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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

२०६ क्षेमकुतूहलम्
७. उष्ण (गरम) ८. मधुर (मीठा स्वाद)
९. गुर्वी (गुरु/ दुर्जर) १०. सरा (सुखरेचक-वातानुलोमक)
११. सन्धानकारिणी
अथाङ्गारकर्करीनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कणिका सैन्धवोपेत पाणिना मर्दिता दृढम्।
निर्धूमाङ्गारपचिता विज्ञेयाऽङ्गारकर्करी ॥८०॥
अङ्गारकर्वरी बल्या बृंहणी शुक्ला लघुः।
दीपपी कफहद्रोगपीनसश्वासकासहा ॥८१॥
अङ्गारकर्कटी
क. विधि- कणिका (गेहूँ का चूर्ण) में सैन्धव लवण मिश्रित कर जल के साथ हाथों
से मर्दन (पाणिना मर्दिता) करते हैं, निर्धूम अंगार में पाक करते हैं- इसको
अङ्गारकर्करी नाम दिया गया है।
ख. गुण- १. बल्य (शरीर शक्तिदायक) ६. कफरोग
२. बृंहणी (धातु पोषक-वृद्धिकर) ७. कफरोग
३. शुक्ला (वीर्य जनन) ८. वीनस (रोगनाशक
४. लघु (हल्का-सुपाच्य) ९. श्वास ६-१०)
५. दीपनी (पाचकाग्नि वर्धन) १०. कास
अथ वेष्ठि(टि)कानिर्माणविधिर्गुणाश्च
चणकस्य भवा पिष्टी वा माषसंभवा।
यवानीहिङ्गुलवणैः संयुक्ता गर्भसंस्थिता ॥८२॥
कणिकायाः पोलिकेव कर्तव्या वेटिकाः बुधैः।
वेटिका वातहा मृद्वी स्निग्धोष्णा गुरुपाचिका ॥८३॥
कफघ्नी चणकोन्मिश्रा वातहा माषपिष्टजा।
वेष्टिका
क. विधि- चेणक (चना) या माष (उड़द) की पिष्टी (पिट्ठी) में यावनी, हिंगु तथा
लवण सम्मिलित कर, गोधूम चूर्ण (गेहूँ के आटे) की पिण्ड (लोई) में अन्दर
(गर्भसंस्थिता) पेन भरते हैं। इसे पोलिक के समान अंगार पर पका लेते हैं।
ख. गुण- १. वातहा (वातनाशक)- विशेषतः माषपिष्टी पूर्ण वेटिका
दशमोत्सवः २०७
२. मृद्वी (मृदु/कोमल)
३. स्निग्ध (चिकनाहट उसत्त्वकारी)
४. उष्णा (गर्म)
५. गुरु (भारी/ दुष्पाच्य)
६. पाचन (अग्निवर्धक/ पाचन सहायक)
७. कफनाशक (चना पिट्ठी युक्त पेटिका (पोलिका)
यह चना की पिट्टी भरी हुई वेटिका (पोलिका) के
गुण-कर्म होते हैं।
अथ शुद्धलप्सिकानिर्माणविधिः
घृते तप्ते विनिक्षिप्य कणिकां पाचयेत्समे।
ततोऽल्पमल्पं निक्षिप्य क्षीरं सर्वसमं पचेत् ॥८४॥
ततः खण्डांशकं क्षिप्त्वा पचेद्घृतदर्शनात्।
लवङ्गाढ्या समरिचा लप्सिकेति प्रकीर्तिता ॥८५॥
शुद्ध लप्सिका
कणिका (गेहूँ का चूर्ण/ महीन या मोटा आटा) को तप्त घृत (दवी) भूनते
(पाचन) हैं। फिर अल्पमात्रा में दुग्ध (क्षीर) डालकर- इस मिश्रण का पाक करते हैं
(सर्वसमं पचेत्)। और खण्डांशकम् (चौथाई भाग- शक्कर/ शर्करा) डालकर, घृत क
दिखाई पड़ने तक (पचेद्घृत दर्शनात्) पकाते (भूनते/ दर्वी चालन सहित) पकाते रहते
हैं; इसी में लवंग, मरिच चूर्ण आदि (अन्य सूखेमेवे/ सुगन्धित द्रव्य आदि) मिला देते
हैं- इस पदार्थ को 'लप्सिका' नाम दिया जाता है॥८४-८५॥
अथ भैमीनिर्माणविधिः
श्रेष्ठं गोधूमचूर्ण प्रचुरघृतयुतं नालिकेरेण सार्धं
द्राक्षाखर्जूरशुण्ठीत्वचमरिचयुतं शर्करापूर्णगर्भम्।
पक्वं ताम्रे कटाहे रलविटलरवैः पावके मन्ददीप्तौ
धन्यैर्हेमन्तकाले सुजनपरिवृतैर्भुज्यते विप्रशेषम् ॥८६॥
भैमी
श्रेष्ठ गोधूम चूर्ण (उत्तम कोटि के गेहूँ के आटे) की तप्त घृत मे मर्दन कर (जल
सहित), उसकी पोलिका (लोई) मे नारिकेल मज्जा खण्ड तनु (नारियल गिरि के पतले