खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२१
न तु साक्षाद्दोषत्वम् । दोषप्रतिपादकतयाऽपि च दोषत्वं साक्षाद्दोषत्वमनुपजीव्या-
शक्याभिधानमिति प्रधानदोषस्यैव दोषतयोद्भावनं युक्तम्, न सव्यभिचारत्वा-
दीनामिति विभागसूत्रमनर्थकमिति ।
सत्यमेतत् । साक्षाद्दोषत्वं प्रतिबन्धकस्य व्याप्त्यादिविरहस्य वा । विरुद्धत्वा-
दीनां तु तत्प्रमापकतया यद्यपि दोषपक्षनिक्षेपः; तथापि विरुद्धत्वादयो यद्दोषप्रति-
पादकतयोक्तास्तदुद्भावनलाघवानुरोधात् ।
व्याप्त्यादिविरहे तत्रोद्भाव्यमाने न हेतुर्मन्तुं शक्यते ।
अनैकान्तिकत्वादौ तु उद्भाविते व्याप्त्यादिविरहोऽर्थाद् गम्यते, व्याप्त्यादि-
विरहव्यतिरेकेण अनैकान्तिकत्वादेरनुपपन्नत्वात् । यथा 'तस्माद्दीर्घोऽयम्'
अनैकान्तिक आदि अनुमिति-दोषों का प्रतीति में कारण हैं, साक्षात् दोष नहीं हैं। जो
दोष-प्रतिपादक होने से दोष हैं, उनका अभिधान साक्षात् दोष के उपजीवन के बिना
अशक्य है । अतः प्रधान दोष का ही दोषरूप से अभिधान युक्त है, सव्यभिचार आदि
का दोषरूप से कथन युक्त नहीं । एवञ्च सव्यभिचार आदि हेत्वाभास-भेदप्रतिपादक
गौतमीय विभाग-सूत्र अनर्थक है ।
उत्तर—आपकी यह शङ्का युक्त ही है, साक्षाद्दोष तो अनुमिति-प्रतिबन्धक सत्प्रति-
पक्ष या व्याप्ति आदि के विरह ही हैं । विरुद्ध आदि की भी व्याप्त्यादि-विरह के
प्रमापक होने से ही दोषों में गणना है । फिर भी विरुद्ध आदि को जो पृथक् दोषरूप में
कहा गया है, वह उद्भावन में लाघव होने से ही है । वे अपनी प्रतीति में अन्य की
अपेक्षा नहीं करते, यही उद्भावना-लाघव है ।
यदि कहें कि फिर तो व्याप्त्यादि-विरह को ही दोष मानिये, क्योंकि प्रधान वे ही
हैं और उनमें एतादृश लाघव भी है, तो वह भी ठीक नहीं । कारण ‘अनयोर्न
व्याप्तिः’ इस प्रकार व्याप्त्यादिविरह का उद्भावन करेंगे, तो ‘कुतः’ यह हेत्वाकांक्षा
बनी रहेगी और उसके रहते इसका ज्ञान नहीं हो सकता । याने व्याप्त्यादिविरह
अनैकान्तादि हेतुदोष-विशेष से व्याप्त होने के कारण उन्हें भी उसके साथ कहना होगा
और इस तरह गौरव हो जायगा ।
इस पर यह नहीं कह सकते कि ‘तुल्ययुक्त्या अनैकान्तादि का उद्भावन करने पर
भी व्याप्त्यादि-विरह का ज्ञान न हो सकने से तत्कल्पनाकृत गौरव होगा ही। कारण
अनैकान्तिक स्थल में यदि अनैकान्तिक का उद्भावन करें, तो व्याप्त्यादि का विरह
४१
३२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
इत्युक्ते 'अस्मात् ह्रस्वः सः' इत्यर्थाद्गम्यते, न तु तत्र प्रतिपाद्यान्तरापेक्षा, तथे-
हापि 'निरग्नौ धूमोऽस्ती'ति प्रतिपादिते 'अग्निनाऽसौ न व्याप्तः' इत्यर्थाद् गम्यते ।
न हि सम्भवति 'अग्निना च व्याप्तोऽनग्नौ चास्ती'ति ।
अत एवऽऽनन्त्यात् अतीन्द्रियोपाध्यादिलिङ्गानां येषां पूर्वमनभिधानं
समर्थितम् , तेषामनभिधानेऽयमपि हेतुः—तानि ह्युपाधिलिङ्गानि नार्थवशादु-
पाधिमनपेक्षाणि गमयन्ति, येन तेषां व्याप्तिर्नावधारिता तं प्रति तत्प्रतिपादन-
मन्तरेणा अप्रतिपादकत्वस्यापि सम्भवात् । अनैकान्तिकत्वाद्यवगतौ च
व्याप्यादिविरहबोधाय न प्रतिपादनीयान्तरापेक्षा कस्यचित्सचेतसः सम्भवतीति
पूर्वपक्षसङ्क्षेपः ।
एवमसिद्धलक्षणे व्यवस्थिते बाधोऽयमभिधीयते । एतेन कीदृशमसिद्धलक्षणं
व्यवस्थापितमायुष्मता¹ भवति ? व्याप्तत्वपक्षधर्मत्वाभ्यामप्रमितोऽसिद्ध इति तावत्
अर्थाद्गम्य होता है, कारण व्याप्ति-विरह के बिना अनैकान्तिकत्व अनुपपन्न है । जैसे
'उससे यह दीर्घ है' यह कहने पर 'इससे वह ह्रस्व है' यह अर्थाद्गम्य होता है, अन्य
प्रतिपाद्य की अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही 'अग्नि के अनधिकरण में धूम है' ऐसा कहने
पर 'धूम अग्नि से व्याप्त नहीं है' यह अर्थाद्गम्य होता है । कारण यह सम्भव नहीं
कि धूम अग्नि से व्याप्त हो और अग्नि के अनधिकरण में रहता हो ।
'अतीन्द्रिय उपाधियों के लिङ्गों के अनन्त होने से उनका हेतुदोष के रूप में
अभिधान नहीं है' यह जो पीछे कह आये , वहाँ उनके अनभिधान में यह भी हेतु
जानना चाहिए कि उपाधियों के वे लिङ्ग अन्य प्रतिपाद्य की अपेक्षा न करके उपाधि के
अर्थवशात् बोधक नहीं है । कारण जिस पुरुष ने उपाधि की उपाधि-लिंग में व्याप्ति
न जानी हो, सम्भव हैं वह व्याप्ति के प्रतिपादन के बिना उपाधि की अनुमिति न
कर सके । किन्तु किसी सचेता को अनैकान्तिकत्व आदि का ज्ञान होने पर व्याप्यादि-
विरह-बोधन के लिए अन्य प्रतिपाद्य ( व्याप्तिविरह की अनैकान्तिकत्व में व्याप्ति ) की
अपेक्षा नहीं होती, यह पूर्वपक्ष का संक्षेप है ।
खण्डन—इस तरह असिद्ध का लक्षण व्यवस्थित होने पर यह दोष होता है कि
आयुष्मान् ( आप ) ने इस पूर्वपक्ष में उक्त कथन से असिद्ध का कौन-सा लक्षण स्थिर
किया ? 'व्याप्ति-पक्षधर्मता से अप्रमित असिद्ध है' यह लक्षण विरुद्धादि-साधारण है या नहीं,
१. 'आयुष्मता' यहां निन्दा अर्थ में मतुप् प्रत्यय है ।
परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२३
विरुद्धादिषु लक्षणं किं नास्ति, किं वाऽस्ति ? यदि नास्ति, तदा व्याप्तिपक्षधर्म-
ताभ्यां प्रमिता विरुद्धादयः प्राप्नुवन्ति । अथास्ति तदा तेऽप्यसिद्धभेदाः प्राप्ताः ।
अथैतस्मिँल्लक्षणे सत्यपि ते नासिद्धान्तर्भूताः, तर्हि लक्षणमिदमतिव्यापकमपन्नम् ।
अथ यत्र व्याप्तिपक्षधर्मत्वाप्रमितत्वं साक्षादुद्भाव्यते तदसिद्धमित्युच्यते, तर्हि
लक्षणान्तरमिदमुक्तं स्यात् । न चैतदपि युक्तम्; यत्र व्याप्यत्वासिद्धेर्व्याप्तिविरहमात्रं
प्रतिपाद्यते, तत्र व्याप्तिपक्षधर्मताप्रमितत्वानां हानं मिलितं नोद्भाव्यत इति
नासावसिद्धः स्यात् । एवं सर्वासिद्धविशेषमुदाहृत्य प्रसङ्गो विधातव्यः ।
अथ प्रत्येकमिदं लक्षणम्—व्याप्त्यप्रमिततया साक्षादुद्भाव्योऽसिद्धः, पक्ष-
धर्मत्वाप्रमिततया चेति ; तर्हि अन्योन्योदाहरणाव्याप्तेरव्यापकत्वमुभयोः । अथो-
भयोरप्यसिद्धविशेषलक्षणत्वात् अन्योन्यविषयाव्यापकता न दोषायेति मन्यसे । न;
सामान्यलक्षणे निर्वक्तुमशक्ये कथमिदं विशेषलक्षणमपि घटते ।
यदि नहीं, तो विरुद्धादि तो व्याप्तिपक्षधर्मता से प्रमित उपलब्ध होते हैं, उनकी क्या
गति होगी ? यदि यह विरुद्धादि-साधारण है, तो विरुद्धादि भी असिद्ध के ही भेद सिद्ध
हुए । यदि इस लक्षण का समन्वय होने पर भी विरुद्धादि को असिद्ध में अन्तर्भूत न
मानें, तो प्रस्तुत लक्षण अतिव्याप्ति दोष से दूषित हो जायगा ।
समर्थन—'जिसमें व्याप्ति-पक्षधर्मता से प्रमितत्व का अभाव साक्षात् उद्भावित
