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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
तद्विषय-विषयिप्रवाहमद्वैते स्थापयन्ती न केनापि प्रमाणेन क्वचिदपि विषये
बाधितुं शक्या । तस्मात्—
सुदूरधावनश्रान्ता बाधबुद्धिपरम्परा ।
विनिवृत्ताऽद्वयाम्नायैः पाष्णिग्राहैर्विजीयते ॥'—इति ।
न च यत्र तस्य प्रतिपत्तुर्बुद्धिधाराविश्रान्तिस्तत्र पुरुषान्तरबुद्धिर्भेदे प्रमाणं
स्यात् । तथापि पुरुषान्तरेण भिन्नतया सा प्रतीयते इत्यत्र प्रमाणं त्वया वाच्यम् ।
नहि तदपि पुरुषान्तरेणैव, न च संभाव्यमानम्, श्रौतेन निश्चयेन तन्निवर्तनात्;
तथाप्यनवस्थानादिति ।
सञ्चार (ज्ञान) के 'उच्छेद और अनवस्था के भय से जहाँ जाकर आप अद्वैत-बुद्धि
की बाध-बुद्धि-धारा की समाप्ति मानेंगे, 'उसी बुद्धि में श्रुति अवकाश पाकर सम्पूर्ण
उस बुद्धि के विषय ज्ञान-प्रवाह को अद्वैत में स्थापन करती हुई किसी प्रमाण से
किसी भी विषय में बाधित नहीं हो सकती । अतः दूर दौड़ने से श्रान्त—अतएव
विनिवृत्त—बाधपरम्परा पृष्ठ-भावी (पीछे दौड़नेवाले) शत्रु के सदृश अद्वैत-श्रुति से
जीती जाती है।
दूर दौड़ने से थकी, बाध-बुद्धि की धार ।
लौटी अद्वय-बोधने, घेर दबाई नार ॥
भेद-समर्थन—विषयान्तर के सञ्चार का उच्छेदन न हो, इसलिए उस पुरुष
की बुद्धि-धारा तो समाप्त हो जाती है। परन्तु अन्य पुरुष की बुद्धि से उस चरमबुद्धि
(अन्तिम भेद-बुद्धि) के भेद का भी ग्रहण होता है।
भेद-खंडन—अन्य पुरुष की बुद्धि से उस चरम बुद्धि के भेद का ज्ञान होता
है—इसमें यदि प्रमाण न दे, तो आपका इष्ट भेद सिद्ध नहीं हुआ। यदि कोई बुद्धि
प्रमाण दें, तो उसी बुद्धि में अवकाश पाकर अद्वैत-श्रुति भेद-बुद्धि का बाध करेगी।
यदि आप प्रमाणों (भेद-ज्ञानों) की धारा मानें, तो अनवस्था हो जायगी।
समर्थन—पुरुषान्तर की बुद्धि से भेद का ज्ञान होगा, इसमें भी प्रमाण अन्य
पुरुष देगा। खंडन—अद्वैत-श्रुति पुरुषान्तर से प्रदर्शित प्रमाण-बुद्धि में ही अवकाश
पाकर सर्वत्र भेद का बाध करेगी अथवा अनवस्था का प्रसंग हो जायगा।
समर्थन—'पुरुषान्तर-बुद्धिः भेद प्रमाणं भविष्यति' इस सम्भावना से अद्वैत-बुद्धि का
बाध होगा । खण्डन—'यदि वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यात् तदा न स्यात्
अकारणः सहेतुको वा स्यात्' इस तर्क से 'यदि वह्निविरहिण्यपि धूमः स्यात्'