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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 6

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६ क्षेमकूतूहलम्
माता स्वर्गलोक गमन
वैकुण्ठलोकमगमद्गहनं प्रविश्य
सीता सती सुकृतचारुविचारदक्षा।
भर्त्रा सह प्रथितशीलगुणोदयेन
श्रीनिम्बशाखिकुलभूषणरत्नशोभा ॥ १८ ॥
श्री निम्बशाखिकुलभूषण रत्न से सुशोभित (श्री क्षेमशर्मा की मातृ) सुकृत (चारु
विचार रस), युग एवं शीत ये गुण धारणी, अपने पारी के साथ (भर्त्रा सह) आने में
प्रवेश कर दिया है तथा इस रीति से स्वर्गलोक (वैकुण्ठ लोकममगद्वहन प्रविष्य) को
गमन कर गई॥१८॥
क्षेमशर्मा द्वारा ग्रन्थ निर्माण का सूत्रपात
श्रीसूर्यदासगुरुपादसरोजसेवा
हेवाकिना परहितार्थपरायणेन।
क्षेमेण तर्कपदवाक्यविचारदक्षा
ग्रन्थस्य कर्मविधये धिषणा व्यधायि ॥ १९ ॥
क्षेमशर्मा ने अपने पितामह, श्रीसूर्यदास के चरण कमलों में मन को संलग्न
किया तथा परहितार्थ परायण (दूसरों की सेवा में उद्यत), अपने (रस ग्रन्थ के सज्जन
हेतु, तर्क-बुद्धि-वाक्यों में प्रयोग करने हेतु, अपनी दक्षता का उपयोग किया (क्षेमेण
तर्कपाद वाक्य विचार दक्षा)॥१९॥
ग्रन्थं व्यधत्त सुरसं त्वमृतप्रपूर्णं
क्षेमः क्षमाजलनिधिर्द्विजदेवभक्तः।
भूमण्डले कृतनिवासजना यदीय-
पादार्घभावरसिका न सुधां धयन्ति ॥ २० ॥
क्षेमशर्मा क्षमा-सिन्धु, देवता तथा ब्राह्मणों भक्त (द्विजदेवक्तः- क्षमाजल निधि)।
इम क्षेमशर्मा के चरणोदक के इच्छुक भूमण्डल के निवासी अमृत का त्याग कर देते
हैं (न सुधां धयन्ति)॥२०॥
गौरीमतं चक्रवाग्भटभीमसूक्ति-
हारीतसुश्रुतमतं रविसिद्धपाकम्।


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प्रथमोत्सवः ७
क्षेमो भिषग्वरसुधीरवलोक्य सम्यग्
ग्रन्थं व्यधत्त खलु क्षेमकुतूहलाख्यम् ॥ २१ ॥
भिषक् मण्डल में श्रेष्ठ (भिषग्वरमथोरय लोकय सम्यग्) ने गौरी का मत, चरक
तथा वाग्भट तथा भीम के वाक्य, हारीत एवं सुश्रुत के मत तथा सूर्यद्भाग सिद्ध पाक
की भलीभाँति अवलोकन करने के पश्चात क्षेम कौतूहल नामक ग्रन्थ का निर्माण कार्य
अपने हाथों में लिया (ग्रन्थ व्यधत खलु क्षेमकुतूलाख्यम)॥२१॥
सन्ति यद्यपि नरा बहवोऽस्मिन् दोषदर्शनपराः क्षितिपीणे।
अस्ति संन्नपि हि कश्चन लोके यो बहुं प्रकुरुते गुणमल्पम् ॥ २२ ॥
इस भूमण्डल (क्षिति पीछे) पर दोषों का अवलोकन (दोषदर्शनपराः) करने
वाले व्यक्तियों की संख्या बहुतायत से है, फिर भी कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो
(बहुकुरुते गुणमल्पम्) अल्प (थोड़े) गुणों को अधिक विचार से प्रचार प्रसार करते
हैं॥२२॥
ग्रन्थ की विषय तालिका (अनुक्रमणिका- उत्सवानुसार)
इष्टदेवनमस्कारः प्रथमे वंशकीर्तनम्।
सप्तधा द्रव्यपाकस्य परिभाषा निगद्यते ॥ २३ ॥
इस पुस्तक (क्षेमकूतूहलम्) के प्रथम उत्सव में मंगलाचरण- इष्टदेव नमस्कार
तथा ग्रन्थ रचयिता का वंश तथा द्रव्य पाक की सात प्रकार की परिभाषाओं का समावेश
किया गया है॥२३॥
द्वितीये कथितं गेहमन्नरक्षा महानसम्।
पाकयोग्यानि पात्राणि तत्र योग्य उपस्करः ॥ २४ ॥
द्वितीय उत्सव में भोजनालय, विष से अन्न रक्षा, पाकोपयुक्त पात्र तथा भोजन के
उपकरणों का समावेश किया गया है॥२४॥
तृतीयोत्सवके प्रोक्ता वैद्यसूपपतेर्गुणाः।
विरुद्ध्राध्यशनं चैव विषमाहारलक्षणम् ॥ २५ ॥
ऋतुलक्षणचर्या च तुरीयोत्सवके शुभा।
पञ्चमे प्रातरारभ्य रात्रियामार्धकावधि ॥ २६ ॥
यस्य कालस्य यत्कर्म तत्सर्वं च निगद्यते।