हो, वह असिद्ध है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन---फिर तो यह लक्षणान्तर हुआ, अतः
प्रतिज्ञाहानिरूप आपका निग्रह हुआ । किञ्च—व्याप्यत्वासिद्ध में केवल व्याप्ति का ही
विरह उद्भावित होता है । एवञ्च वहाँ व्याप्ति-पक्षधर्मताप्रमितत्व का अभाव उद्भावित
न होने से वह असिद्ध नहीं कहलायेगा । इसी तरह आश्रयासिद्ध और स्वरूपासिद्ध
में केवल पक्षधर्मता का विरह ही उद्भावित होने से उनमें भी उक्त लक्षण की अव्याप्ति
हो जायगी ।
समर्थन—प्रत्येक यह लक्षण है अर्थात् 'व्याप्ति की प्रमिति के अभाव का जहाँ
साक्षात् उद्भावन हो, वह असिद्ध है' तथा 'पक्षधर्मता की प्रमिति के अभाव का जहाँ
साक्षात् उद्भावन हो, वह असिद्ध है' इस प्रकार दो लक्षण करेंगे । खंडन—ऐसा
करने पर प्रथम लक्षण की आश्रयासिद्ध में और द्वितीय लक्षण की व्याप्यत्वासिद्ध में
अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि ये लक्षण असिद्धविशेष के हैं, अतः अव्याप्ति
नहीं है, तो सामान्य-लक्षण के निर्वचनीय न होने पर विशेष-लक्षण का भी निर्वचन
हो नहीं सकता; कारण सामान्य-ज्ञान के बिना विशेष की जिज्ञासा ही नहीं होती ।
३२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
अथ अनुमितेरसाधारणहेतुव्यतिरेकोद्भावनं सामान्यलक्षणमस्तु । मैवम्;
सत्प्रतिपक्षोद्भावनं तथेत्यतिव्याप्तेः । भावरूपतया हेतुविशेषणे च निरुपाधित्व-
व्यतिरेकोद्भावनाव्याप्तेः । स्वरूपासिद्धिः सर्वप्रमाणसाधारणो दोष इत्यत्र
तदुद्भावनाव्याप्तेश्च ।
अथोच्यते-व्याप्तत्वपक्षधर्मताभ्यां प्रमितत्वस्य व्यतिरेको यत्र साक्षादुपन्य-
स्यते, सोऽसिद्ध इति । इदमप्यलक्षणम्; अव्यापकत्वात् । यत्र व्याप्त्यादिव्यतिरेक
उपन्यस्यते, तत्र वस्तुगत्या व्याप्तत्वप्रमितेर्व्यतिरेकोऽस्तु नाम, न तु उपन्यस्यतेऽपि,
प्रयोजनाभावात् । व्याप्तिव्यतिरेकदर्शनादेव अनुमानाङ्गवैकल्यात्मनो दोषस्योद्भा-
वनपर्यवसानात् । तस्मात्तत्र प्रमितत्वव्यतिरेकोद्भावनं नास्तीत्यव्यापकत्वं दोषः ।
ननु विशेषणाद्यभावोऽपि वस्तुतो विशिष्टाभाव एवेति नोक्तदोषः । न; यदि
विशेषाणाद्यधिको विशिष्टः, तदा तदभावभेदोऽपि स्यात् । अथ नाधिकः, तदा
समर्थन–'अनुमिति के असाधारण कारण के अभाव का उद्भावन असिद्ध है,'
ऐसा सामान्य-लक्षण करेंगे । खंडन—अनुमिति का असाधारण कारण असत्प्रतिपक्षत्व भी
है और उसका अभाव सत्प्रतिपक्षत्व है । अतः सत्प्रतिपक्ष का उद्भावन भी असिद्ध हो
जायगा । यदि कहें कि 'अनुमिति के भावरूप असाधारण कारण अभाव का उद्भावन
असिद्ध है', तो व्याप्यत्वासिद्ध में अव्याप्ति हो जायगी । कारण अनुमिति का
असाधारण कारण अनौपाधिकत्व भावरूप नहीं है, जिसके अभाव औपाधिकत्व का
उद्भावन करने से वह असिद्ध हो पाता । किञ्च स्वरूपासिद्धि सर्वप्रमाणसाधारण दोष है,
अनुमिति का असाधारण नहीं । अतः उसके उद्भावन में अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन–'जहाँ व्याप्तत्व और पक्षधर्मत्व से विशिष्ट प्रमितत्व का अभाव साक्षात्
उद्भावित हो, वह असिद्ध है' ऐसा लक्षण करेंगे, तो अव्याप्ति न होगी । खंडन—अव्यापक
होने से यह भी लक्षण संभव नहीं । कारण जहाँ व्याप्ति के अभाव का उद्भावन
होता है; वहाँ भले ही वस्तुतः व्याप्ति-प्रमिति का अभाव रहे, किन्तु कोई प्रयोजन न
होने से उसका उपन्यास नहीं होता, क्योंकि व्याप्तिव्यतिरेक के दर्शन से ही अनुमान-
साधनत्व का अभाव उद्भावित हो जाता है । तस्मात् वहाँ प्रमितत्वव्यतिरेक का उद्भावन
न होने से अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—विशेषण (व्याप्ति) का अभाव भी वस्तुतः विशिष्टाभाव (व्याप्ति-
प्रमितत्वाभाव) रूप ही है, अतः उक्त दोष नहीं होगा । खण्डन—यदि विशिष्ट
विशेषण-विशेष्य से भिन्न है, तो विशिष्टाभाव भी विशेषणाभाव से भिन्न ही है । यदि
परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२५
विशेषणाभावत्वान्नान्या सा विशिष्टाभावतेति विशेष्याभावेऽपि तथात्वे पृथगेव
विशिष्टाभावत्वार्थस्तयोरित्यननुगम एव । स्वार्थानुमित्यसिद्धव्यव्याप्तिश्चानुद्भा-
वनादिति ।
अथ ब्रूषे—यत्र व्याप्तत्वपक्षधर्मत्वप्रमितेर्व्यतिरेकः साक्षाच्छक्योपन्यासस्तद-
सिद्धम् , शक्योपन्यासत्वस्यानुपन्यस्तेऽपि सम्भवान्नास्त्यव्यापकतेति ।
नैतदपि युक्तम् ; तथाहि—शक्योपन्यासत्वं किं शक्यस्वरूपनिर्देशत्वमात्रम् ,
उत शक्यप्रमापणत्वम् ? आद्ये अनैकान्तिकादावपि व्याप्तिशून्यत्वं शक्यप्रतिज्ञं
भवत्येव । द्वितीयेऽपि यदि साक्षादिति प्रत्यक्षेणेत्यर्थः, तदा प्रत्यक्षेण प्रमाप-
णीयत्वं व्याप्तिपक्षधर्मताप्रमितिविरहस्य प्रत्यक्षप्रतियोगिकाभावप्रत्यक्षतावादिमते
विरुद्धादावप्यस्तीत्यतिव्याप्तिः । अन्यमते न क्वचिदपीति सर्वाव्याप्तिः ।
अथ व्याप्तिपक्षधर्मताविरहस्यापि प्रत्यक्षप्रमापणीयता विवक्षिता, सा न
वह भिन्न नहीं है, तो जैसे विशेषणाभाव विशिष्टाभाव है, वैसे ही विशेष्याभाव भी
विशिष्टाभाव है, अतः अननुगम हो जायगा । किञ्च– स्वार्थानुमिति में व्याप्त्यादि-
व्यतिरेक का उद्भावन न होने से अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—‘जिस स्थल में व्याप्ति-पक्षधर्मताप्रमितत्व का व्यतिरेक साक्षात् शक्यो-
पन्यास हो, वह असिद्ध है। जहाँ उपन्यास नहीं होता, वहाँ भी वह संभाव्य तो है
ही, अतः अव्याप्ति नहीं होगी ।
खंडन—‘शक्योपन्यास’ शब्द का क्या अर्थ है ? जिसके स्वरूप का निर्देश शक्य
( संभव ) हो यह अर्थ है, अथवा जिसका प्रमापण शक्य हो, यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में
अनैकान्तिक आदि में भी व्याप्ति-व्यतिरेक का उपन्यास शक्य है, अतः अव्याप्ति
तदवस्थ ही है । द्वितीय पक्ष में साक्षात् शब्द का ‘प्रत्यक्षतः’ ऐसा अर्थ करें, तो प्रत्यक्ष-
धर्मिक अभाव को प्रत्यक्षरूप माननेवालों के मत में व्याप्ति-पक्षधर्मता-प्रमिति के विरह
का प्रत्यक्ष से प्रमापणीयत्व विरुद्धादि में भी है, अतः वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । जो
प्रत्यक्षधर्मिक अभाव को प्रत्यक्ष नहीं मानते, अपितु षष्ठ प्रमाण मानते हैं, उनके मत में
सर्वत्र असम्भव हो जायगा । अर्थात् असिद्ध में भी व्याप्त्यादि-प्रमिति के व्यतिरेक की
प्रत्यक्षता नहीं है, कारण वह अनुपलब्धिगम्य है ।
समर्थन—‘जहाँ व्याप्ति तथा पक्षधर्मता का अभाव प्रत्यक्षज्ञान का विषय हो, वह
असिद्ध है’ ऐसा कहेंगे। खंडन-– यह भी युक्त नहीं, कारण प्रमितिघटित उक्त लक्षण-
वाक्य ( ‘व्याप्तत्व-पक्षधर्मत्वप्रमितेर्व्यतिरेकः’ ) में यह अर्थ बोधन करने की सामर्थ्य ही
