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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 5

४ क्षेमकुतूहलम्
ह्लादनिस्तदनुजो बहुतेजा वाग्भटं चरकसुश्रुतशास्त्रम्।
शीलयन्ननिशमीशसादरः शर्म कस्य न ततान भूतले ॥११॥
महाराज महान के अति भ्रातृ (भाई) तेजस्वी ह्लादनि हुए, जिन्होंने अष्टांग हृदय
(वाग्भट) चरक, संहिता सुश्रुतसंहिता आदि आधारित आयुर्वेद शास्त्र का निरन्तर
अध्ययन करके, करके, विश्वओं सभी को (सम्मानपूर्वक) लज्जित किया (सादरः शर्म
कस्य नततान् भूतले)। इस प्रकार उन्होंने अपनी आयुर्वेद ज्ञान के वैशिष्ट्य, पाण्डित्य
तथा कौशल से समस्त आयुर्वेद शास्त्रियों में श्रेष्ठतम् मान्यता प्राप्त की ॥११॥
ह्लादनि पंचपुत्र-
मन्मथो जयशर्मा च वामदेवोऽथ पण्डितः।
सूर्यदासश्च विख्यातो ह्लादनेः पञ्च सूनवः ॥१२॥
ह्लादनि के पाँच पुत्र हुए, जिनके नाम हैं-मन्मथ, जयशर्मा, वामदेव, पण्डित एवं
सूर्यदास ॥१२॥
मन्मथ गुण-
आचारः पटुता विवेकविधयः कौलीनमत्यद्भुता
भैषज्याश्रितचातुरी प्रियवचः पाण्डित्यसत्सङ्गति।
पुण्यं पापविरक्तिशक्तिमतयो दीने सदा दानिता
सर्वो मन्मनथमाश्रितो गुणगुणाः श्रीकान्तपूजारतम् ॥ १३॥
सदाचारी भगनाम विष्णु की पूजन में निरन्तर संलग्न, पटुता, विचारशील-
कार्यकुशल, कुलीन, आश्चर्यचकित करने वाली बुद्धि आदि गुण, चिकित्स कार्य में
चतुर वाणी मधुरता, पण्डित्य, सज्जन संगति, पुण्यान्दु पाप निरुक्ति, शक्ति अनुसार
क्रियाशील बुद्धि तथा निर्धनों को दान देने की निरन्तर प्रवृत्ति (दीने सदा दानिता)- इन
समस्तगुणों से मन्मथ युक्त थे ॥१३॥
क्षेमशर्मा जन्म-
क्षेमशर्ममलिनाथसंज्ञकौ तत्सुतावभवतां मनोरमौ।
यौ विलोक्य न भुवं समागतौ लज्जयेव भिषजौ दिवः पुनः ॥ १४॥
क्षेमशर्मा तथा मल्लिनाथ नामक दो पुत्र मन्मथ के मन को प्रसन्नता करने वाले
हुए (मनोरम)। इनको देखकर (यौ विलोक्य) अश्विनी कुमार, लज्जित होकर पृथ्वी से


प्रथमोत्सवः ५
पुनः (न भुवं समागतौ), स्वर्गा रूढ़ (अश्विनीकुमार चिकित्सक-विशेषज्ञ द्वय) हो
गये॥१४॥
क्षेमशर्मा श्रेष्ठत्व-
निहतनिजविपक्षस्तर्कविद्यास्वकक्षः
कलितसुजनरक्षः काव्यकेलीषु दक्षः।
विधिविहितसुकर्मा संचितानेकधर्मा
विदितसुकविमर्मा राजते क्षेमशर्मा ॥ १५ ॥
स्वविपक्ष परास्तकारी, तर्क विद्या दक्ष, सुजन (सज्जन) रक्षक, काव्यकला
निपुण, विधि-विधात पूर्वक सत्कर्मकारी (विधि वित स्वर्गा), अनेक धर्मों के संरक्षक
(सञ्चितनिक धर्मा) तथा सुकविमर्मज्ञाता (विदित सुकविमर्मा) 'क्षेमशर्मा' जिन्होंने दोनो
मातृवर्ग में प्रसिद्धि अधिक प्राप्त की॥१५॥
क्षेमशर्मा- प्रधान वैद्य के रूप में नियुक्ति
क्षेमो विक्रमसेनभूपतिलकं संसेव्य विद्वद्गुणे-
र्मन्त्रक्षात्रकलाविनिः समभवद्वैषज्यविद्याविभुः ।
पात्रापात्र विवेक्वान् परहिताधाने सदा सादर-
स्तद्धत्ते च पुरे सुधामयजलापूर्णां व्यधाद्वापिकाम् ॥ १६॥
राजाओं में श्रेष्ठ विद्वज्जनों में सर्वोत्तम विक्रम सेन को प्रसन्न करके, मन्त्र
तथा क्षत्रियों की कला-ज्ञाता, क्षेमशर्मा प्रधान वैद्य नियुक्त किए गये। क्षेमशर्मा
(पात्रापात्र विवेकवान्) अपात्र-पात्र का अन्तरपूर्वक विवेकयुक्त तथा (सरहिताधाने)
दूसरों के हित को सदैव चिन्तित-विक्रमसेन द्वारा नगर में, क्षेमशर्मा ने सुधामय
जलपूरित (अमृतमय जल से परिपूरित तालाब (व्यधाद्वापिकाम्-वापी) का सृजन
(संरचना) की॥१६॥
सीतेव सीता जननी यदीयानेयाऽग्रेखा पतिदेवतानाम्।
स क्षेमशर्मा कृतपुण्यकर्मा शर्माणि धत्ते न कथं परेषाम् ॥ १७॥
क्षेमशर्मा की माता, सीता के समान पतिव्रताओं में श्रेष्ठ, तथा पुण्यकर्मकर्त्ता,
क्षेमशर्मा अपने पुण्यकर्मों से समस्त शत्रुओं को परास्त कर दिया अर्नत अपने शत्रुओं
को लज्जित कर दिया॥१७॥