कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसाधनमाला ३७
समान है। चर्वण-युक्त पान को ही अमृत कहा गया है। पान
तीन प्रकार का होता है—१ दिव्य, २ वीर और ३ पशु। देवी के
सामने किया जानेवाला दिव्य, मृद्धासन पर ग्रहण किया
जानेवाला वीर और स्वेच्छा से पशुवत् किया जानेवाला पशु-
पान कहलाता है। दिव्य पान भुक्ति और मुक्ति का देनेवाला
है, वीरपान मुक्तिदायक है और पशुपान नरक को पहुँचाता
है। दृष्टि, मन, वाणी और शरीर में जब तक भ्रम नहीं होता,
तभी तक पान करे। इससे अधिक होने पर पशुपान में गणना
होती है। आनन्द के उद्रेक से देवी तृप्त होती है, मूर्च्छा होने
से स्वयं भैरव और वमन से सभी देवता तृप्त होते हैं। कुल-
द्रव्य के सेवन से कुलपरायण लोगों को जो सुख मिलता है,
वह मोक्ष-स्वरूप ही है, यह हे देवि ! सर्वथा सत्य है।
इस प्रकार वटु, शक्ति आदि का पूजन संक्षेप में कहा गया
है। अब हे कुलेशानि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ?