
प्रत्ययप्रकरण प्रारम्भ होता है, पर लघुकौमुदी में स्त्रीप्रत्ययप्रकरण सब प्रकरणों
के अन्त में रखा गया है—और यह उचित भी है, क्योंकि बिना कृत्, तद्धित और
समास आदि का ज्ञान प्राप्त किये स्त्रीप्रत्ययप्रकरण के—टिङ्ढाणञ्०, ऋन्निकारा-
दक्तिनः, द्विगोः, प्राचां ष्फस्तद्धितः, बहुव्रीहेरूथसो ङीप् आदि सूत्रों का समझना
अतीव दुष्कर है। इसी प्रकार कारकप्रकरण के विषय में भी समझना चाहिये।
कारकप्रकरणगत कर्तृकरणयोस्तृतीया, अकथितञ्च आदि सूत्र तथा अभिहित अन-
भिहित आदि की व्यवस्था बिना तिङन्त और कृदन्त प्रकरणों के ज्ञान के सम-
झनी कठिन है। अतः वरदराज ने तिङन्त और कृदन्त प्रकरणों के अनन्तर ही
कारकप्रकरण को रखा है।
२. नत्वा वरदराजः श्रीगुरून् भट्टोजिदीक्षितान्।
करोति पाणिनीयानां मध्य-सिद्धान्त-कौमुदीम् ॥ (म०कौ०)
नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम्।
पाणिनीयप्रवेशाय लघु-सिद्धान्त-कौमुदीम् ॥ (ल०कौ०)

[१२]
लघुकौमुदी वा सिद्धान्तकौमुदी पर—जहाँ तक मेरा विचार है—अभी तक
कोई आधुनिक ढंग पर विश्लेषणात्मक मर्म समझाने वाली परिष्कृत वैज्ञानिक ढंग से
विस्तृत हिन्दीव्याख्या नहीं निकली, जो थोड़ी बहुत हिन्दीव्याख्याएं मिलती भी हैं वे
प्राय सब पुरानी शैली की केवल संस्कृतशब्दों के स्थान पर हिन्दी-पर्याय रख देने
मात्र में ही सन्तोष प्रकट करने वाली हैं। ग्रन्थकार के एक एक शब्द वा विचार का
विस्फोरण कर पाठकों के हृदयों पर उसे अङ्कित कर देने का तो किसी को विचार
ही उपस्थित नहीं हुआ। उदाहरणार्थ आप—स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्यवस्था;
नप्तादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम्; अष्टभ्य इति वक्तव्ये कृतात्वनिर्देशो जश्शसो-
विषय आत्वं ज्ञापयति—इत्यादि स्थलों को उन टीकाओं में देखें, आप सन्तुष्ट नहीं
हो सकेंगे।
आज भारत स्वतन्त्र है। इस की राष्ट्रभाषा प्रधानतया हिन्दी है। परन्तु
हिन्दी अपने शब्दभण्डार के लिये संस्कृत से ही सदा अनुप्राणित होती चली आ रही
है। अतः बिना संस्कृत का अच्छा ज्ञान प्राप्त किये हिन्दी में प्रौढता प्राप्त करना
दुष्कर ही नहीं वरन् असम्भव सा है। इसलिये संस्कृत के प्रचारार्थ हिन्दी में मुख्यतया
संस्कृतव्याकरण के ऊंचे से ऊंचे ज्ञानवर्धक वा शोधपूर्ण ग्रन्थ सरल से सरल भाषा में
प्रकाशित करने चाहियें। यह व्याख्या इसी ध्येय को सामने रखते हुए लिखी गई है।
इस में मुख्यदृष्टि पदे पदे भावाशयविस्फोरण और शोध पर ही केन्द्रित रही है।
ग्रन्थकार के अन्तस्तल तक पाठकों को पहुंचाना इस व्याख्या का मुख्य उद्देश्य रहा है।
मूल में जहां जहां कोई कठिन स्थल आया है वहां वहां ग्रन्थविस्तार का भय छोड़ कर
उसका पूरा पूरा विवरण प्रस्तुत किया गया है। ऊपर के उद्धृत स्थलों को आप इस
व्याख्या में देख कर अनुभव करेंगे कि अब इस विषय पर कुछ भी कहना शेष नहीं
रहा।
यह व्याख्या सार्वजनीन अर्थात् सब लोगों के लिये उपयोगी है। इसे अत्यल्प-
मति विद्यार्थी, प्रौढ विद्यार्थी, व्युत्पन्न छात्र, व्याकरणप्रेमी, अध्यापक, शोधरत
विद्वज्जन—जो भी देखेंगे अपने अपने सामर्थ्यानुकूल पूर्ण उपयोगी पाएंगे। अध्यापक
यदि इस का स्वयं सम्यगवलोकन कर विद्यार्थियों को पाठ पढ़ायेंगे तो वे ग्रन्थकार का
आशय अपने छात्रों के हृदयपटल पर अतिशीघ्र अङ्कित करने में पूर्ण समर्थ हो
सकेंगे। इसी प्रकार यदि छात्र अपने अध्यापकों से ग्रन्थ का पाठ पढ़ कर इस व्या-
ख्या का अवलोकन करेंगे तो उन्हें निश्चय ही अपूर्व लाभ होगा। एवं शोधप्रिय
विदेशी वा स्वदेशी विद्वानों के लिये भी यह समानरूपेण उपयुक्त सिद्ध होगी।
इस व्याख्या में व्याकरण जैसे कठिन विषय को सरल से सरल बना कर
प्रस्तुत करने का पूरा पूरा प्रयास किया गया है। अनेक विवादास्पद स्थलों का स्पष्टी-
करण करते हुए भिन्न भिन्न विद्वानों की सम्मति भलीभांति दे कर अपनी सम्मति भी
स्पष्टरूपेण अङ्कित कर दी है। कई कठिन स्थल अत्यन्त सरल रीति से लौकिक

[१३]
उदाहरण दे कर स्पष्ट किये गये हैं । यथा—न लुमताङ्गस्य की अनित्यता वाला
स्थल, स्थानिवद्भाव मे अनल्विधौ वाला अंश, अन्वादेशव्याख्या आदि ।
इस भैमीव्याख्या की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नस्थ हैं—
(१) सूत्रार्थ; (२) अभ्यास; (३) शब्दसूचियां; (४) अव्ययप्रकरण ।
(१) सूत्रार्थ—
जहां तक हमें ज्ञात है कि लघुकौमुदी के किसी टीकाकार ने सूत्र से अर्थ
कैसे उत्पन्न होता है—इस पर कुछ भी विचार नहीं किया । लघुकौमुदी तो क्या
सिद्धान्तकौमुदी तक के कुछ टीकाकारों को छोड़ कर प्रायः सब व्याख्याताओं ने इस
विशेषता की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया । तीन अक्षरों के सूत्र का पैंतीस
अक्षरों वाला अर्थ कैसे हो गया—यह वे नहीं बताते । केवल वृत्ति को घोट कर सूत्रार्थ
का स्मरण करना महान् दोषवह है । अनेक अच्छे-अच्छे व्युत्पन्न विद्यार्थी देखे जाते
हैं जो प्रत्येक सूत्र का अर्थ तो बता सकते हैं परन्तु सूत्र का पदच्छेद तक नहीं कर
सकते । यह सारा दोष केवलमात्र वृत्ति घोटने (रटने) का है । हमारे विचार में तो
प्रत्येक विद्यार्थी को व्याकरण अध्ययन करने से पूर्व पाणिनि का अष्टाध्यायीसूत्रपाठ क्रम-
पूर्वक कण्ठस्थ करना चाहिये । इस से वृत्ति रटने की आवश्यकता ही नहीं रहती, केवल-
मात्र वृत्ति को समझ लेना ही पर्याप्त होता है, क्योंकि सूत्रों का पौर्वापर्य तो विदित
होता ही है । यदि अष्टाध्यायीसूत्रपाठ कण्ठस्थ न भी हो तो भी उसे पास अवश्य रखना
चाहिये और कौमुदी का प्रत्येक सूत्र उस में देख लेना चाहिये । हमारी यह निश्चित
धारणा है कि बिना अष्टाध्यायीसूत्रक्रम जाने प्रक्रियामार्ग से पूर्वत्रासिद्धम्, एक-
सञ्ज्ञाधिकार, एकदेशाधिकार, भसंज्ञा, पदसंज्ञा, तद्धितश्चासर्वविभक्तिः वाला परिगणन
आदि अनेक सूत्र वा स्थल कौमुदी-अध्येता को ठीक-ठीक रीति से कदापि हृदयंगम नहीं
हो सकते । इस के अतिरिक्त अष्टाध्यायी में दर्जनों प्रकरण अपने अपने स्थान पर
एकत्र अवस्थित हैं । आप को यदि प्रक्रिया में कोई सूत्र भूल जाये या सन्देह पड़ जाये
तो आप अष्टाध्यायी का वह सम्पूर्ण प्रकरण मन में पढ़ सकते या ग्रन्थ में देख सकते हैं,
तुरन्त सन्देह मिट जायेगा और वह विस्मृत सूत्र याद आ जायेगा । यथा आप को कहीं
प्रक्रिया में इत्सञ्ज्ञक सूत्र के विषय में सन्देह है तो आप अष्टाध्यायी का वह प्रकरण
मन ही मन पढ़ कर अपना सन्देह निवारण कर सकते हैं । अष्टाध्यायी का इत्सञ्ज्ञक-
प्रकरण प्रथमाध्याय के तृतीयपाद के आरम्भ में निम्नप्रकारेण पढ़ा गया है—
⎧ उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१.३.२)
⎪ हलन्त्यम् (१.३.३)
⎪ न विभक्तौ तुस्माः (१.३.४)
⎨ आदिर्ञिटुडवः (१.३.५)
⎪ षः प्रत्ययस्य (१.३.६)
⎪ चुटू (१.३.७)
⎪ लशक्वतद्धिते (१.३.८)
⎩ तस्य लोपः (१.३.६)

[१४]

इस स्थान के अतिरिक्त इत्सञ्ज्ञाविषयक सूत्र आपको अन्यत्र कही भी अष्टाध्यायी मे
नही मिलेगा। यह विशेषता प्रक्रियामार्गगामी कौमुदी आदि ग्रन्थो मे उत्पन्न नही
की जा सकती। इसी प्रकार-णत्व, षत्व, क्त्वि, पित्व, प्रगृह्यसञ्ज्ञा, आत्मनेपदप्रक्रिया,
परस्मैपदप्रक्रिया, समासान्त, एकसञ्ज्ञाधिकार, एकादेशाधिकार, इड्विधान आदि दर्जनो
प्रकरण आपको अष्टाध्यायी म एव ही स्थान पर मिल सकेंगे । अत एव पटना कालेज
के व्याकरणशास्त्र के प्रधानाध्यापक श्रीपण्डित हरिशङ्करशर्मा पाण्डेय स्वनिर्मित आर्ष
पाणिनीय व्याकरणम् म इस विषय पर अत्यन्त मार्मिक लेखनी उठाते हुए लिखते हैं—
यच्छास्त्रं षड्भिर्दिनैः कतिपयैः क्रीडामनस्कैरपि
स्वाचार्याश्रमवासिभिः सरलया रीत्या पुराऽधीयते ।
गुर्वर्थं परिपूर्णमुत्तमधिया सङ्क्षिप्तकायञ्च यत्
तत्कीदृग्विपरितरूपमधुना हा हन्त ! जोघुष्यते ॥
तदिदानीं महाकाय भीमरूप गृहीतवत् ।
यद् दृष्ट्वा प्रपलायन्ते बालाः कोमलबुद्धयः ॥
योऽप्याग्रहेण पठति पाणिनिश्रमवर्जितम् ।
तदवश्य स सम्पूर्ण यापयत्यत्र जीवितम् ॥
अपि विद्वद्वरा धीरा निजशिष्यायुषः क्षयम् ।
रात्रिन्दिव जायमान मनागपि न पश्यथ ! ॥
तस्मात्क्रमेण सूत्राणि पठनीयानि यत्नतः ।
अनुवृत्त्यादिसौकर्यात्तदर्थोऽपि न दुर्ग्रहः ॥
पाणिनीयपठनाय पाणिनेर्यः श्रमः स न कदापि हीयताम् ।
वृत्तिघोषममहापरिश्रमान्मुक्तिरेव फलमस्य दृश्यताम् ॥
तो हम ने इस व्याख्या मे लघुकौमुदी के प्रत्येक सूत्र का पदच्छेद, पदो का
विभक्तिवचन, पिछले सूत्रो से आ रहे अनुवर्त्तित पद और उन का विभक्ति-वचन, समास
और आवश्यक प्रत्यय तथा परिभाषाओ के कारण होने वाले परिवर्त्तनो का पूरा-पूरा
वर्णन किया है । इस के पढने से विद्यार्थियो के हृदय मे सूत्रार्थ के प्रति तनिक भी सन्देह
शेष नही रह जाता—वह सूत्र के अन्दर तक घुस कर स्वय ही वृत्ति वाला अर्थ निकाल
सकता है। हमारे ध्यान मे आज तक इस प्रकार का प्रयत्न लघुकौमुदी पर कही नही
किया गया ।१


१ सन् १६५० म इस भैमीव्याख्या के प्रथमसस्करण के प्रकाशित होने के बाद कई लोगो
ने इस व्याख्या की नकल करने की बहुविध चेष्टाए की, जिन मे वे बुरी तरह से
असफल हुए। कारण यह है कि अष्टाध्यायी तो उन्हें कण्ठस्थ थी नही तथा आर्षपाठ-
विधि मे भी वे सर्वथा अनभिज्ञ थे। बनारस से प्रकाशित लघुकोमुदी के एक टीकाकार
ने तो हमारी व्याख्या की शतश पङ्क्तियो को चुरा कर अपनी टीका को सजाया

[१५]
(२) अभ्यास—
इस ग्रन्थ की दूसरी बड़ी विशेषता अभ्यास हैं। प्रायः प्रत्येक प्रकरण वा
अवान्तर-प्राकरणिक विषय के अन्त में 'अभ्यास' जोड़ दिया गया है। ये अभ्यास
साधारण पुस्तकों के अभ्यासों की तरह नहीं हैं, किन्तु महान् परिश्रम से जुटाए गये
अभ्यास हैं। सन्धिप्रकरण के अभ्यासों में आप ऐसे अनेक उदाहरण पाएगे—जो
अन्यत्र मिलने दुर्लभ हैं। इसी प्रकार अन्य अभ्यासों में भी विद्यार्थियों की ज्ञानवृद्धि
के लिये अनेक भ्रमोत्पादक रूप भ्रमोच्छेदपूर्वक बड़े परिश्रम से सङ्गृहीत किये गये है,
इन्हें देख कर विद्वत्समाज को निश्चय ही सन्तोष होगा। हमारी यह धारणा है कि
यदि इन अभ्यासों को कोई छात्र युक्तरीत्या अभ्यस्त (हल) कर ले तो वह साधारण
सिद्धान्तकौमुदी पढ़े-लिखे छात्र से कहीं अधिक व्युत्पन्न होगा। विद्यार्थियों को इन
अभ्यासों का पुनः-पुनः मनन करना चाहिये। व्याख्यागत सभी विशिष्ट बातें प्रायः
इन अभ्यासों में प्रश्नरूप से पूछ ली गई है।
(३) शब्दसूची—
इस व्याख्या की तीसरी असाधारण विशेषता है—शब्दसूची। आपको आज
तक के मुद्रित व्याकरणग्रन्थों में इस प्रकार का प्रयत्न कहीं भी किया गया नहीं
मिलेगा। इन शब्दसूचियों का उद्देश्य विद्यार्थियों को अनुवादादि के लिये अत्यन्त
उपयोगिशब्दसङ्ग्रह प्रदान करना है। इन सूचियों में प्रायः दो हजार (२०००) चुने
हुए शब्दों का सार्थ सङ्ग्रह किया गया है। इन में से कई सूचियां तो अत्यन्त कठोर
परिश्रम से सङ्ग्रह की गई हैं। शब्दों के प्रायः लोकप्रचलित प्रसिद्ध अर्थ ही दिये गये
हैं। विशेष विशेष स्थानों पर काव्य-कोष आदि के वचन भी टिप्पणरूपेण दे दिये हैं।
विद्यार्थियों के सुभीते के लिये णत्वप्रक्रियानिर्देशक चिह्न भी सर्वत्र लगा दिये हैं।
(४) अव्ययप्रकरण—
इस व्याख्या की चौथी बड़ी तथा सब से अधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता है—
अव्ययप्रकरण। आप को कहीं भी इस प्रकार की व्याख्या सहित यह प्रकरण देखने को
नहीं मिलेगा। प्रत्येक अव्यय का विस्तृत अर्थ उस का साहित्यगत उदाहरण [जहां
तक हो सका है किसी प्रसिद्ध सूक्ति वा सुभाषित को ही चुना गया है] तथा तद्विषयक
विस्तृत शोधपूर्ण टिप्पण आप इस प्रकरण में देख सकेंगे। लघुकौमुदी के डेढ़ पृष्ठ का
यह प्रकरण इस व्याख्या के ७८ पृष्ठों में समाप्त हुआ है। प्रथमसंस्करण में जहां इस
व्याख्या में तीन सौ अव्ययों का संकलन था वहां अब द्वितीयसंस्करण में सवा पांच सौ
अव्ययों का व्याख्यान किया गया है। इस प्रकरण के कई अव्यय तो बड़े विवाद का
विषय बने हुए हैं—उन सब का भी यथास्थान पूर्णरीत्या स्पष्टीकरण किया गया है।
और चाटुकारिता से राजकीय सम्मान भी पा लिया पर उन्हें ज़रा भी लज्जा
नहीं आई कि जिस का माल चुरा रहा हूं उस का कहीं परोक्ष रूप से नामनिर्देश
तो कर दूं—यह है आज के युग के लेखकों की नैतिकता।