३२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
युक्ता; उक्तलक्षणवाक्यस्य व्याप्तिपक्षधर्मताविरहानभिधायित्वात् । तद्विरहेऽपि
तात्पर्याभ्युपगमे प्रत्येकसमुदितलक्षणताविकल्पेन अव्यापकत्वापातात् । अतीन्द्रिय-
पक्षादिविरहे च विषये तदभावादव्यापकत्वापत्तेः ।
एतेन यदि लिङ्गानपेक्षत्वं साक्षादर्थः, सोऽपि निरस्तः ।
अथोच्यते—यत्र व्याप्तत्वपक्षधर्मत्वप्रमितेर्व्यतिरेकः प्रतिपादनीयान्तरानपेक्ष-
तया तत्प्रमापकस्य लिङ्गस्योपन्यासव्यतिरेकेण शक्योद्भावनः, तदसिद्धमिति ।
नैतदप्युपपन्नम् ; अतिव्यापकत्वात् । तथाहि—विरुद्धादौ शक्यते तावद्वि-
नहीं है। मान भी लें कि उक्त वाक्य का यह भी अर्थ है, तो यदि उभयविरह का
उद्भावन मिलितरूप में असिद्ध हो, तो जहाँ केवल व्याप्तिविरह का उद्भावन है, वहाँ
अव्याप्ति हो जायगी। यदि एक-एक के अभाव का उद्भावन असिद्ध है, तो व्याप्तिविरह
के उद्भावन को असिद्ध मानने पर पक्षधर्मताविरह के उद्भावनस्थल (आश्रयासिद्ध)
में और पक्षधर्मता-व्यतिरेक के उद्भावन को असिद्ध मानने पर व्याप्तत्वासिद्ध में
अव्याप्ति हो जायगी ।
किञ्च—जहाँ पक्षादि-विरह अतीन्द्रिय है, वहाँ पक्षधर्मता और व्याप्ति का
व्यतिरेक प्रत्यक्षप्रमा का विषय नहीं है; अतः वहाँ भी अव्याप्ति हो जायगी । अर्थात्
मीमांसक द्वारा प्रयुक्त ‘परमाणवः अनित्याः सर्वगतत्वात्’ यहाँ अतीन्द्रिय पक्षधर्मत्व का
विरह है और ‘वन्ध्यासुतः चतुर्वेदाभिज्ञः ब्राह्मणीप्रसूतत्वात्’ यहाँ अतीन्द्रिय व्याप्तिविरह
है । वे प्रत्यक्ष-प्रमा के विषय हो ही नहीं सकते, अतः वहाँ अव्याप्ति है ।
अतएव “साक्षात्' शब्द का लिङ्गानपेक्षत्व अर्थ है, अर्थात् जहाँ व्याप्ति-पक्षधर्मता
का विरह लिङ्ग की अपेक्षा न रखकर प्रमा का विषय हो, वह असिद्ध है” ऐसा जो कहते
थे, वह भी खण्डित हो जाता है । कारण अतीन्द्रिय पक्षस्थल में आश्रयासिद्धि का लिंग
से ही बोध होता है, अतः अतीन्द्रिय आश्रयासिद्धि में अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—‘जहाँ अन्य प्रतिपाद्य की अपेक्षा न रखते हुए तथा प्रमितिजनक हेतु के
उपन्यास के बिना ही व्याप्ति-पक्षधर्मता या तत्प्रमिति के व्यतिरेक का कथन हो सके,
वह असिद्ध है' ऐसा कहेंगे । इस लक्षण में विरुद्ध में लिङ्ग का उपन्यास होने से अति-
व्याप्ति नहीं है । इसी तरह अतीन्द्रिय पक्षस्थल में लिंग का उपन्यास तो है, किन्तु लिंग
में व्याप्ति-प्रतिपादन की अपेक्षा न होने से वहाँ अव्याप्ति भी नहीं है ।
खण्डन—यह भी युक्त नहीं है, कारण ‘शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात्, शब्दोऽनित्यः
परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३२७
पक्षवृत्तित्त्वेऽप्यङ्गभूततर्काभावात् सोपाधिकत्वावगन्तुम् । यदाह—'यत्रानुकूलस्तर्को
नास्ति सोऽप्रयोजकः' इति । तस्मात्तेषामप्येवं लक्षणयोगित्वादसिद्धत्वप्रसङ्गः ।
न च तादृशतर्काविषयत्वमपि प्रतिपादनीयान्तरानपेक्षव्याप्तिपक्षधर्मताप्रमिति-
विरहप्रमापकलिङ्गभूतमेवेति वाच्यम्; तथा सति विरुद्धत्वादिवत्तस्य हेत्वाभासा-
न्तरत्वप्रसङ्गात् ।
अथोच्यते—तथोपन्यस्यमानं तदसिद्धं भवतु । साध्यविपरीतव्याप्तत्वादिना
तु दूष्यमाणं विरुद्धाद्येव तत् । उपन्यासप्रकारभेदाच्च भेदव्यवस्था हेत्वाभासा-
नाम् । न ह्यत्र गोत्वाश्वत्वादिवदत्यन्तासङ्कर इष्यते । किं नाम ? प्रमाणप्रमेय-
भाववत् प्रकारासङ्करमात्रमिति ।
तदप्ययुक्ताभिधानम्; वक्तव्यं हि केन प्रकारेणासिद्धत्वं भवति ? न
प्रमेयत्वात्' इत्यादि विरुद्ध-अनैकान्तिक स्थलों में विपक्षबाधक तर्काभाव से भी व्याप्ति के
व्यतिरेक का अवगम होता है। यह बात उदयनाचार्यजी ने भी कही है कि जहाँ
अनुकूल तर्क न हो, वह हेतु अप्रयोजक (व्याप्तिरहित) है । तस्मात् विरुद्धादि में उक्त
लक्षण चला जाने से अतिव्याप्ति हो जायगी।
समर्थन—विपक्ष-बाधक तर्क का अभाव भी इतर प्रतिपादनीय की अपेक्षा न होने
से लिंगरूप से ही विरुद्धादि में व्याप्तिविरह का अनुमापक है, अतः अतिव्याप्ति नहीं
है। खंडन—ऐसा मानने पर विरुद्धादि की तरह विपक्षबाधक तर्काभाव भी हेत्वाभास
हो जायगा।
समर्थन—कृतकत्व आदि हेतुओं में जिस समय विपक्षबाधक तर्क के अभाव से
व्याप्यभाव का ज्ञान होता है, उस समय वह असिद्ध है और जब साध्याभावव्याप्तत्वा-
दिरूप हेतु से व्याप्यभाव का ज्ञान होता है, तब वह विरुद्धादि है। इस तरह उपन्यास
के प्रकार-भेद से ही हेत्वाभासों में भेद है। यह भेद गोत्व, अश्वत्व के तुल्य नहीं,
किन्तु प्रमाण, प्रमेय के तुल्य है । अर्थात् जैसे एक ही वस्तु चक्षुरादि-प्रमिति की
करण होने से प्रमाण और प्रमिति की विषय होने से प्रमेय है, वैसे ही प्रकार का
यह असङ्करमात्र है ।
खंडन—यह कथन भी अयुक्त है, कारण प्रकार का असङ्कर होने पर भी यह
अवश्य कहना होगा कि किस प्रकार से असिद्धत्व है ? उक्त लक्षणरूप प्रकार से
असिद्धत्व नहीं कह सकते, कारण व्याप्ति-पक्षधर्मताप्रमिति के अभाव का शक्योद्भावनत्व-
३२८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
तावदुक्तलक्षणेन, तथाशक्योद्भावनत्वस्य विरुद्धोचितप्रकारेणोपन्यस्यमानस्य
सम्भवात् । सर्वथा निष्प्रकारकस्य असिद्धधर्मिणस्तदुद्भावनाशक्यत्वात् ।
न च तथाशक्योद्भावनत्वमप्युद्भाव्यते असिद्धेः, येन प्रकारभेद-
व्यवस्थितिरनेन भवेत् ।
न च शक्योद्भावनपदस्थाने उद्भाव्यमानत्वमिति कृते निस्तारः; सोपाधित्वा-
द्युद्भावने प्रमित्यभावोद्भावनं व्यर्थत्वान्न क्रियत इति तद्व्यापकत्वं प्रसज्येतेति
प्रागेवोक्तत्वादिति ।
एतेन 'असिद्धः साध्यसमः' इति प्रत्युक्तम्; यथाकथञ्चित्साध्यसाम्यस्य सर्वसा-
धारण्यात् । साम्यविशेषस्य चोक्तप्रकारपर्यवसानव्यतिरेकेण अन्यस्यासम्भवात् ।
रूप उक्त प्रकार विरुद्ध के उचित प्रकार ( लक्षण ) द्वारा कथित कृतकत्वादि में भी
विद्यमान है। अर्थात् यदि असिद्ध का उक्त लक्षण करें, तो विरुद्धस्थल में असिद्धरूप
हेत्वाभास से ही अनुमिति का प्रतिबन्ध होने से विरुद्ध की पृथक् हेत्वाभास में गणना
व्यर्थ हो जायगी ।
समर्थन—'जहाँ साध्य के अभाव से व्याप्तत्वरूप विरुद्धत्व का उद्भावन न हो और
व्याप्तिपक्षधर्मता-प्रमिति के व्यतिरेक शक्योद्भावनत्व का उद्भावन हो, वह असिद्ध है।'
खण्डन—ऐसा कोई स्थल नहीं है, जहाँ विरुद्धादि प्रकार न हों, केवल असिद्ध
ही हो । किञ्च—स्वार्थानुमिति में असिद्धस्थल में भी शक्योद्भावनत्व का उद्भावन
नहीं होता । फिर उक्त स्थल में उक्त प्रकार से भी व्यवस्था कैसे होगी ?
