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सर्वकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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आठवाँ उल्लास
उल्लास एवं पान-भेद
देवी ने कहा—हे कुलेश ! द्रव्य के उल्लास, द्रव्यपात्रादि
की संगति, रत्युल्लास, श्री चक्र की स्थिति और कौलिक-
शक्तियों की चेष्टा के विषय में बताइए ।
ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो, उल्लास सात प्रकार के
हैं—१ आरम्भ, २ तरुण, ३ यौवन, ४ प्रौढ़, ५ प्रौढ़ान्त, ६
उन्मना और ७ मनोल्लास । तीन तत्वों के होने से 'आरम्भ'
कहा जाता है, तरुण सुख के होने पर तरुणोल्लास माना जाता
है, मन के सम्यक् उल्लास की स्थिति को यौवन कहा जात ।
और दृष्टि, मन, वचन का स्खलन होने पर प्रौढ़ उल्लास स्पष्ट
होता है । चक्र में समुल्लास की स्थिति होने पर यदि पात्र-
मेलन की इच्छा हो, तो इस बात का ध्यान रखे कि अदीक्षित
अनाचारी, प्रपञ्ची, स्त्री-द्वेषी, गुरुओं से अभिशप्त, कुलाचार से
अनभिज्ञ व्यक्ति से द्रव्यपात्र की संगति न हो । सङ्केतयोग
के बिना द्रव्य-सङ्गति न करे । एकपात्र न करे और अपने
पात्र के कारण को भैरव को न प्रदान करे । आसन, भोजन
पात्र, उपानत्, शयन—इन सबकी संगति अनभिज्ञ और अयोग्य
व्यक्ति के साथ नहीं करनी चाहिए । स्त्रियों का उच्छिष्ट तो
ग्रहण करे, किन्तु उन्हें अपना उच्छिष्ट न दे । कनिष्ठ शिष्यों
को ही उच्छिष्ट दे । जो स्नेह, लोभ या भयवश अन्य किसी
को उच्छिष्ट देता-लेता है, वह आपत्ति को प्राप्त होता है।
प्रौढोल्लास होने पर हे देवि ! 'अलि' का त्याग करे ।