[१६]
इन में कतिपय अव्ययों पर कई कई मास तक सोच विचार किया गया है और कई
आदरणीय विद्वानों की सम्मति भी ली गई है। इस प्रकरण को लिखने में सब से
बड़ी सहायता हमारे विशाल संस्कृत पुस्तकालय की है जिस में हम ने प्रायः पञ्च
सहस्र संस्कृतग्रन्थ अपना सम्पूर्ण जीवन लगा कर संगृहीत किये हैं।
इन विशेषताओं के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार की छोटी-मोटी विशेषताओं
का भी यह ग्रन्थ आगार है। जैसे लघुकौमुदी में आये प्रत्येक शब्द की पूरी पूरी रूप-
माला इस में दी गई है, किसी शब्द पर तद्वत् नहीं लिखा गया। प्रत्येक स्थान पर
ढेरों उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं ताकि विद्यार्थियों को विषय हृदयंगम हो सके।
अकेले इको यणचि सूत्र पर ही पचास उदाहरण दिये गये हैं। सन्धिप्रकरण में इस
तरह एक हजार नये उदाहरण अभ्यासार्थ दिये गये हैं। अव्ययप्रकरण में उदाहृत
लगभग पन्द्रह सौ सुभाषितों वा विशेष वचनों के मूलग्रन्थ और पते पूरी तरह ढूंढ ढूंढ
कर निर्दिष्ट किये गये हैं। कठिन सुभाषितों के हिन्दी में अर्थ भी दिये गये हैं। सूत्र,
वार्त्तिक तथा परिभाषा आदियों की सूची के साथ साथ तीन सौ सुबन्त शब्दों और
सवा पाच सौ अव्ययों की भी वर्णानुक्रमणी इस संस्करण में उद्दृङ्कित की गई है ताकि
विद्यार्थियों को किसी अव्यय या सुबन्त के ढूंढने में कठिनाई न हो।
भैमीव्याख्या के प्रथम भाग का यह द्वितीयसंस्करण है। इस संस्करण में
प्रथमसंस्करण की अपेक्षा लगभग डेढ सौ पृष्ठों की ठोस सामग्री अधिक है। दो सौ के
करीब शोधपूर्ण नये टिप्पण वा फुटनोट्स और जोड़े गये हैं। इस ग्रन्थ के शोधन में
भी विशेष प्रयत्न किया गया है। कतिपय अनिवार्य मानव-सुलभ भूलों को छोड़ कर
प्राय यह ग्रन्थ लेखक के अपने तत्त्वावधान में अतीव शुद्ध छपा है। ग्रन्थमुद्रापण में
लेखक को अपने दो पुत्रों— पतञ्जलिकुमार भाटिया शास्त्री तथा अश्विनोकुमार शास्त्री
—से विशेष सहायता मिली है।
इस ग्रन्थ का प्रथमसंस्करण श्री पं० दीनानाथजी शास्त्री सारस्वत भूतपूर्व
प्रिंसिपल सनातनधर्मकालेज मुलतान के तत्त्वावधान में छपा था। हमें बड़ा दुःख है
कि आदरणीय शास्त्रीजी अब इस द्वितीयसंस्करण के समय अपनी इहलीला समाप्त
कर परलोक सिधार चुके हैं। अतः अब उन से साहाय्य नहीं लिया जा सका। पर
उन की प्रेरणा और शुभ कामनाएं हमेशा हमारे साथ रही हैं और रहेंगी—इस में
तनिक भी सन्देह नहीं।
यह है हमारा आत्मनिवेदन। अब आगे पाठकों का काम है कि लेखक को
उत्साहित कर आगे सेवा करने का अवसर दें या न दें।
मुख्यों स्ट्रीट सुरभारती-समुपासक
गांधीनगर, दिल्ली-११००३१ भीमसेन शास्त्री
विजयदशमी (१६.१०.१९८३)

ॐ
श्रीमद्वरदराजाचार्यप्रणीता
लघु-सिद्धान्त-कौमुदी
श्रीभीमसेनशास्त्रिनिर्मितया भैमीव्याख्ययोद्भासिता
[ पूर्वार्धम् ]
--: :०: :--
(व्याख्याकर्तृमङ्गलाचरणम्)
प्राप्यतेऽन्विष्यमाणो न यः कुत्रचिद्
योगिविद्वज्जनैर्हा कुतोऽन्यैर्नरैः।
आदिमध्यान्तशून्यं प्रभुं निर्गुणं
स्वस्य चित्तोपशान्त्यै तमेवाश्रये ॥ १ ॥
सर्वाऽभिलाप - दातारं शरणाऽगत - तारकम् ।
अभिलाषशतं त्यक्त्वा प्रपन्नोऽस्मि जगद्गुरुम् ॥ २ ॥
व्याख्याता सूरिभिः कामं, लघुसिद्धान्तकौमुदी ।
भाषाटीका तथाप्यस्या बोधदा नैव दृश्यते ॥ ३ ॥
अक्षरार्थपराः सर्वे विमुखा भाववर्णनात् ।
वृथाऽनपेक्षं जल्पन्तः पाण्डित्यमदगर्विताः ॥ ४ ॥
तेभ्यः खिन्नो विनोदाय बालानामुपकारिणीम् ।
स्वाधीतस्य प्रचाराय टीकामेतां करोम्यहम् ॥ ५ ॥
सुस्पष्टपदलालित्यं सुष्ठु भावस्य कीर्तनम् ।
वटून् दृष्ट्वा कृतं सर्वं न च पाण्डित्यगर्वतः ॥ ६ ॥
टीकामेतां जगद् दृष्ट्वा गदिष्यत्येकया गिरा ।
बालानामुपकारोऽभूद् यः कृतो नैव केनचित् ॥ ७ ॥
कृपा स्याज्जगदीशस्य यत्नो मे सफलो भवेत् ।
यतो मौर्ख्याभिभूतस्य को देवादपरोऽस्ति मे ॥ ८ ॥

२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम् ।
पाणिनीयप्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीम् ॥ १ ॥
अन्वय —अहम् (वरदराज ) शुद्धां गुण्यां सरस्वतीं देवीं नत्वा पाणिनीय-
प्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदीं करोमि ।
अर्थ --मैं (वरदराज) शुद्ध तथा गुणों से युक्त सरस्वती देवी को नमस्कार
कर पाणिनि के बनाये व्याकरणशास्त्र में (बालकों के) प्रवेश के लिये लघुसिद्धान्त-
कौमुदी को बनाता हूं।
व्याख्या—ज्ञान की अधिष्ठात्री (स्वामिनी) एक देवी मानी जाती है, जिसे
सरस्वती कहते हैं। ग्रन्थकार ने आदि में उसे इसलिये नमस्कार किया है कि वह
प्रसन्न होकर मेरे ऊपर कृपा करे जिस से मैं ग्रन्थ बनाने में समर्थ हो सकूं । इस ग्रन्थ
के बनाने वाले वरदराज नामक पण्डित हैं। इन का सम्पूर्ण वृत्तान्त भूमिका में लिखा
है देख लें । जिस से किसी भाषा के शुद्ध अशुद्ध होने का ज्ञान हो उसे उस भाषा का
व्याकरण कहते हैं। संस्कृतभाषा के अनेक व्याकरण हैं। यथा—पाणिनीय, कातन्त्र,
चान्द्र, मुग्धबोध, सारस्वत आदि । संस्कृतभाषा के सम्पूर्ण व्याकरणों में पाणिनिमुनि का
बनाया व्याकरण ही सब से श्रेष्ठ और प्रचलित है। इस के अध्ययन में कठिनता का
अनुभव कर वरदराज ने यह लघुसिद्धान्तकौमुदी बनाई है। 'लघुसिद्धान्तकौमुदी' शब्द
का अर्थ कुछ व्याकरण-सिद्धान्तों को चांदनी के समान प्रकाशित करने वाली है।
टिप्पणी—गुण्याम् = प्रशस्ता गुणाः सन्त्यस्या इति गुण्या । ताम् = गुण्याम् ।
[रूपादाहतप्रशंसयोर्यप् (५।२।१२०) इति सूत्रस्थेन अन्येभ्योऽपि दृश्यते इति
वार्त्तिकेन यप् ] । पाणिनीयप्रवेशाय— पाणिनिना प्रोक्तम् = पाणिनीयम्, तस्मिन् प्रवेशः
=पाणिनीयप्रवेशस्तस्मै = पाणिनीयप्रवेशाय । लघुसिद्धान्तकौमुदी—लघवः = असमग्रा
ये सिद्धान्ताः = ऊहापोहकृतनिश्चितविचारास्तेषां कौमुदी = कौमुदीव = चन्द्रिकेव ।
[अत्रत्यः कौमुदीशब्दः कौमुदीवेत्यर्थे लाक्षणिकः ] । यथा हि ज्योत्स्ना तमो निरस्य
सकलभावान् प्रकाशयति, दिनकरकिरणजनितं तापमुपशमयति, तथेयमप्यज्ञानन्दूरीकृत्य
महाभाष्यादिदुरुहग्रन्थजनितं तापमुपशमय्य व्याकरणसिद्धान्तान् मानसे प्रकटीकरोतीति
सादृश्यम् ।
अथ संज्ञाप्रकरणम्
[लघु०] अइउण् ॥१॥ ऋऌक् ॥२॥ एओङ् ॥३॥ ऐऔच्
॥४॥ हयवरट् ॥५॥ लँण् ॥६॥ ञमङणनम् ॥७॥ झभञ् ॥८॥
घढधष् ॥९॥ जबगडदश् ॥१०॥ खफछठथचटतव् ॥११॥ कपय्
॥१२॥ शषसर् ॥१३॥ हल् ॥१४॥

