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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 633 में से

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पृष्ठ 20

संज्ञा-प्रकरणम् ३
। इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसञ्ज्ञार्थानि। एषामन्त्या इतः। हकारा-
दिष्वकार उच्चारणार्थः। लँण्मध्ये त्वित्सञ्ज्ञकः॥
अर्थ:—ये चौदह सूत्र माहेश्वर अर्थात् महादेव से आये हुए हैं। इन का
प्रयोजन अण् आदि संज्ञा करना है। इन के अन्त्य वर्ण इत्सञ्ज्ञक हैं। हकार आदियों
में अकार उच्चारण के लिये है। परन्तु 'लँण्' सूत्र में वह इत्सञ्ज्ञक है।
व्याख्या—कहते हैं कि महामुनि पाणिनि विद्यार्थि-अवस्था में अत्यन्त मन्दमति
थे। जब इन्हें पढ़ने से भी कुछ ज्ञान न हुआ, तब ये खिन्न हो गुरुकुल छोड़ तपस्या
करने के लिये हिमाचल पर चले गये। वहां इन्होंने शिवजी की आराधना की। शिव-
जी ने प्रसन्न हो, चौदह बार डमरू बजाया। उस से पाणिनि ने अइउण् आदि चौदह
सूत्र प्राप्त किये। इस लिये इन सूत्रों को माहेश्वर अर्थात् महादेव से प्राप्त हुआ कहते
हैं। परन्तु कई एक इस बात को प्रमाण-शून्य होने से गलत मानते हैं। उन का कथन
है कि इन सूत्रों को बनाने वाले पाणिनि ही हैं¹। परन्तु चाहे कुछ भी क्यों न हो,
इतना तो निर्विवाद सिद्ध है कि ये सूत्र पाणिनीय-व्याकरण के प्राण हैं। इन के बिना
पाणिनीय-व्याकरण चल ही नहीं सकता। इन का उपयोग आगे चल 'अण्' आदि
संज्ञाओं के करने में किया जावेगा। हम वहीं पर इन्हें स्पष्ट करेंगे।
जो अन्त में रहे उसे अन्त्य या अन्तिम कहते हैं। इन चौदह सूत्रों के 'ण्, क्,
ङ्, च्, ट्, ण्, म्, ञ्, ष्, श्, व्, य्, र्, ल्' ये चौदह वर्ण अन्त्य हैं। इन की इत्संज्ञा
है अर्थात् ये इत् नाम वाले हैं। ध्यान रहे कि इस शास्त्र में संज्ञा, संज्ञक और संज्ञी
शब्दों का बहुत व्यवहार होता है। जो नाम हो वह संज्ञा और जिसका नाम हो वह
संज्ञक या संज्ञी होता है। जैसे 'इस का नाम देवदत्त है' यहां 'देवदत्त' यह शब्द संज्ञा
और सामने खड़ा हुआ हाड मांस वाला लम्बा चौड़ा मनुष्य संज्ञक या संज्ञी है। इसी
प्रकार यहां ण्, क् आदि संज्ञक या संज्ञी होंगे और 'इत्' यह संज्ञा होगी। प्रत्येक वस्तु
की संज्ञा व्यवहार की आसानी के लिये ही होती है; यथा मेरी संज्ञा 'भीमसेन' है।
इस से यह होगा कि लोग मुझे व्यवहार में आसानी से ला सकेंगे। कोई मुझे बुलाना
चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन ! आओ'; कोई मुझे पढ़ाना चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन !
पढ़ो'; कोई खिलाना चाहेगा तो कहेगा 'भीमसेन ! खाओ'; कोई मेरा पता पूछेगा
तो कहेगा 'भीमसेन कहां हैं ?' अब कल्पना करें कि यदि मेरा कोई नाम न होता तो
जिस ने मुझे बुलाना होता वह दूसरे के प्रति क्या कहता ? कि 'उस दुबले पतले मनुष्य
को जिस का रङ्ग ऐसा २ है, सिर पर अमुक २ रङ्ग की टोपी है, पैर में फलां प्रकार
का जूता है, लाओ'। तब सम्भव है कि सुनने वाला पुरुष उसे न समझ पाता। अथवा
मेरी जगह किसी अन्य को ला खड़ा करता; तो कहने का तात्पर्य यह है कि नाम
अर्थात् संज्ञा के बिना न तो जगत् का व्यवहार और न ही शास्त्र का व्यवहार चल
१. इस विषय पर प्रत्याहार-सूत्रों का निर्माता कौन ? नामक हमारा लघुशोधनिबन्ध
देखें, जो भैमी प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हो चुका है।