क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 136 में से
संदर्भ में पढ़ेंटुकड़े), द्राक्षा, शुण्ठी, त्वक् (दारुसिता), मरिच के साथ शर्करा से परिपूर्ण करके, ताम्र
कटाह (ताँबे की कढ़ाई) में भेर घृत में डालकर- रत्वविटल (अव्यक्त शब्द) के साथ मन्द
अग्नि पर पाक करते हैं- इस 'दार्थ को' भैमी पोलिका नाम दिया जाता है।
इस व्यंजन को धनवान् व्यक्ति अपने सुजनों परिवार जन-परिजन) के साहचर्य मे
हेमन्त ऋतु में सेवन करने का आनन्द प्राप्त करते हैं॥८६॥
अथ चन्द्रहासानिर्माणविधिः
दीर्घं गोधूमचूर्णं शशधरकिरणप्रोज्ज्वलं तन्माज्ये
दुग्धे क्षिप्तं सखण्डं मृदुपटविसृते योजितं तत्कटाहे।
स्तोकं स्तोकं च दत्तं बहुघृतपचितं दर्विलग्नं न यावत्
सिद्धे वातमद्राक्षामरिचहिमयुता गीयते चन्द्रहासा ॥ ८७॥
चन्द्रहासा
गोधूम चूर्ण-चन्द्रमा की किरण के समान- की घृत में पाक करके, खण्ड
(शर्करा) का मिश्रण दुग्ध के साथ डाल देते हैं- इसको मृदु पर (मुलायम कपड़े) से
विसरण (छानकर), कटाह (कढाई) में मन्द अग्नि पर- स्तोक-स्तोक (थोड़ा-थोड़ा)
घृत छोड़ते हुए, पकाते रहते हैं (बहुघृतपाचितम्) जब तक दर्विलग्नत्व (करछुल से
चिपकना) का त्याग न कर दें (अर्थात् पाकाधीन पदार्थ दर्वी से संश्लिष्ट होना बन्द कर
दे (अर्थात् पाकाधीन पदार्थ दर्वी से संश्लिष्ट होना बन्द करे)। उसका पाक पूर्ण होने
पर, वाताद (बादाम), द्राक्षा (मनुक्का), मरिच तथा कर्पूर, सिद्ध व्यंजन में मिला देते
हैं- इस पदार्थ को 'चन्द्रहासा' नाम दिया जाता है॥८७॥
अथ ललितानिर्माणविधिः
समितां भर्जयेत्तप्ते घृते श्वेतां ततो न्यसेत्।
चारमज्जादिसंयुक्तां पयसा बलहीकृताम् ॥ ८८॥
मरिचैलयुता तज्ज्ञैर्लप्सिका ललिता मता।
लप्सिका बृंहणी वृष्या वातपित्तहरा गुरुः ॥ ८९॥
कफमेदःकरा स्निग्धा सुरुच्याऽऽह्लादकारिणी।
ललिता (लाप्सिका)
क. विधि- समिता (गोधूम चूर्ण-मैदा-कजिका) को तप्त घृत में भर्जन करते
(भूनते) है तथा श्वेता (शर्करा) का मिश्रण कर देते हैं। फिर, इसमें चार मज्जा
(चिरौंजी) बादाम, द्राक्षा, आदि दुग्ध झोल (पयसाबहलीकृताम्) डालकर पका
लेते हैं, तदनन्तर मरिच एवं एला (इलायची) चूर्ण भी मिला देते हैं। व्यंजन को
'ललिता लप्सिका' नाम दिया गया है विद्वान पाकशास्त्रियों द्वारा प्रदत्त संज्ञा।
ख. गुण- १. बृंहणी (शरीरगत धातु- मांसादि वर्धक)
२. वृष्या (ल्वाजीकरण- शुक्रवर्धक)
३. वातपित्तहरा (वात तथा पित्त शामक)
४. गुरु (भारी-दुष्पाच्य-गरिष्ठ)
५. कफमेदकदा (कफवर्धक- मेदकर)
६. स्निग्धा (चिकनी/ चिकनाहट करने वाली)
७. सुरुच्या (रुचिवर्धक रोचक)
८. आह्लादकारिणी (मानसिक प्रसन्नता प्रदान करने वाली)
अथ शुद्धघेवरनिर्माणविधिः
क्षीरेण मर्दितं चूर्णं गोधूमानां सुगालितम् ।
विस्तार्य सर्पिषा पाच्यं कटाहेऽथ सितान्वितम्॥ ९०॥
घृतपूरोऽयमुद्दिष्टः कर्पूरमरिचान्वितः ।
शुद्धघेवर-घृतपूर
गोधूम चूर्ण (अच्छे आटे-छाने हुए- सुगन्धतम्) को दुग्ध के साथ मर्दित करते
हैं तथा शर्करा (सितान्वितम्) मिश्रित करके कटाह मे विस्तार्य (फैलाकर), घृत मे पाक
करते हैं; फिर कर्पूर तथा मरिच चूर्ण का सम्मिश्रण कर देते हैं। इस पदार्थ को घृतपूर
(घेवर) कहा जाता है॥९०१/२॥
अथ नालिकेरजघेवरनिर्माणविधिः
समिता मर्दिता क्षीरे नालिकेरससार्द्रकैः।
अवगाह्य घृते पाच्य घृतपूरोऽपरः स्मृतः ॥ ९१॥
नालिकेरजघेवर-घृतपूर
गोधूम-चूर्ण (समिता) को नारिकेल (नारियल) मज्जा (महीन पीसकर) से संयुक्त
करके, सिता (चीनी/शर्करा) तथा आर्द्रक (अदरक) के कल्क दो दुग्ध मिलकर मर्दन