संज्ञा-प्रकरणम् ३
। इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसञ्ज्ञार्थानि। एषामन्त्या इतः। हकारा-
दिष्वकार उच्चारणार्थः। लँण्मध्ये त्वित्सञ्ज्ञकः॥
अर्थ:—ये चौदह सूत्र माहेश्वर अर्थात् महादेव से आये हुए हैं। इन का
प्रयोजन अण् आदि संज्ञा करना है। इन के अन्त्य वर्ण इत्सञ्ज्ञक हैं। हकार आदियों
में अकार उच्चारण के लिये है। परन्तु 'लँण्' सूत्र में वह इत्सञ्ज्ञक है।
व्याख्या—कहते हैं कि महामुनि पाणिनि विद्यार्थि-अवस्था में अत्यन्त मन्दमति
थे। जब इन्हें पढ़ने से भी कुछ ज्ञान न हुआ, तब ये खिन्न हो गुरुकुल छोड़ तपस्या
करने के लिये हिमाचल पर चले गये। वहां इन्होंने शिवजी की आराधना की। शिव-
जी ने प्रसन्न हो, चौदह बार डमरू बजाया। उस से पाणिनि ने अइउण् आदि चौदह
सूत्र प्राप्त किये। इस लिये इन सूत्रों को माहेश्वर अर्थात् महादेव से प्राप्त हुआ कहते
हैं। परन्तु कई एक इस बात को प्रमाण-शून्य होने से गलत मानते हैं। उन का कथन
है कि इन सूत्रों को बनाने वाले पाणिनि ही हैं¹। परन्तु चाहे कुछ भी क्यों न हो,
इतना तो निर्विवाद सिद्ध है कि ये सूत्र पाणिनीय-व्याकरण के प्राण हैं। इन के बिना
पाणिनीय-व्याकरण चल ही नहीं सकता। इन का उपयोग आगे चल 'अण्' आदि
संज्ञाओं के करने में किया जावेगा। हम वहीं पर इन्हें स्पष्ट करेंगे।
जो अन्त में रहे उसे अन्त्य या अन्तिम कहते हैं। इन चौदह सूत्रों के 'ण्, क्,
ङ्, च्, ट्, ण्, म्, ञ्, ष्, श्, व्, य्, र्, ल्' ये चौदह वर्ण अन्त्य हैं। इन की इत्संज्ञा
है अर्थात् ये इत् नाम वाले हैं। ध्यान रहे कि इस शास्त्र में संज्ञा, संज्ञक और संज्ञी
शब्दों का बहुत व्यवहार होता है। जो नाम हो वह संज्ञा और जिसका नाम हो वह
संज्ञक या संज्ञी होता है। जैसे 'इस का नाम देवदत्त है' यहां 'देवदत्त' यह शब्द संज्ञा
और सामने खड़ा हुआ हाड मांस वाला लम्बा चौड़ा मनुष्य संज्ञक या संज्ञी है। इसी
प्रकार यहां ण्, क् आदि संज्ञक या संज्ञी होंगे और 'इत्' यह संज्ञा होगी। प्रत्येक वस्तु
की संज्ञा व्यवहार की आसानी के लिये ही होती है; यथा मेरी संज्ञा 'भीमसेन' है।
इस से यह होगा कि लोग मुझे व्यवहार में आसानी से ला सकेंगे। कोई मुझे बुलाना
चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन ! आओ'; कोई मुझे पढ़ाना चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन !
पढ़ो'; कोई खिलाना चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन ! खाओ'; कोई मेरा पता पूछेगा
तो कहेगा 'भीमसेन कहां हैं ?' अब कल्पना करें कि यदि मेरा कोई नाम न होता तो
जिस ने मुझे बुलाना होता वह दूसरे के प्रति क्या कहता ? कि 'उस दुबले पतले मनुष्य
को जिस का रङ्ग ऐसा २ है, सिर पर अमुक २ रङ्ग की टोपी है, पैर में फलां प्रकार
का जूता है, लाओ'। तब सम्भव है कि सुनने वाला पुरुष उसे न समझ पाता। अथवा
मेरी जगह किसी अन्य को ला खड़ा करता; तो कहने का तात्पर्य यह है कि नाम
अर्थात् संज्ञा के बिना न तो जगत् का व्यवहार और न ही शास्त्र का व्यवहार चल
१. इस विषय पर प्रत्याहार-सूत्रों का निर्माता कौन ? नामक हमारा लघुशोधनिबन्ध
देखें, जो भैमी प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हो चुका है।

४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
सकता है। व्यवहार के लिये आवश्यक है कि जिसका हम व्यवहार करना चाहें उस
की कोई न कोई संज्ञा अवश्य करें। बिना संज्ञा के कभी व्यवहार नहीं चल सकता।
यहां आगे आदिरन्त्येन सहेता (४) आदि सूत्रों में इन ण्, य् आदि अक्षरों का व्यव-
हार करना है, अतः इन की 'इत्' यह संज्ञा की जाती है।
हमारी लिपि अर्थात् वर्णमाला में दो प्रकार के अक्षर हैं। एक तो 'अ, इ,
उ' आदि स्वर, दूसरे 'क्, ख्, ग्, घ्' आदि व्यञ्जन या हल्। व्यञ्जनों का उच्चारण
स्वरों के मिलाये बिना नहीं हो सकता। इसलिये आजकल की वर्णमाला की छोटी २
पुस्तको में भी 'क, ख, ग, घ, ङ' इत्यादि प्रकार से अकार-युक्त व्यञ्जन देखने में
आते हैं।¹
इन चौदह सूत्रों में 'हयवरट्' सूत्र के हकार से व्यञ्जन आरम्भ होते हैं। इन
में भी अकार केवल इसीलिये है कि इन का उच्चारण हो सके, क्योंकि अकार के
बिना 'ह्, य्, व्, र्, ट्' इस प्रकार उच्चारण नहीं हो सकता। अतः अकार का इन
में ग्रहण नहीं करना चाहिये। यदि अलग २ अकार ग्रहण के लिये होता तो उस का
बार २ उच्चारण न होता। क्योंकि ग्रहण तो एक बार के उच्चारण से भी हो जाता,
तो पुनः ग्रन्थ क्यों बढ़ाते ?
लँण् इस सूत्र में ल्कारस्थ (लकार में ठहरा हुआ) अकार उच्चारण के लिये
नहीं किन्तु प्रयोजन वशात् इत्संज्ञक है। उसका प्रयोजन 'रँ' प्रत्याहार सिद्ध करना
है जो आगे उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र पर मूल में ही स्पष्ट हो जावेगा।
हम भी इस की वहीं व्याख्या करेंगे।
टिप्पणी—महेश्वरादागतानि = माहेश्वराणि, तत आगत (१०६५) इत्यण्।
अण् आदिर्यासां ता अणादयः, अणादयश्च ता संज्ञा = अणादिसंज्ञा। अणादिसंज्ञा
अर्थः प्रयोजनं येषान्तानीमानि = अणादिसंज्ञार्थानि।
अन्त्या वर्णा इतो ज्ञेयाः, प्रत्याहारोपयोगिनः ।
अकारो मुखसौख्याय हकारादौ प्रकीर्तितः ॥१॥
परमेतं बुधाः प्राहुर् इत्त्वमेव गतं लणि।
रेत्यपूर्वंस्ततस्तेन प्रत्याहारः प्रजायते ॥२॥
१ व्यञ्जनों के साथ स्वर मिलाने का प्रकार यथा—
क्+अ=क, क्+आ=का, क्+इ=कि, क्+ई=की, क्+उ=कु,
क्+ऊ=कू, क्+ऋ=कृ, क्+ॠ=कॄ, क्+ऌ=कॢ, क्+ए=के, क्+
ऐ=कै, क्+ओ=को, क्+औ=कौ, क्+अं=कं, क्+अः=कः। इसी
प्रकार अन्य व्यञ्जनों के साथ भी संयोग कर लेना चाहिये। इन में से 'कि' पर
विशेष ध्यान देना चाहिये। प्राय कई बालक 'कि' में 'इ' को प्रथम और क् को
पश्चात् लिखा माना करते हैं, उन्हें उपर्युक्त प्रकार से अपनी भ्रान्ति दूर कर
लेनी चाहिये। ध्यान रहे कि बिना स्वर व्यञ्जन का संयोग जान कदाचित् इस
ग्रन्थ में प्रवेश ही नहीं हो सकता।