समर्थन—'शक्योद्भावन' पद के स्थान में 'उद्भावन' मात्र देंगे अर्थात् 'व्याप्ति-
पक्ष-धर्मताप्रमिति के व्यतिरेक का जहाँ उद्भावन हो, वह असिद्ध है, ऐसा कहेंगे ।
विरुद्धादि में यद्यपि उक्त व्यतिरेक है, तथापि उसका उद्भावन नहीं होता, अतः अति-
व्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—व्याप्यत्वासिद्ध स्थल में केवल व्याप्ति के व्यतिरेक का ही
उद्भावन होता है, प्रयोजन न होने से व्याप्तिप्रमिति के व्यतिरेक का उद्भावन नहीं
होता । एवञ्च वहाँ अव्याप्ति ही जायगी, इत्यादि पीछे कह ही आये हैं ।
समर्थन—'साध्य से सम असिद्ध है।' खण्डन—यदि अस्तित्व, ज्ञेयत्व आदि धर्म
से साम्य की विवक्षा करें, तो विरुद्धादि हेतु भी साध्यसम होने से असिद्ध हो जायेंगे ।
यदि साम्यविशेष की विवक्षा करें, अर्थात् जैसे 'साध्य, साध्य से व्याप्तत्वरूप से प्रमित
नहीं है, एक होने से' तथा 'साध्य, पक्षधर्मता से प्रमित नहीं है, संदिग्ध होने से' इस
तरह व्याप्ति-पक्षधर्मता से जो प्रमित न हो, वह साध्यसम है' ऐसी विवक्षा करें, तो उक्त
प्रकार में ही पर्यवसान होगा और उन प्रकारों का खण्डन कर ही चुके हैं ।
परिच्छेद ] [ विरुद्ध-लक्षण का खण्डन ३२६
लक्ष्णान्तरेषु चोक्तदूषणप्रकारा यथासम्भवमिह योजनीया इत्यलं
विस्तरेणेति ।
विरुद्ध-लक्षण-खण्डनम्
अपिच—असिद्धलक्षणविशेषणेषु प्रमाणाव्यवच्छेदकव्यतिरिक्तेन यद्व्य-
वच्छेद्यं तत् किं केनचिद्विरुद्धं केनचिदन्यदिति चेत्, विरुद्धमेव किमुच्यते ?
तथाहि—साध्यविपरीतव्याप्तो विरुद्ध इत्याहुः । तन्न; साध्यव्यतिरेकेण हि
व्याप्तिः कात्स्न्र्येन वा, अनौपाधिको वा स्वाभाविको व, सम्बन्ध इत्याद्युक्तिभिः
सविशेषणः सहभाव एव निरुच्यते । तथा सति च साध्यव्यतिरेकेण सामानाधि-
करण्यमेव विशेषणविशेषयुक्तं विरुद्धत्वमित्युक्तं स्यात् । यदा चैवं तदा साध्य-
व्यतिरेकसामानाधिकरण्यमेव हेतोरगमकत्वे समर्थमिति तन्मात्रमुद्भाव्यम्, वृथा
विशेषणप्रक्षेपः । तथा चानैकान्तिक एवायं स्यात् ।
असिद्ध के अन्य लक्षणों में भी उक्त दूषणों की या उक्त दूषणों के सदृश
अन्य दूषणों की यथासंभव योजना करनी चाहिए, ग्रन्थ का विस्तार व्यर्थ है।
विरुद्ध-लक्षण का खण्डन
किञ्च—'व्याप्ति-पक्षधर्मता-तत्प्रमिति के व्यतिरेक का जहाँ लिङ्ग के उपन्यास के
बिना कथन हो सके, वह असिद्ध है' इस लक्षण में प्रमित्यन्त पद प्रमाण (सद्धेतु)
का व्यवच्छेदक है, किन्तु 'लिङ्ग के उपन्यास के बिना' तथा 'शक्योन्नयान' इन विशेषणों
के व्यवच्छेद्य कौन हैं ? यदि कहें कि किसी का व्यवच्छेद्य विरुद्ध है और किसी का
स्वार्थानुमितिस्थितीय असिद्ध का संग्रह फल है, तो विरुद्ध ही क्या वस्तु है ? अर्थात्
लक्षण न होने से वह अनिर्वचनीय ही है। अतः व्यवच्छेद्य के न होने से उक्त
विशेषण व्यर्थ ही हैं ।
समर्थन—'साध्याभाव से व्याप्त हेतु विरुद्ध है ।' खण्डन—ऐसा नहीं कह
सकते, कारण यहाँ साध्याभाव के साथ व्याप्ति पदार्थ विशेषणयुक्त सहभाव ही कहना
होगा, क्योंकि सार्वत्रिक, अनौपाधिक या स्वाभाविक सम्बन्ध ही व्याप्ति है। एवञ्च
साध्याभाव के साथ विशेषण (सार्वत्रिकत्वादि) से युक्त सहभाव (सामानाधिकरण्य)
ही विरुद्ध हुआ। यदि ऐसा ही है, तो साध्याभाव के साथ सामानाधिकरण्य ही हेतु
के व्याप्तिशून्यत्व में समर्थ प्रयोजक है, अतः उतना ही लक्षण कहना चाहिए,
विशेषण का प्रक्षेप व्यर्थ है । तथाच यदि विशेषण न दें, तो विरुद्ध भी अनैकान्तिक
ही हो जायगा ।
४२
३३० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
ननु साध्यव्यतिरेकसम्बन्धो यद्यपि विरुद्धानैकान्तिकयोर्द्वयोरप्यस्ति, तथापि
वस्तुगत्या स्वाभाविकोसौ विरुद्ध एवेत्येतावन्मात्रविशेषविवक्षया विरुद्धस्यानै-
कान्तिकाद्भेदोपन्यासः ।
मैवम् ; दत्तोत्तरत्वात् । वस्तुगत्या सन्नप्ययं विशेषो नोद्भावनार्ह इत्युपेक्षणीय
इत्युक्तम् । तथाहि—नेदमस्य साधकम्, एतत्साध्यं प्रति विरुद्धत्वादित्यभिधीय-
माने विरुद्धशब्दार्थनिरुक्तौ विशेषणाधिक्यस्योक्तन्यायेन दुष्परिहरत्वात् ।
अत एव 'अनैकान्तिके सन्देहेन प्रत्यवस्थानम्, विरुद्धे तु व्यतिरेकनिश्चयेनेति
विशेषादनयोर्भेदेनोपन्यासः' इत्यप्यनवकाशम् ; अनुमितिहेतुव्यतिरेको हि हेतुदोषः,
अनुमितिहेतुश्चैको व्याप्तिः, ततस्तदभावस्य दोषत्वात्तावन्मात्रं ज्ञाप्यम् । तच्च
हेतुविपक्षसम्बन्धोद्भावनमात्रादेव गम्यते । तस्मादनुमितिहेतुव्याप्तिप्रमिति-
व्यतिरेकबोधनाय संशये व्यतिरेकनिश्चये चोद्भाव्यमानेऽपि 'कुतस्ताविवे'त्यत्र
समर्थन—यद्यपि साध्याभाव के साथ विरुद्ध और अनैकान्तिक दोनों का सम्बन्ध
है, तथापि स्वाभाविक सम्बन्ध विरुद्ध में ही है । केवल इसी दृष्टि से विरुद्ध से
अनैकान्तिक का भेद कहा गया है ।
खण्डन—वस्तुतः सार्वत्रिकत्व-निवेशकृत ही यह भेद है । किन्तु यह भेद कथन
के योग्य नहीं, अतः उपेक्षणीय हैं, यह हम कह ही चुके हैं । देखिये—'यह हेतु
साध्य का साधक नहीं है, साध्य-विरुद्ध होने से' यह कहने पर तद्धटक विरुद्ध-
शब्दार्थ की निरुक्ति में उक्त रीति से विशेषण के वैयर्थ्यका परिहार किया ही नहीं
जा सकता । तथाच यह हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हो जायगा ।
समर्थन—अनैकान्तिक में हेतु में साध्याभाव की व्याप्ति का सन्देहमात्र
रहता है और विरुद्ध स्थल में हेतु में साध्याभाव के साथ व्याप्ति का निश्चय रहता
है, यही दोनों में परस्पर भेद है । खण्डन—यह भी युक्त नहीं, कारण अनुमिति-
हेतुओं का अभाव ही हेतु-दोष है । अनुमिति का एक हेतु व्याप्ति है और दूसरा
पक्षधर्मता । एवञ्च इन दोनों का अभाव ही दोष होने से तन्मात्र ही ज्ञाप्य है और
उसका ज्ञान हेतु के विपक्ष में सम्बन्धमात्र से ही हो जाता है । तस्मात् अनुमिति-हेतु
व्याप्ति-प्रमिति के अभाव के बोधनार्थ पूर्वोक्त सन्देह या निश्चय का उद्भावन भी करें,
तो 'वे (उक्त सन्देह या निश्चय) ही कैसे हुए ?' ऐसी जिज्ञासा होने पर विपक्षसम्बन्धमात्र
तथा नियत विपक्षसम्बन्ध अवश्य कहने होंगे । एवञ्च व्याप्ति या तत्प्रमिति के अभाव
परिच्छेद ] विरुद्ध-लक्षण का खण्डन ३३१
विपक्षसम्बन्धमात्र नियततत्सम्बन्धाववश्योपन्यासाविति तत्सम्बन्धमात्रमेवास्तु ।
व्याप्तेस्तत्प्रमितेश्च व्यतिरेकस्य लिङ्गत्वानुद्भाव्यम्, कृतमितराभ्यामिति ।
लकारभेदप्रयोगे तैस्तैर्लकारैः कालविषयविशेषप्रतिपादनाद्विभक्तिभिर्लिङ्ग-
सङ्ख्याज्ञापनवत् ‘पर्वतोऽग्निमानि’त्यादौ धर्म्यादिप्रतिपादनवच्च नेदं घटते, तत्र
तेषामतात्पर्यविषयाणामपि पदप्रयोगे विशिष्टबोधने वा अन्यथासिद्धानां यथा
बोधनं तथा यद्यत्रापि व्याप्तेरतात्पर्यविषयत्वं तदनैकान्तिकसाधारणादेव । अन्यथा
उक्तदोषापरिहारादेवेति ।
अनैकान्तिकत्वञ्च ऽनुद्भावयता अनधिगच्छता वा विरुद्धमशक्योद्भावन-
मशक्याधिगमञ्चेति तदुपजीवित्वान्न पृथक् दूषणम्, विशेष्यप्रतिपादनं विशेष्या-
वगमञ्च विना विशिष्टप्रतिपादनस्य विशिष्टावगमस्य चाशक्यत्वात् ।
एवमन्यत्रापि विशेषणस्याप्रयोजकता विशेष्यस्य सामर्थ्ये स्वयमूहनीया ।
का कारण होने से विपक्ष में सम्बन्धमात्र का ही कथन करना चाहिए, सन्देह या
निश्चय का उपन्यास व्यर्थ है ।
‘शब्दो नित्योऽस्ति’ इस प्रतिज्ञा-वाक्य में कालसामान्य की विवक्षा होने से वर्तमान
के प्रतिपादन के तुल्य तथा ‘वासः परिधेहि’ यहाँ कर्ममात्र की विवक्षा होने से लिङ्ग-
संख्या के बोधन के तुल्य ‘पर्वतो वह्निमान्’ यहाँ विशिष्ट के बोध में तात्पर्य होने से
धर्म्यादि के बोध के तुल्य सम्भव नहीं है । कारण जैसे उक्त स्थलों में तात्पर्य का विषय
न होने से पदप्रयोग या विशिष्ट के बोध में अन्यथासिद्ध ( तात्पर्य का अविषय ) काल-
विशेषादि का बोध होता है, वैसे ही यदि विरुद्धस्थल में व्याप्ति के बोध को तात्पर्य
का विषय मानें, तो लक्षण अनैकान्तिक-साधारण हो जायगा । यदि व्याप्तिबोध को
तात्पर्य का विषय न मानें, तो लक्षण में उक्त प्रकार से व्याप्ति का निवेश व्यर्थ हो
जायगा ।
किञ्च—अनैकान्तिक के अज्ञान तथा अनुद्भावन के काल में विरुद्ध का ज्ञान
तथा उद्भावन अशक्य है । कारण साध्याभाव के साथ सम्बन्धरूप विशेष्य के ज्ञान
और प्रतिपादन के बिना सार्वत्रिकसम्बन्धरूप विशिष्ट का अवगम और प्रतिपादन
अशक्य है, अतः विशेष्य-ज्ञान उपजीव्य है ।
इसी प्रकार अन्यत्र भी विशेष्य की सामर्थ्य होने पर विशेषण का वैयर्थ्य जानना
चाहिये । देखिए—‘इदं साधारणं साधारणानैकान्तिकत्वात्’ यहाँ ‘साधारण’ विशेषण तथा
‘इदमसाधकं सपक्षकविपक्षगतत्वात्’ यहाँ सपक्ष विशेषण व्यर्थ है । इसी प्रकार ‘शब्दो
३६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
तद्यथा—‘इदमसाधकं साधारणानैकान्तिकत्वादित्यत्र साधारणोति विशेषणे,
सपक्षविपक्षगतत्वादित्यत्र सपक्षगतत्वेऽप्युद्भाव्यमाने; एवमसाधारणेऽपीति ।
‘इदमसाधकं जातित्वादिति जातित्वविवेचने स्वव्याघातकमुत्तरं जातिरिति स्वव्या-
घातकत्वस्यैव, ‘सर्वमसत् ज्ञेयत्वादित्याद्यजातिजातिसाधारणस्य दूषणसमर्थत्वे-
नोत्तरत्वाभिधान इति ।
किञ्च—साध्यविपरीतेति साध्याभावेत्यर्थे यदा अभावात्मकमेव साध्यः
क्वचिद्भवति, तत्र तद्विपरीतस्य भावत्वात्तदव्यापकत्वं लक्षणस्य ।
न च विपरीतशब्दस्य विरोधिमात्रार्थत्वे भावाभावोभयव्याप्तिरिति वाच्यम् ।
सहानवस्थानं हि भावाभावयोर्विरोधोऽभ्युपेयते । अनवस्थानञ्च संसर्गनिषेधः ।
स च भावाभावयोरन्योन्यानवस्थानमेव, परस्परप्रतिषेधरूपत्वात्तयोः । तथा च सति
भावाभावयोः स्वरूपस्यानुपसङ्ग्रहे प्रत्येकमव्याप्तिः मिलितस्यासम्भव एवेति ।
वक्ष्यामश्च भावाभावयोर्विरोधनिरुक्तिनिराकरणमुपरिष्टादिति ।
नित्यः शब्दत्वात्' इस असाधारण स्थल में 'शब्दत्वम्, असाधकम्, असाधारणानैकान्तिका
त्वात्' यहाँ 'असाधारण' विशेषण तथा 'शब्दत्वम्, असाधकम्, सपक्षविपक्षव्यावृत्तत्वात्'
यहाँ 'विपक्ष'-विशेषण व्यर्थ जानना चाहिए । 'इदमसाधकं जातित्वात्' यहाँ 'स्वव्याघातक
उत्तर जाति है' यह जातिशब्दार्थ मानने पर 'स्वव्याघातकत्व' ही 'सर्वम्, असत्, ज्ञेयत्वात्'
इस अजातिस्थल के तुल्य दूषण में समर्थ है, अतः 'उत्तर' इस विशेष्य-अंश का अभिधान
व्यर्थ है ।
किञ्च—लक्षण में 'साध्यविपरीत' शब्द का यदि 'साध्याभाव' अर्थ करें, तो जहाँ
अभाव ही साध्य है, वहाँ साध्यविपरीत भाव ही होता है, अभाव नहीं । अतः वहाँ
लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—लक्षणघटक 'विपरीत' शब्द का विरोध अर्थ है । अतः उससे भाव और
अभाव दोनों का ग्रहण होने से अव्याप्ति नहीं है । खण्डन — सह-अनवस्थान ही भाव
और अभाव का विरोध है । अनवस्थान संसर्ग का निषेध है और वह भाव-अभाव के
अन्योन्य का अनवस्थानरूप है । कारण भाव का प्रतिषेधरूप अभाव है और अभाव का
प्रतिषेधरूप भाव है । ऐसी स्थिति में 'विरोध' शब्द से दोनों के स्वरूप का संग्रह नहीं
होगा । अतः लक्षण में अभाव का उपादान होने पर जहाँ अभावरूप साध्य 'विपरीत
है, वहां अव्याप्ति हो जायगी । लक्षण में भाव, अभाव दोनों का 'विपरीत' शब्द से
ग्रहण करें, तो सर्वत्र असम्भव हो जायगा । साथ ही भाव तथा अभाव के विरोध की
निरुक्ति का खण्डन भी आगे किया जायगा ।
परिच्छेद ] सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन ३३३
सव्यभिचारलक्षणखण्डनम्
किञ्च—व्याप्तिपदेन लक्षणप्रविष्टेन किं व्यवच्छेद्यम् । अनैकान्तिकमिति
चेत्, किं तदनैकान्तिकम् ? तथाहि—'अनैकान्तिकः सव्यभिचार इत्यलक्षणम् ।
सव्यभिचारत्वं हि यदि विपक्षवर्तित्वं, तदानीं विरुद्धेऽपि प्रसङ्गः, असाधारणानेका-
न्तिकान्याप्तिश्च । अथ सपक्षविपक्षगताभावता, तदा साधारणोदाहरणाव्यापकत्वम् ।
अथोच्यते—सव्यभिचारत्वं सपक्षविपक्षसाधारणता अभिप्रेता । सा चान्वयेन
साधारणस्य व्यतिरेकेणासाधारणस्यानैकान्तिकस्य सङ्ग्राहिका । सपक्षविपक्षसाधा-
सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन
किञ्च—विरुद्ध के लक्षण में प्रविष्ट व्याप्ति का व्यवच्छेद्य क्या है ? यदि अनैका-
न्तिक है, तो अनैकान्तिक क्या वस्तु है । अर्थात् लक्षण न होने से वह अनिर्व-
चनीय है । एवञ्च व्यावर्थ न होने से लक्षण में व्याप्ति का निवेश व्यर्थ हो जायगा ।
निर्वचन—अनैकान्तिक ही उसका व्यवच्छेद्य होगा । खण्डन—यह ठीक नहीं,
क्योंकि अनैकान्तिक सिद्ध ही नहीं है । लक्षण से उसकी सिद्धि हो सकती है, किन्तु
उसका कोई लक्षण ही नहीं हैं । यदि कहें कि 'अनैकान्तिक सव्यभिचार है', तो यह
लक्षण युक्त नहीं है । कारण सव्यभिचार क्या है, क्या वह विपक्षवृत्तित्व है, सपक्ष-विपक्ष-
वृत्तित्व है या सपक्ष-विपक्षसाधारणता है ? यदि विपक्षवृत्तित्व को सव्यभिचार कहें, तो
‘शब्दोऽनित्यः कार्यत्वात्' इस विरुद्ध में अतिव्याप्ति तथा 'शब्दोऽनित्यः आकाशविशेष-
गुणत्वात्' इस असाधारण में अव्याप्ति हो जायगा । यदि सपक्ष-विपक्ष में जिसका अभाव
हो, वह सव्यभिचार है, तो 'शब्दोऽनित्यः प्रमेयत्वात् इस साधारण अनैकान्तिक में
अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—सपक्ष-विपक्ष में साधारणता सव्यभिचारत्व है । वह अन्वय से साधारण
का और व्यतिरेक से असाधारण का संग्राहक है । यदि केवल अन्वय से सपक्ष-विपक्ष-
साधारणता कहें, तो असाधारण में और यदि केवल व्यतिरेक से कहें, तो साधारण
में और यदि अन्वय-व्यतिरेक दोनों से सपक्ष-विपक्षसाधारणता कहें, तो दोनों में अव्याप्ति
१. 'एकस्मिन्नेव साध्ये नियतः एकान्तः, न एकान्तः अनैकान्तः । व्यभिचारश्च सम्बन्धा-
नियमस्तेन सहितः सव्यभिचारः । एवञ्च अनियतसाध्यसम्बन्धोऽनैकान्त इति ।' अर्थात् एक ही
साध्य में जो नियत हो, वह एकान्त है और जो एकान्त नहीं, वह अनैकान्त है । इसी तरह
व्यभिचार का अर्थ है ( व्याप्ति )-सम्बन्धका अनियम, उसके सहित सव्यभिचार है । अर्थात् जिस
हेतु का साध्य के साथ नियत ( व्याप्ति )-सम्बन्ध न हो, वह सव्यभिचार हेत्वाभास है ।
३५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
रणता अन्वयेन व्यतिरेकेण वेति विशेषणवत्तया न विवक्षिता, अतः साधारणा-
साधारणानेकान्तिकयोरुभयोरपि सङ्ग्रहः ।
'विवादाध्यासितं क्षणिकं सत्त्वादि'त्यादेरनुपसंहार्यस्यापि सपक्षाविपक्षगतत्वा-
भावेन साम्यमिति ।
विचार्यमेतद् व्याख्यानम् , परमस्तु तावदापातः ; तथापि व्यतिरेकेण
सपक्षाविपक्षसाधारणतायाः सपक्षाव्यापके सद्धेतौ धूमविशेषादौ गतत्वेनातिव्यापक-
त्वात् । यदि त्वस्य दोषस्य परिहाराय सर्वविपक्षसपक्षसाधारणमनैकान्तिकमिति
ब्रूषे, तदा व्यतिरेकमात्रेण सर्वसपक्षाविपक्षसाधारणता धूमानुमानादिगामिनी न
भवतु नाम । अन्वयेन तु सर्वसपक्षाविपक्षसाधारणता विपक्षसपक्षैकदेशगामिनं
साधारणानेकान्तिकं 'शब्दो न नित्यः प्रत्यक्षग्राह्यत्वादि'त्यादिकं न सङ्गृह्णाती-
त्यव्याप्तिरित्येकं सन्धित्सतोऽपरं प्रच्यवते ।
हो जायगी, अतः विशेष की विवक्षा नहीं है । किन्तु जहाँ अन्वय से समन्वय की
सम्भावना हो, वहाँ अन्वय से और जहाँ व्यतिरेक से लक्षण के समन्वय की सम्भावना
हो, वहाँ व्यतिरेक से सपक्ष-विपक्षसाधारणता का ग्रहण करना चाहिए ।
'विवाद-विषय सब वस्तुएँ क्षणिक हैं, ज्ञेय होने से' इस अनुपसंहारी का भी,
सपक्ष-विपक्ष न होने से ही, व्यतिरेक से सपक्ष-विपक्षसाधारणता बन जाने के कारण
संग्रह हो जाता है ।
खंडन—यह व्याख्यान विचारणीय है, अर्थात् विचारणीय होने से रमणीय अवश्य
है, किन्तु आपाततः ही । फिर भी व्यतिरेकतः यत्किञ्चित् सपक्ष-विपक्षसाधारणता
सपक्षाव्यापक ( तप्त अयोगोलक में अवृत्ति ) धूमरूप सद्धेतु में भी है, अतः उसमें
अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि इस दोष के वारणार्थ 'सर्वसपक्ष-विपक्ष-साधारणता'
को अनैकान्तिक कहें, तो भले ही व्यतिरेक से सब सपक्षविपक्ष-साधारणता धूमरूप
सद्धेतु में न होने से वहाँ अतिव्याप्ति न हो, फिर भी अन्वय से सर्व-सपक्ष-
विपक्षसाधारणता विपक्ष ( आत्मा ) और सपक्ष ( घटादि ) के एकदेश में स्थित
'शब्दोऽनित्यः प्रत्यक्षग्राह्यत्वात्' इस साधारण अनैकान्तिक में अव्याप्ति हो जायगी ।
कारण सब सपक्षों में गुरुत्व गुण और सब विपक्षों में आकाश भी आते हैं, उनमें
अन्वय से प्रत्यक्षत्व नहीं है । इस प्रकार आप एक दोष का परिहार करना चाहते
हैं, तो अन्य दोष टपक पड़ता है ।
३३४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
रणता अन्वयेन व्यतिरेकेण वेति विशेषणवत्ता न विवक्षिता, अतः साधारणा-
साधारणानेकान्तिकयोरुभयोरपि सङ्ग्रहः ।
'विवादाध्यासितं क्षणिकं सत्त्वादि'त्यादेरनुपसंहार्यस्यापि सपक्षविपक्षगतत्वा-
भावेन साम्यमिति ।
विचार्यमेतद् व्याख्यानम् , परमस्तु तावदापातः ; तथापि व्यतिरेकेण
सपक्षविपक्षसाधारणतायाः सपक्षव्यापके सद्धेतौ धूमविशेषादौ गतत्वेनातिव्यापक-
त्वात् । यदि त्वस्य दोषस्य परिहाराय सर्वविपक्षसपक्षसाधारणमनेकान्तिकमिति
ब्रूषे, तदा व्यतिरेकमात्रेण सर्वसपक्षविपक्षसाधारणता धूमानुमानादिगामिनी न
भवतु नाम । अन्वयेन तु सर्वसपक्षविपक्षसाधारणता विपक्षसपक्षैकदेशगामिनं
साधारणानेकान्तिकं 'शब्दो न नित्यः प्रत्यक्षग्राह्यत्वादि'त्यादिकं न सङ्गृह्णाती-
त्यव्याप्तिरित्येकं सन्धित्सतोऽपरं प्रच्यवते ।
हो जायगी, अतः विशेष की विवक्षा नहीं है । किन्तु जहाँ अन्वय से समन्वय की
सम्भावना हो, वहाँ अन्वय से और जहाँ व्यतिरेक से लक्षण के समन्वय की सम्भावना
हो, वहाँ व्यतिरेक से सपक्ष-विपक्षसाधारणता का ग्रहण करना चाहिए ।
'विवाद-विषय सब वस्तुएँ क्षणिक हैं, ज्ञेय होने से' इस अनुपसंहारी का भी,
सपक्ष-विपक्ष न होने से ही, व्यतिरेक से सपक्ष-विपक्षसाधारणता बन जाने के कारण
संग्रह हो जाता है ।
खंडन—यह व्याख्यान विचारणीय है, अर्थात् विचारणीय होने से रमणीय अवश्य
है, किन्तु आपाततः ही । फिर भी व्यतिरेकतः यत्किञ्चित् सपक्ष-विपक्षसाधारणता
