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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ५५
ननु यदि नाम प्रत्यक्षधिया तया घटपटभेदोल्लेखिन्या स्वात्मना सह
घटपटयोर्भेदो न गोचरीक्रियते । तावता कथं तस्याः स्वविषयेण सहाऽद्वैते श्रुतिः
प्रामाण्यमासादयितुमीष्टे, बुद्धयन्तरेण तया सार्धं घटपटयोरपि भेदमुल्लिखता
तत्राद्वैतश्रुतेर्बाधादेव ।
मैवम् ; तर्हि तस्या अपि विषयमापातः परित्यज्य ययैवाऽपरया बुद्ध्या
घटपटभेदबुद्धेर्घटाच्च पटाच्च भेदो विषयीक्रियते, तस्याः स्वविषयेण सहाद्वैते श्रुतिः
प्रामाण्यमवलम्ब्य लब्धपदा घटपटतद्भेदबुद्धिभिः सह द्वितीयाया बुद्धेरभेदे
पर्यवस्यन्ती सर्वेषामेव तेषामभेदे विश्राम्यति ।
एवं च सति यत्रैव गत्वा बाधबुद्धिपरम्पराविच्छेदो विषयान्तरसंचारोच्छेद-
भयाद् अनवस्थाभयाच्चाभ्युपेयः, तस्यामेव बुद्धौ पदमारोप्याद्वैतश्रुतिः सर्वं
के भी परस्पर अभेद का बोध कराती है—यह कथन युक्तिविरुद्ध है; क्योंकि शब्द,
बुद्धि तथा कर्म के व्यापार विरम्य ( क्रम से ) नहीं होते, किन्तु एक बार ही होते हैं ।
उत्तर—श्रुति से सर्वविषयक अद्वैत-बुद्धि झटिति ( एक ही काल में ) हो जाती
है, परन्तु नाना विषयों में उस श्रुतिज बोध के प्रामाण्य को विषय करनेवाली, एवं-
विध प्रश्न में उक्त क्रम से जात विचाररूप सोपान की परम्परा पर आरोहण करनेवाली
हम लोगों की बुद्धियाँ क्रम से परिनिष्ठित ( सुस्थिर ) होती हैं ।
शङ्का—यद्यपि ‘घट-पटौ भिन्नौ’ यह प्रत्यक्ष—घट-पट के भेदरूप स्वविषय
के साथ—स्व के भेद को विषय नहीं करता । फिर भी उस प्रत्यक्ष के स्व-विषय के
साथ अद्वैत में श्रुति प्रमाण कैसे होगी, क्योंकि ‘घट-पट-भेदग्राहि प्रत्यक्षंघटपटौ
न भवति’ यह अन्य बुद्धि घट-पटभेद के साथ उस प्रत्यक्ष के भी भेद को ग्रहण करती
है । अतः श्रुति का बाध होगा ।
खण्डन—प्रथम ‘घट-पटौ भिन्नौ’ इस बुद्धि का घट-पटभेदरूप स्वविषय के
साथ अद्वैत-बोध को त्यागकर ‘घट-पट-भेदग्राहिप्रत्यक्षं घटपटौ न भवति’ इस
बुद्धि का ही स्व-विषय घट-पट-भेदग्राहि प्रत्यक्ष तथा घट-पटभेद के साथ अभेद में
श्रुतिप्रामाण्य को अवलम्बन कर, पश्चात् सर्ववस्तुओं के अद्वैत में पर्यवसित होगी ।
शङ्का—उस द्वितीय बुद्धि का भी स्व-विषय के साथ भेद का बोध तृतीय बुद्धि
करेगी । अतः वहाँ भी अद्वैत-श्रुति का अवकाश नहीं है । खण्डन—विषयान्तर के