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सर्वकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 84 में से

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सत्रहवां उल्लास
गुरुनामादि की भावना
देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं गुरुनामादि की भावना को
सुनना चाहती हूँ। साथ ही कुल पदार्थों का तत्त्व मुझे बताओ।
ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो। ‘गु’ शब्द का अर्थ है
अन्धकार और ‘रु’ शब्द का तात्पर्य है उसके दूर करनेवाले से।
अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर करने के कारण ‘गुरु’ नाम पड़ा।
शिष्य को ही वह आचारवान् नहीं बनाता, अपितु स्वयं भी
वैसा आचरण करता है और इस प्रकार संसार में शास्त्रों का
भावार्थ स्पष्ट करता है। यम-नियम आदि योग का उसे अभ्यास
रहता है। इसी से वह ‘आचार्य’ कहा जाता है।
ध्यान के द्वारा जिसमें चित्त को एकनिष्ठ किया जाता है, उसे
‘आराध्य’ कहा जाता है।
देवता का रूप धारण करने और शिष्यों पर कृपा करने तथा
दयामय स्वभाव रखने से ‘देशिक’ नाम पड़ता है।
अपने अन्तःकरण में शान्तिपूर्वक परतत्त्व का चिन्तन करते
रहने से और मिथ्या ज्ञान से रहित होने के कारण ‘स्वामी’ कहा
जाता है।
मन के दोषों से परे होने, वाद-विवाद से दूर रहने, समदृष्टि
होने और मोक्षज्ञान के देनेवाले होने से ‘श्रीनाथ’ नाम पड़ता है।
सारे संसार को अपने वशीभूत रखने से ‘देव’ कहा जाता है।
संसार के बन्धन को काटने और भवबाधा से रक्षा करने के
कारण ‘भट्टारक’ नाम पड़ता है।