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सर्वकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 84 में से

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६८ हिन्दी कुलार्णव
के मध्य में सूर्य-मण्डल में स्थित परा प्रासाद बीज का ध्यान इस
प्रकार करे कि वह तरुण अरुण के समान प्रकाशमान है, जवा-
बन्धूक-पद्मराग जैसी उसकी प्रभा है। पचीस स्पर्शाक्षरों से युक्त
उसकी प्रभा से तीनों लोक प्रकाशित हैं और अपने को भी उसी से
अभिभूत ध्यान करे। तरुणोल्लास के सहित पराप्रासाद बीज का
एक सहस्र आठ बार जप करे। इस विधान से देव, दानव, गन्धर्व,
सिद्ध, किन्नर, विद्याधर, मुनि, यक्ष, नाग, अप्सरायें, स्त्रियाँ, सिंह,
व्याघ्र, सर्प आदि सभी साधक के वशीभूत हो जाते हैं। साधारण
मनुष्यों की क्या बात है। उक्त राजस ध्यान के फलस्वरूप साधक
महान् ऐश्वर्य को प्राप्त कर स्वर्ग के भोगों को पाता है। जिसके
मस्तक में स्मरण करते हुए वह जप करता है वह निश्चय ही उसके
वश में हो जाता है।
इसी प्रकार पराप्रासाद बीज को कल्पान्त की अग्नि की प्रभा-
वाला और अपने को कालानल के समान सर्व प्राणियों के लिए
भयङ्कर ध्यान करता हुआ दक्षिण मुख बैठकर यौवनोल्लासपूर्वक
१००८ बार जप करने से साधक सभी क्रूर, विघ्नकर्ता, दुष्ट और
क्लेशकारी प्राणियों का तत्क्षण नाश करने में समर्थ होता है।
यह काम्य-कर्म के सम्बन्ध में मैंने तुम्हें कुछ अति संक्षेप में
बताया है। अब तुम क्या सुनना चाहते हो ?