सपक्षव्यापक ( तप्त अयोगोलक में अवृत्ति ) धूमरूप सद्धेतु में भी है, अतः उसमें
अतिव्याप्ति हो जायगी । यदि इस दोष के वारणार्थ 'सर्वसपक्ष-विपक्ष-साधारणता'
को अनैकान्तिक कहें, तो भले ही व्यतिरेक से सब सपक्षविपक्ष-साधारणता धूमरूप
सद्धेतु में न होने से वहाँ अतिव्याप्ति न हो, फिर भी अन्वय से सर्व-सपक्ष-
विपक्षसाधारणता विपक्ष ( आत्मा ) और सपक्ष ( घटादि ) के एकदेश में स्थित
'शब्दोऽनित्यः प्रत्यक्षग्राह्यत्वात्' इस साधारण अनैकान्तिक में अव्याप्ति हो जायगी ।
कारण सब सपक्षों में गुरुत्व गुण और सब विपक्षों में आकाश भी आते हैं, उनमें
अन्वय से प्रत्यक्षत्व नहीं है । इस प्रकार आप एक दोष का परिहार करना चाहते
हैं, तो अन्य दोष टपक पड़ता है ।
परिच्छेद ] सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन ३३५
अपि चान्वयव्यतिरेकाभ्यां सर्वसपक्षविपक्षगतत्वाद् धूमानुमानादौ स एव
प्रसङ्गः, विशेषरूपेण तयोरविवक्षितत्वात् ।
किञ्च—सर्वसपक्षविपक्षसाधारणमनैकान्तिकमिति वाक्ये यदि सर्वेति
विपक्षस्यापि विशेषणं तदा विपक्षैकदेशवृत्तेः सपक्षव्यापिनः साधारणानैकान्ति-
कस्य 'त्रसरेणुः कार्यावयवको महत्त्वात् घटवद्'त्यादेरव्यापकं लक्षणमिदम् । अथ
सर्वेति न विपक्षस्य विशेषणं तदा व्यतिरेकमादाय विपक्षसर्वसपक्षसाधारणमनै-
कान्तिकमिति एतद्विपक्षैकदेशमात्रवृत्तौ विरुद्धे 'क्षितिर्नित्या सावयवत्वादि'त्यादौ
गतत्वादतिव्यापकमिति ।
का चेयं वाचो युक्तिः सपक्षविपक्षसाधारणमनैकान्तिकमित्युक्ते सर्वं
सङ्गृह्यते अन्वयेन व्यतिरेकेण चेति । कथमनुपसंहार्यस्यासत्सपक्षविपक्षस्य सपक्षे
विपक्षे वा अन्वयेन व्यतिरेकेण वा साधारण्यं स्यात्, तयोरेवाभावात् ।
यदि च सपक्षे च विपक्षे च साधारणत्वमुभयत्र स्वरूपानुगमो विवक्षितः,
किञ्च—अन्वय-व्यतिरेक से सभी सपक्षों और व्यतिरेक से सभी विपक्षों में
साधारण (व्यापक) होने से धूमादि सद्धेतु में अतिव्याप्ति भी हो जायगी, कारण 'केवल
अन्वय या केवल व्यतिरेक से ही जो सपक्ष-विपक्षसाधारण हो', ऐसी विशेष की विवक्षा
तो है ही नहीं ।
किञ्च—'सर्वसपक्ष-विपक्षसाधारणमनैकान्तिकम्' इस वाक्य में 'सर्व' को यदि
विपक्ष का भी विशेषण मानें, तो परमाणुरूप में विपक्ष न रहने से विपक्ष का एकदेश
दिग् आदि में वृत्ति तथा सर्वसपक्षवृत्ति 'त्रसरेणुः कार्यावयवकः महत्त्वात् पटवत्' इस
साधारण अनैकान्तिक में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि सर्व को विपक्ष का
विशेषण न मानें, तो 'विपक्ष तथा सब सपक्षों में साधारण अनैकान्तिक है' ऐसा लक्षण
हुआ । उसकी 'क्षितिर्नित्या सावयवत्वात्' इस विरुद्ध में अतिव्याप्ति हो जायगी,
कारण व्यतिरेक से बुद्ध्यादि विपक्ष और परमाणु आदि सब सपक्षों में सावयवत्व-हेतु
साधारण है ।
किञ्च—'सपक्ष-विपक्षसाधारणरूप अनैकान्तिक अन्वय-व्यतिरेक से सबका संग्राहक
है' यह वचन-भंगी सर्वथा निन्य है, कारण सपक्ष-विपक्षरहित अनुपसंहारी का अन्वय
या व्यतिरेक से सपक्ष-विपक्षसाधारण्य संभव ही कैसे है, क्योंकि उसे पक्ष या विपक्ष
कुछ भी नहीं होता ।
यदि सत्त्व का सपक्ष-विपक्ष में साधारण्य कहें, तो असाधारण अनैकान्तिक का
असंग्रह हो जायगा; कारण असाधारण हेतु का सत्त्व सपक्ष-विपक्ष में नहीं होता । यदि
तदानीमसाधारणानैकान्तिकाव्याप्तिः । अथोभयस्मिंस्तस्मिन्नसत्त्वं तद्विवक्षितम्,
तदा सर्वाव्याप्तिः, तदसत्त्वस्यातद्धर्मत्वात् । अथ तदुभयवर्त्यभावप्रतियोगित्वं
तदुभयसम्बन्धस्य योऽभावस्तदाश्रयत्वं वाऽभिप्रेतम्, तदाऽपि साधारणो-
दाहरणाव्याप्तिः ।
अथ मन्यसे तदुभयसाधारण्यं नाम एकस्मिन् यादृश्यं हेतोः सत्त्वमसत्त्वं वा
तादृग्यमपरस्मिन्नपि यत्तदुच्यते, तथा सति नाव्यापकतादोष इति । मैवम्; मुख्य-
स्तावद्वचनार्थो नोपपद्यते—हेतोरेकरूपस्य सपक्षविपक्षावाश्रय इति । किं नाम ?
ऐकरूप्यवतो हेतोस्तौ आश्रयाविति स्यात् । तदा चासाधारणाव्याप्तिः, तत्र सपक्षे
विपक्षे च हेतोरसत्त्वेन तदाश्रयत्वासम्भवात् । तस्मात् सपक्षे विपक्षे च साधारणत्वं
हेतोरनैकान्तिकत्वमित्यनुपपन्नमेव ।
असत्त्वपक्षे हेतोस्तदाश्रयकत्वानुपपत्त्या सपक्षे विपक्षे चेति सप्तमीनिर्देशस्या-
सङ्गतत्वात् । तदभावापेक्षया चाश्रयत्वस्योपपत्तौ हेतोस्तदाश्रयत्वे किमायाताम् ।
असत्त्व का सपक्ष-विपक्ष में साधारण्य कहें, तो असम्भव हो जायगा; कारण हेतुवृत्ति
असत्त्व हेतु में नहीं रहता, क्योंकि अंशतः आत्माश्रय हो जायगा। यदि 'सपक्ष-विपक्ष
में स्थित जो अभाव, तत्प्रतियोगित्व' अथवा 'सपक्ष-विपक्षसम्बन्ध का जो अभाव, तदाश्र-
यत्व' को साधारण कहें, तो साधारण अनैकान्तिक में अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—एक ( सपक्ष या विपक्ष ) में हेतु का जो रूप ( सत्त्व या असत्त्व )
हो, उसी रूप का अन्य ( विपक्ष या सपक्ष ) में होना ही सपक्ष-विपक्ष-साधारण्य है अतः
अव्याप्ति दोष नहीं है । खण्डन—'हेतु के ऐकरूप्य ( सत्त्व या असत्त्व ) के सपक्ष
और विपक्ष आश्रय हैं' यह मुख्य अर्थ तो सम्भव नहीं । कारण हेतु के सत्त्व का आश्रय
हेतु ही है, क्योंकि वह उसीका धर्म है, सपक्षादि नहीं । किन्तु लक्षणा द्वारा 'ऐकरूप्य
से युक्त हेतु के सपक्ष-विपक्ष आश्रय हों' यही अर्थ करना होगा । ऐसा अर्थ मानने
पर असाधारण में अव्याप्ति हो जायगी; कारण असाधारण हेतु के पक्षमात्रवृत्ति होने के
कारण उसका सपक्ष या विपक्ष में असत्त्व होने से उसमें सपक्ष-विपक्षाश्रयत्व नहीं है ।
तस्मात् हेतु का सपक्ष-विपक्ष में साधारणत्व अनैकान्तिकत्व है, यह अनुपपन्न ही है ।
किञ्च—असाधारण स्थल में हेतु का सत्त्व सपक्षादि में नहीं है, अतः 'हेतु की
अपेक्षा सपक्ष में, विपक्ष में' यह सप्तमी-निर्देश अनुपपन्न है। यद्यपि हेत्वभाव की अपेक्षा
सप्तमी-निर्देश उपपन्न है, परन्तु उससे हेतु में लक्षण का समन्वय कैसे होगा ?
