क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ क्षेमकुतूहलम्
(रणक्षेत्र/समरभुवि) में (दन्तुज निचाय काल) कराल स्वरूप शोचिषा शोभिमाल) दानवों
के लिए कालस्वरूप सिद्ध होने वाले में समस्त लोकों में एकमात्र संसक (सर्व
लोकैपाल) या लोकपाल, मतिहमान (बुद्धिमान), मतिशालश्छद्म (कंस आदि दानवों
के वध के लिए, यादव वंश में जन्म लेनेवाले (गोपालबाल) तथा ग्वाल-बाल के रूप
मे वृद्धि पर अवतरण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण (सर्वोत्तम है), (सजयति) की जय
हो, वह हम सभी मनुष्यों (गालियों) पर अपनी क्षय करने की कृपा करें ॥२॥
ग्रन्थकर्तावंशवृत्त
भरद्वाजकुलाम्भोद्यौ वलक्षः पक्षयोर्द्वयोः ।
द्विजराज इति ख्यातो निष्कलङ्कः सदाऽक्षयः ॥ ३॥
पितृकुल का मातृकुल, जो कि समुद्र के समान विशाल था, उस यशस्वी कुल
में चन्द्रस्वरूप द्विजराज नामक वैद्य का जन्म हुआ जो निष्कलंक रहा (चन्द्रमा का
स्वरूप वृद्धि-क्षय होता है, परन्तु द्विजराज सदैव समान रहे) ॥३॥
सन्नारूढान्वयभूषणोऽभूत्सुलक्षणं लक्षणपूर्णगात्रः ।
भिषग्वरो राक्षसराजधान्यां विभीषणं यो विगदं व्यधत्त ॥ ४॥
"द्विजराज" समस्त वैद्यों में श्रेष्ठ (शरीरधारी) रूप में सुशोभित हुए इन्होंने
राक्षस राजधानी लंका में लक्ष्मण तथा विभीषण का चिकित्सा करने का गौरव प्राप्त
हुआ (अर्थात् उन्हें आरोग्य प्रदान करने का सुअवसर प्राप्त किया) ॥४॥
तदन्वये धर्मधरः समजनि भिषजां शिरोरत्नम् ।
येनाघाति जनस्थः सुश्रुतविदुषा रुजां निचयः ॥५॥
अजनि तदनु रामः सत्सुहृत्पूर्णकामः
सुकृतगमितयामः पुण्यकर्मस्ववामः।
गदनिचयविदारी वैद्यविद्याविहारी
बुधजनसुखकारी साधुमार्गप्रचारी ॥ ६ ॥
इन 'द्विजराज' के वंश में जन्में श्रेष्ठ भिषजी शिरोरत्नम् चिकित्साकर उत्पन्न
होकर, सुश्रुताचार्य के सहचारी के रूप में व्याधि समूह से पीड़ित मनुष्यों का
रूजा (रोगों) का नाश किया । धर्मचर के पश्चात् 'राम' का जन्म हुआ, जो सज्जनों
के सहचर (मित्र), पुण्य कर्मों के कर्त्ता (पूर्ण मनोरथी), सुकृत कार्य वसनी, रोग
प्रथमोत्सवः ३
समूह नाशक (गद निचय विदारी), वैद्यक शास्त्र में पारंगत (वैद्य विद्याविहारी),
विद्वान सुख कारक (बुधजन सुखकारी) तथा सुमार्ग निर्देशक-प्रचारक (माधुमार्गप्रचारी)
हुए ॥५-६॥
अभूद्यतिस्तस्य सुतो महौजा विज्ञातभैषज्यकलाकलापः ।
हृषीकचक्रं प्रथमं विजित्य व्यजेष्ट यो व्याधिचयं प्रजानाम् ॥ ७॥
इसके पश्चात् 'यति' जो वैद्य-श्रेष्ठ-महानतेजस्वी-भैषज्यकला कलाप ज्ञाता हुए,
जिन्होंने सर्वप्रथम हृषीक चक्र पर विजय प्राप्त की (प्रथमं विजित्य हृषाक चक्रम्)
प्रजाजनों को उत्पीड़ित करने वाले रोगों के संकुल या समूहों (व्याधिचय प्रजानाम्) को
नष्ट किया ॥७॥
यशोराजो महाराजः प्रह्लादः कामराजकः ।
ह्लादनिस्त्रिपुरारिश्च षद् सुतास्तस्य जज्ञिरे ॥ ८॥
शीलचातुर्याविज्ञानकलाभैषज्यसंपदा ।
षण्णा समानां भाग्येन महाराजोऽधिको भवेत् ॥ ९॥
येनाराधि शकेश्वरो निजकलाकौसल्यमातन्वता
दिल्हीनाम्नि पुरे स्वपाटवबलैर्बन्दी च निर्मोचिता ।
नीतो ग्रामगडाजरो दशपुरैः साकं शकाधीशतो
धन्योऽभून्महराज एव विषजां चक्रैकचूडामणिः ॥ १० ॥
'यति' के छह पुत्रों (षट् पुत्रवान्- षठ षट्सुतास्त्येय) ने जन्म लिया- यशोराज,
महाराज, प्रह्लाद, कामराजक, ह्लादति (ह्रदनि) तथा त्रिपुरारि । इन समान अवस्था युक्त
(षट्सुतास्तस्य) छह भ्रातृवर्ग (छह भाइयों) में भाग्यशील, चतुर, विज्ञान-कला-
चिकित्साशास्त्र (भैषज्यसंपदायुक्ता) में दक्ष-'महाराज' सर्वाधिक श्रेष्ठ माने गये। (महाराजो-
ऽधिकोभयेत्)।
महाराज ने अपने कला-कौशल-योग्यता एवं से अपने अस्तित्व का विस्तार
करते हुए (निजकलाकौसत्यमातन्वता) शक अधिपति को (शकेधर) में स्वपाट में बन्दी
कर लिया। दिल्ली में अपने बन्दी को बन्धन युक्त करवाया (निर्मोचिता) तथा राजा शक
से दस ग्रामों के साथ गडाजर ग्राम (नीतो ग्रामगडाजरी दशपुरैसाकम्) को प्राप्त कर
लिया। इस तरह महाराजा समस्त चिकत्सों में श्रेष्ठ धनधान्यपूर्ण (भिषजां चक्रैक
चूडामणिः) चिकित्सक के रूप में सम्मानित हुए॥८-१०॥