संज्ञा-प्रकरणम् ५
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(१) हलन्त्यम् ।१।३।३॥
उपदेशेऽन्त्यं हलित् स्यात् । उपदेश आद्योच्चारणम् । सूत्रेष्वदृष्टम्पदं
सूत्रान्तरादनुवर्त्तनीयं सर्वत्र ॥
अर्थ:—उपदेश में वर्त्तमान अन्त्य हल् इत्संज्ञक हो । उपदेश:—आद्यों के
उच्चारण को अथवा धातु आदि के आद्य उच्चारण को उपदेश कहते हैं । सूत्रेषु—सूत्रों
में जो पद न हो (पर वृत्ति में दिखाई दे) वह पद सर्वत्र पिछले (या कहीं २ अगले)
सूत्रों में ले लेना चाहिये ।
व्याख्या—इस व्याकरण के प्रथम कर्त्ता महामुनि पाणिनि हैं । इन्होंने 'अष्टा-
ध्यायी' नामक जगत्प्रसिद्ध ग्रन्थ रचा है । इस ग्रन्थ में आठ अध्याय और प्रत्येक अध्याय
में चार २ पाद हैं । अर्थात् सब मिला कर बत्तीस पाद अष्टाध्यायी में हैं । हर एक
पाद में भिन्न भिन्न सङ्ख्याओं में सूत्र हैं । इन सब की तालिका निम्न प्रकार से
समझनी चाहिये ।
| अध्यायनाम | प्रथमपाद | द्वितीयपाद | तृतीयपाद | चतुर्थपाद | सम्पूर्णसंख्या |
| प्रथमाध्याय | ७४ | ७३ | ६३ | १०६ | ३४६ |
| द्वितीयाध्याय | ७१ | ३८ | ७३ | ८५ | २६७ |
| तृतीयाध्याय | १५० | १८८ | १७६ | ११७ | ६३१ |
| चतुर्थाध्याय | १७६ | १४४ | १६६ | १४४ | ६३० |
| पञ्चमाध्याय | १३५ | १४० | ११६ | १६० | ५५४ |
| षष्ठाध्याय | २१७ | १६८ | १३८ | १५५ | ७२८ |
| सप्तमाध्याय | १०३ | ११८ | ११६ | ६७ | ४३७ |
| अष्टमाध्याय | ७४ | १०८ | ११६ | ६८ | ३६६ |
| समग्र अष्टाध्यायी की सूत्रसंख्या— | | | | | ३९६५ |
प्राचीन काल में यह सम्पूर्ण अष्टाध्यायी कण्ठस्थ की जाती थी । तदनन्तर
व्याकरण पढ़ा जाता था । तभी तो काशिकाकार जयादित्य, पदमञ्जरीकार हरदत्त,
शेखरकार नागेशभट्ट सरीखे विद्वान् उत्पन्न होते थे । परन्तु अब इस परिपाटी के मन्द

६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
हों जाने से वैसे विद्वान् उत्पन्न नहीं होते । अब भी यदि इस परिपाटी का पुनरुद्धार
हो जावे तो पुनः वैसे विद्वान् निकलने लग पड़ेंगे । कर्त्तव्योऽत्र यत्न ।
इस ग्रन्थ में अष्टाध्यायी के सूत्र बिखरे हुए हैं। इन सूत्रों के आगे तीन अङ्क
लिखे हैं। इन में से पहला अष्टाध्यायी के अध्याय का सूचक, दूसरा पादसूचक तथा
तीसरा सूत्रसूचक समझना चाहिये । यथा — हलन्त्यम् ।१।३।३॥ यहां ‘१’ से तात्पर्य
प्रथमाध्याय, ‘३’ से तात्पर्य तृतीयपाद और अन्तिम ३ से तात्पर्य तीसरे सूत्र से है ।
तो इस प्रकार यह सूत्र प्रथमाध्याय के तृतीय पाद का तीसरा है ऐसा ज्ञात होता है ।
एवम् आगे भी सर्वत्र समझ लेना । पाणिनि के सूत्रपाठ के अर्थ करने का विचित्र ढंग
है । कई पदों का सूत्रों में नामोनिशान नहीं होता, परन्तु अर्थ करते समय वे आ
जाया करते हैं । अतः सूत्रों के अर्थ करने के ढंग पर कुछ थोड़ा विचार करते हैं ।
(१) सब से प्रथम सूत्र का पदच्छेद करना चाहिये । जैसे— हलन्त्यम्
।१।३।३।। हल् । अन्त्यम् । आदिरन्त्येन सहेता ।१।१।७०॥ आदि । अन्त्येन । सह ।
इता । इको यणचि ।६।१।७६।। इक । यण् । अचि । अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय ।
।१।१।६८॥ अण् । उदित् । सवर्णस्य । च । अप्रत्यय । कई स्थानों पर पिछले सूत्रों
से तथा कहीं २ अग्रिम सूत्रों से भी¹ पद ले लिये जाते हैं । महामुनि पाणिनि ने यद्यपि
इन की स्वरित के चिह्न से व्यवस्था की थी, परन्तु अब वह व्यवस्था बिगड़ गई
है । अब तो गुरुपरम्परा में जो जो पद पीछे से या आगे से लिया जाता है लिया
जाना चाहिये । इस में अपनी ओर से कोई गड़बड़ नहीं करनी चाहिये । यथा—
हलन्त्यम् यहां पिछले उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से ‘उपदेशे’ और ‘इत्’ ये दो पद
आते हैं । इन पदों को भी पदच्छेद में लिखना चाहिये और कोष्ठ में बता देना चाहिये
कि ये पद कहां से आते हैं² । यथा—उपदेशे (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) ।
हल् । अन्त्यम् । इत् (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) ।
(२) पदच्छेद के बाद उन पदों की विभक्तियां जाननी चाहियें । यथा—
हलन्त्यम् । उपदेशे ।७।१। अन्त्यम् ।१।१। हल् ।१।१। इत् ।१।१। (यहा पहले अङ्क
से विभक्ति तथा दूसरे अङ्क से वचन समझना चाहिये) । आदिरन्त्येन सहेता । आदि
।१।१। अन्त्येन ।३।१। सह इत्यव्ययपदम् । इता ।३।१। इको यणचि । इक ।६।१। यण्
।१।१। अचि ।७।१। अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्यय । अण् ।१।१। उदित् ।१।१। सवर्णस्य
१ यथा ईस से (७ २ ७७) सूत्र मे अगले सूत्र से 'ध्वे' पद लाया जाता है ।
२ इस अनुवृत्ति का व्यवहार लोक मे भी देखा जाता है, जैसे किसी ने कहा
'भरत को चार आम दो' 'राम को तीन' । अब यहां 'राम को तीन' यह वाक्य
अपूर्ण है, इस की पूर्णता 'आम दो' इतने पद मिलाकर 'राम को तीन आम दो'
इस प्रकार हो जाती है, तो यहां 'आम दो' इन दो पदों की अनुवृत्ति समझनी
चाहिये । इस प्रकार इस का लोक मे सर्वत्र अतीव प्रयोग देखा जाना है ।