[परिच्छेद ] सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन ३३७
आयातु वा किञ्चित् ; तथापि साधारणोदाहरणेषु हेत्वभावापेक्षया सपक्षविप-
क्षयोर्नाऽऽश्रयता सप्तम्यर्थः । किन्तु हेत्वपेक्षयैवेति एकार्थापर्यवसायित्वे वाक्यस्य
लक्षणाव्यापकतापत्तिरेव ।
किञ्च सपक्षविपक्षासाधारणत्वं यदि सामान्यतो लक्षणं साधारणासाधारणा-
नैकान्तिकभेदद्वयसङ्ग्रहार्थमुच्यते, तदा सपक्षविपक्षद्वयान्यत्वादिभिर्हेतोः साधा-
रण्यमस्त्यन्यत्रापोत्यतिव्याप्तिः ।
अथातिव्याप्तिपरिजिहीर्षया अन्वयव्यतिरेकाभ्यां सपक्षविपक्षसाधारणमनै-
कान्तिकमित्युच्यते, तदा अन्वयव्यतिरेकयोः प्रत्येकमिलितविकल्पानुपपत्त्या
अव्यापकत्वापातः ।
स्यादेतत् —स्वस्वभावविरोधाश्रयाश्रितसपक्षविपक्षत्वं सपक्षविपक्षसाधारण्यं
विवक्षितम्, एवं नाव्याप्त्यतिव्याप्ती इति । तदप्यसत् ; तथाहि—अस्तु तावत्सर्व-
यदि ऐसा कहें कि सपक्ष-विपक्षनिष्ठ अभाव का प्रतियोगित्व हेतु में होने से समन्वय
हो जायगा, तो भी साधारण के उदाहरण में 'हेत्वभाव की अपेक्षा आश्रयत्व' सप्तम्यर्थ
नहीं है, किन्तु 'हेतु की अपेक्षा आश्रयत्व' ही सप्तम्यर्थ है । अतः वाक्य के अनेकार्थक
होने से लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी ।
किञ्च—यदि साधारण, असाधारण दोनों अनैकान्तिकों के संग्रहार्थ सामान्यतः
सपक्ष-विपक्ष-साधारणत्वमात्र लक्षण करें; तो अन्यत्र विरुद्धादि में भी हेतु का [ अन्यत्व,
सत्त्व, ज्ञेयत्व आदि से ] सपक्ष-विपक्ष-साधारण्य ( सादृश्य ) है । अतः उनमें अतिव्याप्ति
हो जायगी ।
यदि अतिव्याप्ति के परिहार की इच्छा से यह कहें कि 'अन्वय-व्यतिरेक से
सपक्ष-विपक्षसाधारण्य अनैकान्तिक है', तो यदि केवल अन्वय से साधारण्य की विवक्षा
करें, तो असाधारण में और केवल व्यतिरेक से विवक्षा करें, तो साधारण में और दोनों
से विवक्षा करें, तो उभयत्र अव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—'जिस हेतु का सपक्ष-विपक्ष, हेतु और हेत्वभाव के विरोध के आश्रय का
आश्रय हो, तत्त्व सपक्ष-विपक्ष-साधारण्य है ।' अतः अव्याप्ति तथा अतिव्याप्ति नहीं
हैं। खण्डन —यह भी युक्त नहीं, कारण सपक्ष-विपक्ष में 'सर्व' विशेषण देंगे या
नहीं ? प्रथम पक्ष में 'शब्दो न नित्यः प्रत्यक्षप्राप्तत्वात्' इस साधारण में अव्याप्ति हो
जायगी । द्वितीय पक्ष में तथा प्रथम में भी पक्ष, सपक्ष के धूम-धूमाभाव के विरोध के
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३३८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
पदविशेषणोपादानानुपादानपक्षोक्तदोषापातः, सर्वशब्दोपादाने धूमानुमानादौ
प्रसङ्गश्च ।
स्वस्वाभावविरोधशब्दार्थस्यापि एकस्यानुगतस्यासम्भवेन लक्षणाऽनुगमा-
भावो दोषः । तत्तद्भावयोर्हि विरोधः सहानवस्थानम्, अनवस्थानञ्च अवस्थान-
प्रतिषेधः । न च तद् भावस्य अभावस्वरूपादन्यत् । न चाभावस्याप्यनवस्थानं
भावस्वरूपादन्यत्, किन्तु तदेव भावस्य स्वरूपम् । तत्र स्वस्वाभावविरोधाश्रय
इत्यस्य नार्थक्यं किञ्चिन्मृग्यमाणमवाप्यते ।
स्वस्वाभावविरोधाश्रय इति वचनं विचारमर्हति । स्वस्वाभावयोर्विरोधविशे-
षणतया आधेयकोटिनिवेशात् विशेषणघटितमूर्तित्वाद्विशिष्टपदार्थस्य तदाधारत्वा-
नुपपत्तेः ।
अतिव्यापकता च स्यात् । अन्वयमादाय सपक्षे, व्यतिरेकमादाय विपक्षे,
वर्तमानस्याप्युक्तलक्षणोपेतत्वात् । स्वस्वाभावाविशेषितस्य तु विरोधाश्रयेऽभि-
धीयमाने सर्वानुमानव्यापकत्वमनैकान्तिकलक्षणस्याऽऽपतेत् ।
आश्रय का आश्रय होने से 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' इस सत्-हेतु में अतिव्याप्ति हो
जायगी ।
किञ्च—'स्वस्वाभाव-विरोध' शब्द का एक अनुगत अर्थ न हो सकने से लक्षण
का अननुगम हो जायगा । देखिये—प्रतियोगी और अभाव का विरोध सह-अनवस्थान
ही है और यह अनवस्थान अवस्थान का प्रतिषेधरूप है । वह भाव का अनवस्थान
अभावरूप से अन्य नहीं है, किन्तु अभावस्वरूप ही है और अभाव का अनवस्थान
भावस्वरूप से अन्य नहीं है, किन्तु भावस्वरूप ही है । अतः खोजने पर भी 'स्वस्वाभाव-
विरोधाश्रय' शब्द का एक अर्थ प्राप्त नहीं होता ।
किञ्च—'स्वस्वाभाव-विरोधाश्रय' यह वचन भी विचारणीय है । स्वस्वाभाव विरोध
में विशेषण होने से उसका आधेयकोटि में निवेश है । विशिष्ट पदार्थ विशेषण से
घटितमूर्तिक होता है और स्वस्वाभावविशिष्ट विरोध का आश्रय स्वस्वाभाव नहीं हो
सकता, कारण अंशतः आत्माश्रय होने से स्व का स्व आश्रय नहीं होता ।
किञ्च—सद्धेतुमात्र में अतिव्याप्ति हो जायगी. कारण वहाँ भी स्व ( हेतु ) से
आश्रित सपक्ष और स्वाभाव से आश्रित विपक्ष हैं । यदि स्वस्वाभाव से अविशेषित
विरोधाश्रयाश्रित सपक्ष-विपक्षत्व का अभिधान करें तो, सम्पूर्ण अनुमानों में अतिव्याप्ति हो
जायगी, कारण हेतुमात्र में अभेद के विरोध के आश्रय-भेद से आश्रित सपक्ष-
विपक्षत्व हैं ।
परिच्छेद ] सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन ३३६
न च वाच्यं स्वस्वभावोपलक्षितो विरोधोऽभिमतः, तेन विशेषणपक्षोक्तदोषस्य
नावकाश इति ; यतः स्वस्वभावाभ्यां विरोधमात्रं वा लक्ष्यते तद्व्यक्तिर्वा काचित् ?
आद्ये यदेव स्वस्वभावाभ्यां लक्षितं विरोधमात्रं तदेवान्यदपीति उक्तातिव्याप्ति-
स्तदवस्थैव, स्वस्वभावपदोपादानवैय्यर्थ्यं च। अथ द्वितीयस्तदा लक्षणस्याननुगमः,
एकस्य विरोधव्यक्तिविशेषस्यात्र परिगृहीतस्यापरविरोधव्यक्त्यनात्मत्वात् ।
अथ यावत्योऽपेक्षिता विरोधव्यक्तयस्ता उपलक्ष्यन्त इत्युच्यते; किम्नोपल-
क्ष्यन्ते, किन्तु किं केनचिदनुगतेन रूपेण, उत प्रतिस्वं व्यावृत्तेनाऽऽत्मना ?
प्रथमे तदेवोच्यतां किमुपलक्षणोपन्यासप्रयासेन । न च तत्सम्भवति विरोधमात्र-
स्यातिप्रसञ्जकत्वात् , प्रतिस्वं व्यावृत्तेन व्यक्तीनामात्मनोपलक्ष्यत्वे तथैव तासां
लक्षणप्रवेश इति मिलितानां लक्षणत्वे सर्वाव्याप्तिः, प्रत्येकं लक्षणत्वे
परस्परोदाहरणाव्याप्तिः ।
समर्थन—'स्वस्वभाव से उपलक्षित जो विरोध है, तदाश्रयाश्रित सपक्ष-विपक्षत्व' ऐसा
लक्षण करेंगे । अतः विशेषणपक्षोक्त दोष न होंगे । खंडन—स्वस्वभाव से विरोधमात्र
उपलक्षित होता है अथवा कोई एक विरोध व्यक्ति ? प्रथम कल्प में स्वस्वभाव से
उपलक्षित विरोध के आश्रय सद्धेतु में अतिव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—जब अव्याप्ति-
अतिव्याप्तिका परिहार ही नहीं होता, तो 'स्वस्वभाव' का निवेश व्यर्थ ही है। द्वितीय
कल्प में लक्षण का अननुगम हो जायगा; कारण लक्षण में प्रविष्ट जो एक विरोध
व्यक्ति है, वह अन्यत्र नहीं है।
यदि कहें कि 'अनैकान्तिक हेतु में अपेक्षित जितने विरोध व्यक्ति हैं, वे सब स्व-
स्वभाव से उपलक्षित किये जाते हैं' तो ठीक है, क्यों नहीं उपलक्षित करते ? किन्तु यह
कहिये कि किसी अनुगत रूप से संगृहीत तावद् व्यक्तियों का उपलक्षण करते हैं या
प्रतिव्यक्ति भिन्न एक-एक का ? प्रथम पक्ष में उसी अनुगत रूप को कहिये, उपलक्षण में
व्यर्थ प्रयास क्यों करते हैं ? अनुगत रूप सम्भव नहीं है और विरोधमात्र अन्यत्र भी है।
यदि प्रतिव्यक्ति में विद्यमान अन्य व्यक्ति से व्यावृत्त किसी स्वरूप को उपलक्षण मानें,
तो जिस रूप से उपलक्षित मानें, उसी रूप से उसका लक्षण में प्रवेश होगा । यदि
सम्पूर्ण व्यक्तियों का लक्षण में प्रवेश करें, तो विरोध व्यक्ति कहीं भी नहीं है;
अतः असम्भव हो जायगा। यदि एक व्यक्ति का लक्षण में प्रवेश करें, तो परस्पर
उदाहरण में अव्याप्ति हो जायगी।