लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३५
अर्थः- 'पति' शब्द समास में ही घिसञ्ज्ञक होता है (समास से भिन्न स्थल
में नहीं)।
व्याख्या-पतिः ।१।१। समासे ।७।१। एव इत्यव्ययपदम् । घिः ।१।१। (शेषो
घ्यसखि से)। अर्थः- (पतिः) पतिशब्द (समासे) समास में (एव) ही (घिः) घिस-
ञ्ज्ञक होता है।¹ समास और असमास दोनों अवस्थाओं में पतिशब्द की शेषो घ्यसखि
(१७०) सूत्र से घिसञ्ज्ञा प्राप्त होती थी । अब इस सूत्र में नियम किया जाता है
कि समास में ही पतिशब्द की घिसञ्ज्ञा हो असमास में नहीं ।
घिसञ्ज्ञा के यहां तीन कार्य होते हैं। १. आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) से टा
को ना आदेश । २. ङे, ङसिँ, ङस् में घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण । ३. अच्च घेः
(१७४) द्वारा ङि को औकार और घि को अकार आदेश । असमासावस्था में पति
शब्द की घिसञ्ज्ञा न होने से ये तीनों घिकार्य न होंगे । तब इन विभक्तियों में सखि-
शब्दवत् प्रक्रिया होगी । यथा-
'पति + आ' यहां यण् आदेश हो—'पत्या' बना ।
'पति + ए' (ङे) यहां भी यण् आदेश करने पर 'पत्ये' बना ।
'पति + अस्' (ङसिँ वा ङस्) इस दशा में यण् आदेश हो ख्यत्यात् परस्य
(१८३) से उकार आदेश करने पर 'पत्युः' बना ।
'पति + इ' (ङि) इस अवस्था में औत् (१८४) से ङि को औकार हो इको
यणचि (१५) से यण् करने पर 'पत्यौ' रूप सिद्ध होता है । समग्र रूपमाला यथा-
प्र० पतिः पती पतयः | प० पत्युः पतिभ्याम् पतिभ्यः
द्वि० पतिम् ,, पतीन् | ष० ,, पत्योः पतीनाम्
तृ० पत्या पतिभ्याम् पतिभिः | स० पत्यौ ,, पतिषु
च० पत्ये ,, पतिभ्यः | सं० हे पते! हे पती ! हे पतयः !
समास में 'पति' शब्द की घिसञ्ज्ञा हो जायेगी; अतः 'हरि' शब्द के समान
रूप चलेंगे । 'भूपति' (पृथ्वी का पति = राजा) में 'भुवः पतिः = भूपतिः' इस प्रकार
षष्ठीतत्पुरुषसमास है। इसकी रूपमाला यथा --
प्र० भूपतिः भूपती भूपतयः | प० भूपतेः भूपतिभ्याम् भूपतिभ्यः
द्वि० भूपतिम् ,, भूपतीन् | ष० ,, भूपत्योः भूपतीनाम्
तृ० भूपतिना भूपतिभ्याम् भूपतिभिः | स० भूपतौ ,, भूपतिषु
च० भूपतये ,, भूपतिभ्यः | सं० हे भूपते! हे भूपती! हे भूपतयः!
इसी प्रकार-नरपति, नृपति, मृगपति, गृहपति, पृथ्वीपति, क्षितिपति, लोक-
पति, देशपति, पशुपति, गणपति, सेनापति प्रभृति शब्दों के रूप जानने चाहियें।
१. इस सूत्र में यद्यपि 'एव' पद के बिना भी सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः द्वारा उप-
र्युक्त नियम सिद्ध हो सकता था; तथापि-'समास में पतिशब्द ही घिसञ्ज्ञक
हो अन्य शब्द न हों' इस विपरीत नियम की आशङ्का से बचने के लिये यहां
मुनि ने 'एव' पद का ग्रहण किया है ।