संज्ञा-प्रकरणम् ७
।६।१। च इत्यव्ययपदम् । अप्रत्ययः ।१।१। स्मरण रहे कि कई स्थानों पर विभक्ति
का लुक् तथा अन्य विभक्ति के स्थान पर अन्य विभक्ति भी लगी रहती है । इसे
सूत्रकार की गलती नहीं समझी जाती क्योंकि छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति अर्थात् सूत्र वेद
की नाईं होते हैं । जैसे वेद में विभक्ति का लुक् तथा अन्य विभक्ति के स्थान पर
अन्य विभक्ति लगी रहती है, वैसे सूत्रों में भी होता है । विभक्ति का लुक् यथा—
न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१=०) यहां ‘न’ और ‘प्रातिपदिक’ शब्दों से परे षष्ठी-
विभक्ति का लुक् हुआ है । अन्य विभक्ति के स्थान पर अन्य विभक्ति लगे रहने के
उदाहरण आगे यत्र तत्र बहुत आएंगे ।
(३) पदच्छेद और विभक्ति जानने के पश्चात् समास जानना चाहिये ।
समास कहीं होता है और कहीं नहीं भी होता । यथा—तस्य लोपः (३) इस सूत्र में
कोई समास नही । तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१०) इत्यादि सूत्रों में समास है। आवश्यक
तद्धितादि का समावेश भी हम ने समास में कर दिया है । अर्थात् समास के जानने के
साथ २ आवश्यक तद्धित आदि प्रत्यय भी जान लेने चाहियें ।
(४) इतना जान लेने के पश्चात् महामुनि पाणिनि के अर्थ करने के नियमों
का ध्यान रख कर सूत्र का अर्थ करना चाहिये । वे नियम प्रायः ये हैं—
(१) षष्ठी स्थानेयोगा (१.१.४८) | (६) इको गुणवृद्धी (१.१.३)
(२) तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य | (७) अचश्च (१.२.२८)
(१.१.६५) | (८) येन विधिस्तदन्तस्य (१.१.७१)
(३) तस्मादित्युत्तरस्य (१.१.६६) | (६) यस्मिन्विधिस्तदादावल्ग्रहणे
(४) अलोऽन्त्यस्य (१.१.५१) | (वा०)
(५) आदेः परस्य (१.१.५३) | (१०) प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् (प०)
इन सब को हम यथास्थान स्पष्ट करेंगे ।
पीछे ‘एषामन्त्या इतः’ कह कर ण् क् आदियों को ‘इत्’ कह आये हैं । अब
वह सूत्रों से सिद्ध करते हैं । हलन्त्यम् । उपदेशे ।७।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र
से) । हल् ।१।१। अन्त्यम् ।१।१। इत् ।१।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से) ।
अर्थः—(उपदेशे) उपदेश में विद्यमान (अन्त्यम्) अन्तिम (हल्) हल् = व्यञ्जन
(इत्) इत्सञ्ज्ञक होता है । यदि उपदेश में कहीं हमें अन्त्य हल् मिलेगा तो वह
इत्सञ्ज्ञक होगा । अब प्रश्न यह पैदा होता है कि उपदेश क्या है ? इसका उत्तर
ग्रन्थकार यह देते हैं कि उपदेश आद्योच्चारणम् आद्योच्चारण उपदेश होता है । इस
शब्द पर शेखरादि व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में बहुत विवाद है । हम उस विवाद के
निकट नहीं जाते, क्योंकि वह प्रपञ्च बालकों की समझ में नहीं आ सकता । यहां
सरल मार्ग यह है कि यहां षष्ठीतत्पुरुषसमास है—आद्यानाम् उच्चारणम् आद्यो-
च्चारणम् । जो आद्यों अर्थात् शिव, पाणिनि, कात्यायन तथा पतञ्जलि का उच्चारण

८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
है, उसे 'उपदेश' कहते हैं। भाष्यकार ने सब स्थल नियत कर दिये हैं; उन का कथन
है कि प्रत्याहार-सूत्र, धातुपाठ, गणपाठ, प्रत्यय, आगम और आदेश ये सब उपदेश
हैं¹। उन में अन्त्य हल् इत्सञ्ज्ञक होता है।
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२) अदर्शनं लोपः ।१।१।५६॥
प्रसक्तस्यादर्शनं लोपसञ्ज्ञं स्यात् ॥
अर्थ:—विद्यमान का अदर्शन लोपसञ्ज्ञक होता है।
व्याख्या-स्थानस्य ।६।१। (स्थानेऽन्तरतम सूत्र से 'स्थाने' पद आकर
विभक्तिविपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है)। अदर्शनम् ।१।१। लोप ।१।१। अर्थ —
(स्थानस्य) विद्यमान का (अदर्शनम्) न सुनाई देना (लोप ) लोप होता है। यहां
अदर्शन सञ्ज्ञी तथा लोप सञ्ज्ञा है। हम ने 'अदर्शन' का अर्थ 'न सुनाई देना' किया है।
इस का यह कारण है कि यह 'शब्दानुशासन' अर्थात् शब्द-शास्त्र है। इस में शब्दों के
साधु (ठीक) असाधु (गलत) होने का विवेचन है। शब्द कान से सुने जाते हैं, आंख
से देखे नहीं जाते अतः यहां पर 'अदर्शन' का अर्थ 'न दिखाई देना' की अपेक्षा 'न
सुनाई देना' ही युक्त है। ऐसा अर्थ करने पर 'दृश्' धातु को ज्ञानार्थक मानना चाहिये।
ज्ञान —आंख, कान, नाक आदि सब से हो सकता है। 'शब्दानुशासन' का अधिकार
होने से हम यहां ज्ञान कान-विषयक ही मानेंगे। यहां स्थानेऽन्तरतम (१७) से स्थान
शब्द लाने का तात्पर्य यह है कि विद्यमान का अदर्शन ही लोपसञ्ज्ञक हो, अविद्यमान
का अदर्शन लोपसञ्ज्ञक न हो। यथा —'दधि, मधु' यहां 'क्विप्' प्रत्यय कभी नहीं हुआ
अतः उस का अदर्शन है। यदि पीछे से स्थान शब्द न लावें तो यहां क्विप् प्रत्यय का
अदर्शन होने से प्रत्ययलक्षण द्वारा ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् (७७७) से तुक् प्राप्त होगा
जो कि अनिष्ट है; अतः 'स्थान' शब्द की अनुवृत्ति लाकर विद्यमान के अदर्शन की ही
लोपसञ्ज्ञा करनी युक्त है।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३) तस्य लोपः ।१।३।६॥
तस्येतो लोपः स्यात् । णादयोऽणाद्यर्थाः ॥
अर्थ —उस इत्सञ्ज्ञक का लोप होता है। ण् आदि 'अण्' आदियों के लिये हैं।
१. प्रत्याहारसूत्र यथा—अइउण् आदि। धातुपाठ यथा—डुपचष् पाके आदि।
गणपाठ यथा—नडट्, देवट् आदि। प्रत्यय यथा—तृच्, तृन्, तसिल् आदि।
आगम यथा—कुक्, तुक्, इट् आदि। आदेश यथा—अर्वणस्त्रसावनञः (२६२)
द्वारा 'तृ' आदेश आदि।
प्रत्यया शिवसूत्राणि, आदेशा आगमास्तथा।
धातुपाठो गणो पाठः, उपदेशाः प्रकीर्त्तिताः ॥

१. संज्ञा एवं परिभाषा प्रकरण (माहेश्वर सूत्र, सवर्ण-संज्ञा व यत्न)

संज्ञा-प्रकरणम् ६
व्याख्या—तस्य ।६।१। इतः ।६।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से प्रथमान्त
'इत्' पद आकर विभक्ति-विपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है) । लोपः ।१।१। अर्थः-
(तस्य) उस (इतः) इत्सञ्ज्ञक का (लोपः) लोप होता है । अब यहां यह शङ्का
उत्पन्न होती है कि यदि इस सूत्र में 'तस्य' पद न लेते तो भी अर्थ में कोई हानि नहीं
हो सकती थी, क्योंकि 'इतः' पद की अनुवृत्ति तो आ ही रही थी । इस का समाधान
यह है कि यदि 'तस्य' पद ग्रहण न करते तो इत्सञ्ज्ञक के अन्त्य वर्ण का लोप होता,
सम्पूर्ण इत्सञ्ज्ञक का लोप न होता । तथाहि—ञिमिदाँ स्नेहने, टुनदिँ समृद्धौ, डुकृञ्
करणे यहां आदिरञिटुडवः (४६२) सूत्र द्वारा ञि, टु, डु, की इत्सञ्ज्ञा हो कर लोप
प्राप्त होने पर अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र द्वारा अन्त्य इकार, उकार का लोप प्रसक्त
होता है जो कि अनिष्ट है । अब यदि सूत्र में तस्य पद ग्रहण करते हैं तो यह दोष नहीं
आता क्योंकि आचार्य का 'तस्य' यह कहना बतलाता है कि आचार्य सारे इत् का लोप
चाहते हैं केवल अन्त्य का नहीं ।
अब इस सूत्र से ण्, क्, ङ्, च् आदि इतो का लोप प्राप्त होता है । उस पर
कहते हैं कि इन का लोप नहीं करना, क्योंकि इन से अण् आदि प्रत्याहार बनाये
जायेंगे । यदि इन का लोप करना होता तो इन का ग्रहण किस लिये करते ? अतः
इन का लोप नहीं करना चाहिये ।
अब इत्सञ्ज्ञकों से प्रत्याहार बनाने के लिए अग्रिमसूत्र लिखते हैं :—
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(४) आदिरन्त्येन सहेता ।१।१।७०॥
अन्त्येनेता सहित आदिर्मध्यगानां स्वस्य च सञ्ज्ञा स्यात् । यथाऽण्
इति 'अ इ उ' वर्णानां सञ्ज्ञा । एवमक्, अच्, हल्, अल् इत्यादयः ॥
अर्थ.—अन्त्य इत् से युक्त आदिवर्ण, मध्यगत वर्णों की तथा अपनी सञ्ज्ञा
हो । यथाण्— जैसे अण् यह अ इ उ वर्णों की सञ्ज्ञा है । इसी प्रकार अक्, अच्,
हल्, अल् आदि भी जान लेने चाहियें ।
व्याख्या—आदिः ।१।१। अन्त्येन ।३।१। सह इत्यव्ययपदम् । इता ।३।१।
स्वस्य ।६।१। (स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसञ्ज्ञा से 'स्वम्' यह प्रथमान्त पद आकर विभक्ति-
विपरिणाम से षष्ठ्यन्त हो जाता है) । यह सूत्र सञ्ज्ञाधिकार के बीच पढ़ा जाने से
सञ्ज्ञासूत्र है । यहां 'अन्त्येनेता सहादिः' अर्थात् 'अन्त्य इत् से युक्त आदि' यह सञ्ज्ञा
है । अब सञ्ज्ञी का निर्णय करना है कि सञ्ज्ञी कौन हो ? क्योंकि सूत्र में तो किसी
का निर्देश है ही नहीं । आदि और अन्त्य अवयव शब्द हैं । अवयवों से अवयवी
लाया जाता है । अतः यहां अवयवी ही सञ्ज्ञी होगा । उस अवयवी (समुदाय) से
आदि और अन्त्य सञ्ज्ञा होने के कारण निकल जायेंगे । शेष मध्यगत वर्ण ही सञ्ज्ञी
ठहरेंगे । पुनः 'स्वस्य' पद की अनुवृत्ति आकर आदि भी सञ्ज्ञी हो जायेगा । इस
प्रकार आदि तथा मध्यगत वर्ण सञ्ज्ञी बनेंगे । तो अब इस सूत्र का अर्थ यह हुआ —

१० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अर्थ — (अन्त्येन) अन्त्य (इता) इत् से (सह) युक्त (आदि ) आदि वर्ण (स्वस्य)
अपनी तथा मध्यगत वर्णों की सञ्ज्ञा होता है। यहां हमने 'स्वस्य' पद से आदि का
ग्रहण किया है, पर कोई पूछ सकता है कि 'स्वस्य' पद से अन्त्य का ग्रहण कर
'अन्त्य इत् से युक्त आदि अन्त्य तथा मध्यगत वर्णों की सञ्ज्ञा हो' ऐसा अर्थ क्यों न
किया जाये ? इसका उत्तर यह है कि 'स्व' यह सर्वनाम है। सर्वनाम प्रधान का ही
निर्देश कराने वाले होते हैं, अप्रधान का नहीं। 'अन्त्येनेता सहादि' यहां प्रधान आदि
है, अन्त्य नहीं। क्योंकि सहयुक्तेऽप्रधाने (२ ३ १९) से अप्रधान में ही तृतीया होती
है, अतः 'स्व' यह सर्वनाम प्रधान = आदि का ही ग्रहण करायेगा, अप्रधान अन्त्य
का नहीं।
अ इ उ ण् यहां अन्त्य इत् = ण् है। आदि 'अ' है। अतः अन्त्य इत् से युक्त
आदि 'अण्' हुआ। यह सञ्ज्ञा है। 'इ उ' मध्यगत तथा 'अ' आदि ये तीन सञ्ज्ञी हैं।
इसी प्रकार अच्, अक्, हल्, अल् आदि भी जानने चाहियें। इन अण् आदि सञ्ज्ञाओं
को पूर्ववर्ती आचार्य 'प्रत्याहार' कहते चले आ रहे हैं। यहां इस शास्त्र में भी इन के
लिये प्रत्याहार शब्द व्यवहृत होता है। प्रत्याह्रियन्ते = सङ्क्षिप्यन्ते वर्णा अत्रेति
प्रत्याहार।
यहां अन्त्य और आदि अ इ उ ण् आदि सूत्रों की अपेक्षा से नहीं लेने, किन्तु
मन में रखे समुदाय की अपेक्षा से लेने हैं। यथा—इ उ ण् ऋ लृ क् इस समुदाय का
आदि 'इ' और अन्त्य 'क्' है। अन्त्य युक्त आदि = इक् सञ्ज्ञा होगा। इ उ ऋ लृ--
ये सञ्ज्ञी होंगे। 'रट्लँ' यहां उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) में लकारस्थ अकार इत्
है। समुदाय का आदि 'र्' है। अन्त्य अँ है। अन्त्य युक्त आदि र्+अँ = 'रँ' यह
सञ्ज्ञा होगा। इस सञ्ज्ञा में 'र्' और 'ल्' दो ही सञ्ज्ञी हैं।
अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि अण् आदि प्रत्याहारों में आदि और मध्य-
गत वर्ण सञ्ज्ञी होते हैं तो इक् प्रत्याहार में 'क्' भले ही न आये, पर ण् तो आना
चाहिये; क्योंकि वह मध्यगत वर्ण है। इस का उत्तर यह है कि आचार्य पाणिनि की
शैली से यह प्रतीत होता है कि मध्यगत वर्ण यदि इतसञ्ज्ञक होंगे तो उन का प्रत्या-
हारों के सञ्ज्ञियों में ग्रहण न होगा। तथाहि—यदि वे सञ्ज्ञी होते तो 'अच्' प्रत्या-
हार में 'क्' का भी ग्रहण होता क्योंकि यह मध्यवर्ण है। 'क्' के ग्रहण होने से उपदेशे-
ऽजनुनासिक इत् (२८) इस सूत्र के 'अनुनासिक.' इस पद में 'क्' इस अच् के परे होने
पर सकारस्थ इकार को इको यणचि (१५) से यण् तथा यण् का लोपो व्योर्वलि
(४२६) से लोप होकर 'अनुनास्क' हुआ होता; पर आचार्य पाणिनि ने ऐसा नहीं
किया। इस से यह विदित होता है कि इतसञ्ज्ञक मध्यवर्ती होने पर भी सञ्ज्ञी
नहीं होते।
अ इ उ ण् आदि चौदह सूत्रों से यद्यपि अनेक प्रत्याहार बन सकते हैं तथापि
इस व्याकरणशास्त्र में जिन का व्यवहार किया गया है उन की सङ्ख्या चवालीस

(४४) है। कई लोग 'रँ' प्रत्याहार को नहीं मानते उन के मत में तैंतालीस (४३)
प्रत्याहार होते हैं। इन में से बयालीस ('रँ' प्रत्याहार न मानने वालों के मत में इक्ता-
लीस ४१) प्रत्याहार तो मुनिवर पाणिनि ने स्वयं सूत्रों में व्यवहृत किये हैं। शेष दो
में से एक 'वम्' उणादि सूत्रों का तथा दूसरा 'चय्' वार्त्तिकपाठ का है। हम इन प्रत्या-
हारों के लिखने से पूर्व यह बता देना आवश्यक समझते हैं कि प्रत्याहारगत वर्णों के
जानने का सुगम उपाय क्या है ? प्रत्याहारगत वर्णों के जानने का सुगम उपाय यह है
कि निम्नलिखित बातों को अच्छी तरह से बुद्धि में बिठा लिया जाये—
(क) वर्गों के पञ्चवें वर्ण ञमङणनम् सूत्र में हैं।
(ख) वर्गों के चौथे वर्ण झभञ्, घढधष् सूत्रों में हैं।
(ग) वर्गों के तीसरे वर्ण जबगडदश् सूत्र में है।
(घ) वर्गों के दूसरे वर्ण खफछठथ तक हैं।
(ङ) वर्गों के प्रथम वर्ण चटतव्, कपय् सूत्रों में है।
(च) ऊष्मवर्ण शषसर्, हल् सूत्रों में हैं।
(छ) अन्तःस्थवर्ण यवरट्, लँण् सूत्रों में हैं।
(ज) स्वरवर्ण अइउण्, ऋऌक्, एओङ्, ऐऔच् सूत्रों में हैं।
इस के अतिरिक्त जिन सूत्रों के बीच से कटाव हो कर प्रत्याहार बनते हैं उन
सूत्रों के स्थान भी याद रखने योग्य हैं। वे स्थान निम्नलिखित हैं—
अइउण् । यहां 'इ' से कटाव होकर इक्, इच् तथा 'उ' से कटाव हो कर उक्
प्रत्याहार बनता है।
हयवरट् । यहां 'य' से कटाव हो कर यण्, यञ्, यम्, यय्, यर् प्रत्याहार 'व'
से कटाव होकर वल् प्रत्याहार तथा 'र्' से कटाव हो कर रँ प्रत्याहार बनता है।
ञमङणनम् । यहां 'म' से कटाव होकर मय् तथा 'ङ' से कटाव होकर ङम्
प्रत्याहार बनता है।
झभञ् । यहां 'भ' से कटाव होकर भष् प्रत्याहार बनता है।
जबगडदश् । यहां 'ब' से कटाव होकर बश् प्रत्याहार बनता है।
खफछठथचटतव् । यहां 'छ' से कटाव हो कर छव् तथा 'च' से कटाव हो कर
चय् प्रत्याहार बनता है।
इस व्याकरण में प्रयुक्त होने वाले प्रत्याहारों का दो श्लोकों में संग्रह यथा—
ङणटञ्च्वात् स्मृतो ह्येकः, चत्वारश्च चमान्मताः ।
शलाभ्यां षड् यरातपञ्च, पाद् द्वौ च कणतस्त्रयः ॥१॥
केषाञ्चिच्च मते रोऽपि, प्रत्याहारोऽपरो मतः ।
लस्याऽवर्णेन वाञ्छन्त्यनुनासिकवलादिह ॥२॥

