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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 136 में से

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पृष्ठ 103

२०० क्षेमकुतूहलम्

अथ रोचकदुग्धगोलकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
आगलितं वाससि सप्तवार-
न्विपाचितं गैरिकरागगौरम्।
दृढीकृतं मृन्मयनव्यपात्रे
प्ररोचकं गोलकदुग्धमेतत् ॥ ६१ ॥
लड्डुकं दुग्धसंभूतं रोचकं पित्तनाशनम्।
शुक्रकृन्मधुरं बल्यं किंचित्कफकरं सरम् ॥ ६२ ॥

रोचक दुग्धगोलक
क. विधि- दुग्ध के मेरुआरंग (गैरिकारागगौरम) मिश्रित सफेद वर्ण (रंग) स्रोत
बाद पाकोपरान्त, वस्त्र से छानते है (आयलितं वाससि)।
इस पदार्थ को मृन्मय पात्र (मिट्टी) के नवीन पात्र/भाजन) में रखकर दृढ़ी कृत्
(सान्द्र या गाढ़ा) कर लेते हैं। तदनन्तर इसके मोलक का निर्माण कर लेते हैं-
इनको 'दुग्धगोलक' नाम दिया जाता है।
ख. गुण- दुग्ध सम्भूत लड्क के गुण इस प्रकार हैं-
१. प्ररोचक-रोचक (प्रमुख गुण रुचिकर)
२. पित्तनाशन (पित्तशामक)
३. शुक्रवृत् (वीर्यजनन)
४. मधुर (मीठा/स्वाद)
५. बल्य (शरीरबलवर्धन)
६. किंचित् कफकर (कुछ कफकारक)

एवं विभिन्नद्रव्याणां मोदकनिर्माणनिरूपणम्
दधिशाल्यं तथा दुग्धं कणिका माषपर्पटाः।
सूरणार्द्रककूष्माण्डशालूकामिषमत्स्यजाः ॥ ६३ ॥
नालिकेरप्रियालस्य मज्जा कूष्माण्डकादयः।
एतेषां लडुकाः प्रोक्ताः संभवन्त्यन्यतोऽपि च ॥ ६४ ॥

विभिन्न मोदक
दधि (दही), शालि-तण्डुल (जड़हन धान का चावल), दुग्ध कणिका (गेहूँ का
दशमोत्सवः २०१
आटा-मैदा), माष पर्पट (उड़द की पपड़ी), सूरण (जिमीकन्द), आर्द्रक (अदरक),
कूष्माण्ड (कुम्हेड़ा), शालूक (कमलकन्द), मांस (प्रमथ-प्राणि मांस) = आमिष)
मत्स्य (मछली), प्रियाल (चिरौंजी), कूष्माण्ड मज्जा (कोंहड़े का गूदा) आदि द्रव्यो के
लडुक/मोदक निर्माण का वर्णन किया गया है (एतेषां लडुका प्रोक्ताः), तथा इसीप्रकार
अन्य द्रव्यों के लडुकों (संभवन्त्यन्यतोऽपि) की भी कल्पना करके निर्माणउनको प्रस्तुत
किया जा सकता है। (स्वविधि के अनुसरण द्वारा) ॥६३-६४॥

अथ क्षीरकासारनिर्माणविधिः
दुग्धं विनष्टं निर्मथ्यं शुभ्रखण्डविमिश्रितम्।
मर्दनात्पङ्कतां यातं मन्दवह्नौ च दापितम् ॥ ६५ ॥
संमर्द्य प्रपचेत्तावद्यावद्धूलीसमं भवेत्।

क्षीरकासार
दुग्ध के खोया-भावा (जिसको शास्त्रीय भाषा में 'विनष्टदुग्ध' कहा जाता है) में
शुभ्रखण्ड (सफेदशक्कर) मिश्रित कर, मर्दन करें, तथा मन्द वह्नि पर रखकर पाक
करते हैं, जिससे यह पीत वर्णीय खोया धूलि के समान हो जायेगा (धूली समं भवेत्)
संमर्द्य प्रपचेत्तावद्)। इस रीति से 'क्षीद्रकासार' प्रस्तुत होता हैं॥६५॥

अथ क्षीरतिलावननिर्माणविधिः
लाजाचूर्णं क्षिपेत्पिण्डदुग्धे द्राक्षां सशर्कराम्।
मज्जां नवप्रियालानां ततः कुर्यात्तिलावनम् ॥ ६६ ॥

क्षीरतिलावन
विनष्ट दुग्ध (खोया) में लाजा चूर्ण (धान की खील), द्राक्षा (मुनक्का), शर्करा
तथा नवीन प्रियाल मज्जा (चिरोंजी) की सम्मिलित कर पाक करते हैं, फिर 'तिलमन'
बनाते हैं॥६६॥

अथ कृशरागर्भकनिर्माणविधिः
घृतपक्ककणीकायाश्चूर्णं गर्भितपिण्डकम्।
पिष्टक्षीरकृतं सर्पिः पक्वं कृशरगर्भकम् ॥ ६७॥

कृशरागर्भक
घृत पक्व कणिका (गेहूँ की मैदा) के चूर्ण से गर्मित पिण्ड (छेदवाला पिण्ड)