खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 347, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें३३० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
ननु साध्यव्यतिरेकसम्बन्धो यद्यपि विरुद्धानैकान्तिकयोर्द्वयोरप्यस्ति, तथापि
वस्तुगत्या स्वाभाविकोसौ विरुद्ध एवेत्येतावन्मात्रविशेषविवक्षया विरुद्धस्यानै-
कान्तिकाद्भेदोपन्यासः ।
मैवम् ; दत्तोत्तरत्वात् । वस्तुगत्या सन्नप्ययं विशेषो नोद्भावनार्ह इत्युपेक्षणीय
इत्युक्तम् । तथाहि—नेदमस्य साधकम्, एतत्साध्यं प्रति विरुद्धत्वादित्यभिधीय-
माने विरुद्धशब्दार्थनिरुक्तौ विशेषणाधिक्यस्योक्तन्यायेन दुष्परिहरत्वात् ।
अत एव 'अनैकान्तिके सन्देहेन प्रत्यवस्थानम्, विरुद्धे तु व्यतिरेकनिश्चयेनेति
विशेषादनयोर्भेदेनोपन्यासः' इत्यप्यनवकाशम् ; अनुमितिहेतुव्यतिरेको हि हेतुदोषः,
अनुमितिहेतुश्चैको व्याप्तिः, ततस्तदभावस्य दोषत्वात्तावन्मात्रं ज्ञाप्यम् । तच्च
हेतुविपक्षसम्बन्धोद्भावनमात्रादेव गम्यते । तस्मादनुमितिहेतुव्याप्तिप्रमिति-
व्यतिरेकबोधनाय संशये व्यतिरेकनिश्चये चोद्भाव्यमानेऽपि 'कुतस्ताविवे'त्यत्र
समर्थन—यद्यपि साध्याभाव के साथ विरुद्ध और अनैकान्तिक दोनों का सम्बन्ध
है, तथापि स्वाभाविक सम्बन्ध विरुद्ध में ही है । केवल इसी दृष्टि से विरुद्ध से
अनैकान्तिक का भेद कहा गया है ।
खण्डन—वस्तुतः सार्वत्रिकत्व-निवेशकृत ही यह भेद है । किन्तु यह भेद कथन
के योग्य नहीं, अतः उपेक्षणीय हैं, यह हम कह ही चुके हैं । देखिये—'यह हेतु
साध्य का साधक नहीं है, साध्य-विरुद्ध होने से' यह कहने पर तद्धटक विरुद्ध-
शब्दार्थ की निरुक्ति में उक्त रीति से विशेषण के वैयर्थ्यका परिहार किया ही नहीं
जा सकता । तथाच यह हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हो जायगा ।
समर्थन—अनैकान्तिक में हेतु में साध्याभाव की व्याप्ति का सन्देहमात्र
रहता है और विरुद्ध स्थल में हेतु में साध्याभाव के साथ व्याप्ति का निश्चय रहता
है, यही दोनों में परस्पर भेद है । खण्डन—यह भी युक्त नहीं, कारण अनुमिति-
हेतुओं का अभाव ही हेतु-दोष है । अनुमिति का एक हेतु व्याप्ति है और दूसरा
पक्षधर्मता । एवञ्च इन दोनों का अभाव ही दोष होने से तन्मात्र ही ज्ञाप्य है और
उसका ज्ञान हेतु के विपक्ष में सम्बन्धमात्र से ही हो जाता है । तस्मात् अनुमिति-हेतु
व्याप्ति-प्रमिति के अभाव के बोधनार्थ पूर्वोक्त सन्देह या निश्चय का उद्भावन भी करें,
तो 'वे (उक्त सन्देह या निश्चय) ही कैसे हुए ?' ऐसी जिज्ञासा होने पर विपक्षसम्बन्धमात्र
तथा नियत विपक्षसम्बन्ध अवश्य कहने होंगे । एवञ्च व्याप्ति या तत्प्रमिति के अभाव