१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
समास —उश्च ऊश्च ऊ३श्च =व । इतरेतरद्वन्द्व । व कालो यस्य स =ऊकाल ।
बहुव्रीहि-समास । (एकमात्रिक उकार द्विमात्रिक उकार तथा त्रिमात्रिक उकार का
द्वन्द्व करने से 'जस्' विभक्ति मे 'व' रूप निष्पन्न होता है। यहां सब उकार लक्षणा-
शक्ति मे अपने २ उच्चारणकाल के सदृश अर्थ वाले हैं)। ह्रस्वश्च दीर्घश्च प्लुतश्च =
ह्रस्वदीर्घप्लुत । इतरेतरद्वन्द्व । (यहा इतरेतरद्वन्द्व होने से यद्यपि बहुवचन होना
चाहिये था तथापि सौत्र होने के कारण एकवचन हो गया है) । अर्थ —(ऊकाल )
एकमात्रिक उकार के सदृश उच्चारणकाल वाला, द्विमात्रिक उकार के सदृश उच्चारण-
काल वाला तथा त्रिमात्रिक उकार के सदृश उच्चारणकाल वाला (अच् ) अच्, क्रमशः
(ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत ) ह्रस्व दीर्घ तथा प्लुत संज्ञक होता है। भाव --यदि एकमात्रिक¹
उकार के उच्चारणकाल के समान किसी अच् का उच्चारण-काल होगा तो वह ह्रस्व,
यदि द्विमात्रिक उकार के उच्चारण-काल के समान किसी अच् का उच्चारण-काल
होगा तो वह दीर्घ और यदि त्रिमात्रिक उकार के उच्चारणकाल के समान किसी अच्
का उच्चारण-काल होगा तो वह प्लुत संज्ञक होगा ।
कुक्कुट के 'कु कू कू३' शब्द मे क्रमशः ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत उकार का
उच्चारण स्पष्ट प्रतीत होता है अतः यहां दृष्टान्त के लिये उकार को उपयुक्त समझा
गया है वरन् 'आकाल' आदि भी कहा जा सकता था ।
इस प्रकार अचों के ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत ये तीन २ भेद हो जाते हैं (ध्यान
रहे कि यहां सामान्यतः कथन किया गया है, सब अचों के तीन तीन भेद नही होते,
पर हां यह तीनों भेद अचों के ही होते हैं अन्य वर्णों के नही) । अब अग्रिम तीन सूत्रो
से प्रत्येक के उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तीन २ भेद कहे जाते हैं—
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(६) उच्चैरुदात्तः ।१।२।२६॥
(ताल्वादिषु सभागेषु स्थानेषूर्ध्वभागे निष्पन्नोऽजुदात्तसंज्ञ स्यात् ॥)
संज्ञा-सूत्रम्—(७) नीचैरनुदात्तः ।१।२।३०॥
(ताल्वादिषु सभागेषु स्थानेष्वधोभागे निष्पन्नोऽजनुदात्तसंज्ञ स्यात् ॥)
अर्थ — भागो वाले तालु आदि स्थानो मे जो अच् ऊपरले भाग में बोला जाय
वह उदात्त होता है ॥६॥
१. कई लोग -जितनी देर मे आंख झपकती है उसे 'मात्रा' कहते हैं । कुछ लोग—
जितनी देर में बिजली चमकती है उसे 'मात्रा' कहते हैं । अन्य लोग —जितनी
देर मे झरोखे के बीच कण दिखाई देता है उसे 'मात्रा' कहते हैं । इतर लोग—
चाष—नीलकण्ठ पक्षी जितनी देर में बोलता है उसे 'मात्रा' मानते हैं। ये सब
प्राचीन शिक्षाकार आचार्यों के मत हैं । परन्तु आजकल एक सैकेण्ड के समय
को मात्रा-समय मानना सरल प्रतीत होता है । ह्रस्व के बोलने में एक सैकेण्ड,

संज्ञा-प्रकरणम् १५
भागों वाले तालु आदि स्थानों में जो अच् निचले भाग में बोला जाय वह
अनुदात्त होता है ॥७॥
व्याख्या—उच्चैः इत्यव्ययपदम् । उदात्तः ।१।१। अच् ।१।१। (ऊकालोऽज्झ्र-
स्वदीर्घप्लुतः सूत्र से) ॥६॥ नीचैः इत्यव्ययपदम् । अनुदात्तः ।१।१। अच् ।१।१।
(ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः सूत्र से) ॥७॥ 'उच्चैस्' शब्द का अर्थ ऊँचा तथा 'नीचैस्'
शब्द का अर्थ नीचा है । भाष्य के प्रमाणानुसार वर्णों का अपने २ स्थानों में ही ऊँचा
या नीचापन समझना चाहिये । यदि स्थान अखण्ड हों अर्थात् उन के भाग न हो सकते
हों तो ऊँचापन या नीचापन नहीं बन सकता । अतः स्थानों के दो भाग मानने पड़ेंगे
एक ऊँचा भाग दूसरा नीचा भाग । वृत्ति में इसीलिये 'सभाग' शब्द लिखा गया है ;
अर्थः—(उच्चैः) अपने स्थान के ऊपर वाले भाग में उच्चार्यमाण (अच्) अच् (उदात्तः)
उदात्तसंज्ञक होता है ॥६॥ (नीचैः) अपने स्थान के नीचे वाले भाग में उच्चार्यमाण
(अच्) अच् (अनुदात्त) अनुदात्तसंज्ञक होता है ॥७॥ यथा अकार का 'कण्ठ' स्थान
है । यदि अकार कण्ठ में ऊपरले भाग से बोला जायेगा तो उदात्त और यदि निचले
भाग में बोला जायेगा तो अनुदात्त संज्ञक होगा । एवम् आगे इकार आदियों के विषय
में भी जान लेना चाहिये ।
कुछ लोग 'जो ऊँची स्वर से बोला जाय वह उदात्त होता है' ऐसा अनर्थ
किया करते हैं । उनके अनर्गल-प्रलाप से सावधान रहना चाहिये; क्योंकि तब
मानसिक जप में उदात्तत्व आदि न माना जा सकेगा, पर यह अनिष्ट है ।
नोटः---इन सूत्रों की तथा अगले सूत्र की वृत्ति 'लघुकौमुदी' में नहीं दी गई ।
हम ने सुगमता के लिये 'सिद्धान्तकौमुदी' से ले कर कोष्ठ में दे दी है ।
[लघु०] संज्ञा-सूत्रम्— (८) समाहारः स्वरितः ।१।२।३१॥
(उदात्तानुदात्तत्वे वर्णधर्मौ समाह्रियेते यस्मिन् सोऽच् स्वरितसंज्ञः
स्यात्) । स नवविधोऽपि प्रत्येकम्‌अनुनासिकाननुनासिकत्वाभ्यां द्विधा ॥
अर्थः—उदात्त और अनुदात्त वर्णों के धर्म जो उदात्तत्व और अनुदात्तत्व ये
दोनों जिस अच् में विद्यमान हों वह अच् 'स्वरित' संज्ञक होता है। स नवविधोऽपि--
इस तरह नौ प्रकार का वह अच् पुनः अनुनासिक तथा अननुनासिकधर्मों के कारण दो
प्रकार का हो जाता है ।
व्याख्या—उदात्तस्य ।६।१। अनुदात्तस्य ।६।१। (उच्चैरुदात्तः से 'उदात्तः' तथा
नीचैरनुदात्तः से 'अनुदात्तः' पद का अनुवर्त्तन होता है । इन दोनों का यहां षष्ठी-
विभक्ति में विपरिणाम हो जाता है । ये दोनों पद भाष्य के प्रमाणानुसार धर्मप्रधान
हैं, अर्थात् इन का अर्थ उदात्तत्व और अनुदात्तत्व है। समाहारः ।१।१। [समाहरणम्
=समाहारः, भावे घञ् । समाहारोऽस्त्यस्मिन्निति समाहारः, अर्शआदिभ्योऽच्
दीर्घ के बोलने में दो सकेण्ड तथा प्लुत के बोलने में तीन सैकेण्ड का समय लगाना
चाहिये ।