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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 136 में से

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पृष्ठ 105

२०४ क्षेमकुतूहलम्
मण्डक
शुद्ध गोधूम पुंज (गेहूं के समूह या ढेर) को, जिसकी आभा विकसित (प्रफुल्लित
जल) के समान हो, शिला पर सैन्धव के साथ कुट्टन (प्रबलदृषादि काम खण्डितः)
करके निस्तुष कर लेते हैं। भूसी निकलने से, यह सुन्दर वस्त्र के समान हो जाता है
(अपगततुषभावोऽसौ नवीनांशुुकश्री)। इस द्रव्य को स्विन्न कर लेते हैं (उबाल लेते हैं
अथवा भून (भृष्ट) कर भोज्य पदार्थ बन जाता है। इस पदार्थ को माण्डक कहा जाता
है। जो आहार योग्य होता है (समुपहरणयोग्यो मण्डकः)॥७३॥
कुकूलकर्परे सिद्धाः काष्ठाङ्गारविपाचिताः।
मण्डकाद्या भयापूर्व गुर्वो बृंहणा मताः ॥ ७४ ॥
अत्युष्णो मण्डकः पथ्यः शीतः स गुरुरुच्यते।
अङ्गारमण्डको ग्राही लघुर्दोषत्र्यापहः ॥ ७५ ॥
क. विधि- कुकूल (भूसी की अग्नि) तथा कर्पर (कटाह/ कणई या मिट्टी-घड़े
आदि की टूटी हुई) को अग्नि-सिद्ध करके मण्डक, यथापूर्व गुरु (गरिष्ठ) तथा
बृंहण (धातुवर्धक) होते हैं गुण युक्त हुआ करते हैं। इसके अनुसार अंगार, खर्पर
तथा कुकूल में पक्व (भूने हुए) मण्डक क्रमशः अधिक गुणवान् होते हैं।
ख. गुण- अंगार पक्व मण्डक
१. अत्यधिक उष्ण (बहुत गर्म) ५. ग्राही (मल बाँधने वाष्प)
२. पथ्य (हितकर) ६. लघु (हल्का सुपाच्य)
३. शीत (शीतल) ७. त्रिदोषनाशक (तीनों दोषों का शामक)
४. गुरु (भारी/ गरिष्ठ)
अथाग्रफलमण्डकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
द्विधाऽऽम्रखण्डं पयसि प्रस्रंश्रुतं
सुलेहितं वल्लिजशर्करैलकैः।
नवाज्ययुक्तं तनुमण्डकान्वितं
सोऽश्नाति यः स्नातिचरः शिवालयम् ॥ ७६ ॥
हृद्यं रुचिकरं बल्यमाम्रमम्लं समीरजित्।
कषायानुरसं स्वादु वर्णदं मधुरं गुरु ॥ ७७ ॥
दशमोत्सवः २०५
आम्रफल मण्डक
क. विधि- आम्रफल खण्ड द्वय (आम्र के फल को दो टुकड़ों में विभाजित कर) जल
में स्विन्न (उबाल) कर लेते हैं। इसमें मरिच चूर्ण, शर्करा तथा एलाचूर्ण मिश्रित
करके, नवीनघृत (नवाज्ययुतम्) तथा पतले मण्डक (तनुमण्डकान्वितम्) को
अवलेह की भाँति बना लेते हैं।
ख. वैशिष्ट्य- इस मण्डक का भक्षण वही करता है, जो स्नान के पश्चात् तत्काल ही
भगवान् शंकर के दर्शन (पूजा-अर्चना हेतु) शिवालय जाता है (सोऽश्नाति यः
स्नातिचरः शिवालयम्)।- यह व्यंजन भगवान शिव केक भक्त के भाग्य में
उपलब्ध होता है।
ग. गुण- १. हृद्य (हृदय बलदायक) ६. स्वादु (स्वादपूर्ण)
२. रुचिकर (रोचन) ७. वर्णदा (देहवर्ण प्रसादन)
३. बल्य (बलवर्धक) ८. मधुर (मीठा)
४. समीरजित् (वातहर) ९. गुरु (भारी/ दुर्जर)
५. कषायानुरस (कषाय रस का अनुबन्ध)
अथ पोलिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
मण्डकः प्रसृतः सूक्ष्मः खर्परादिषु पाचितः।
स एव किमपि स्थूलः सुबुधैः पोलिका मता ॥ ७८ ॥
पोलिका वातहा बल्या कफकृत्पित्तहा हिमा।
स्निग्धोष्णा मधुरा गुर्वी सरा सन्धानकारिणी ॥ ७९ ॥
पोलिका
क. विधि- निस्तुष गोधूम (छिलकारहित गेहूँ) को सूक्ष्म (महीन) कूट कर, खर्पर
आदि में पाचन (भूनकर) करके बनाते हैं। जोकि 'मण्डक' कहलाता है।
यदि इस मुख्य घटक द्रव्य (गोधूम) को स्थूल (मोटा) कूटते-भूनते हैं, फिर इसी
'पोलिका' नाम पाकविद्या (सुबुधैः) के ज्ञाताओं (बुद्धिमानों) ने दिया है।
ख. गुण- १. वातहा (वातनाशक) २. बल्या (देहबलवर्धक)
३. कफकृत् (कफजनक) ४. पित्तहा (पित्तशामक)
५. शीत (शीतल) ६. स्निग्ध (चिकनी/स्नेह शरीरगत
क्षे. कु. 14 उत्पादक)