केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 19, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११
पद-भाष्य
विकोऽजोऽजरोऽमृतोऽभयो न | अजर, अमर, अभय और जो कर्मसे
घटता-बढ़ता नहीं है वह नित्य-
वर्धते कर्मणा नो कनीयान्नित्यश्च | लोक ही इष्ट है, साधनद्वारा प्राप्त
लोक इष्टः । स च नित्यत्वान्ना- | होनेवाला अनित्य लोकत्रय तो इष्ट
है नहीं । और वह (आत्मलोक)
विद्यानिवृत्तिव्यतिरेकेणान्यसाधन- | तो नित्य होनेके कारण अविद्या-
निवृत्तिके सिवा अन्य किसी भी
निष्पाद्यः । तस्मात्प्रत्यगात्म- | साधनसे प्राप्त होने योग्य है नहीं।
अतः हमको आत्मा और ब्रह्मके
ब्रह्मविज्ञानपूर्वकः सर्वैषणासंन्यास | एकत्वज्ञानपूर्वक सब प्रकारकी
एव कर्तव्य इति । | एषणाओंका त्याग ही करना चाहिये।
वाक्य-भाष्य
श्रुतेश्च “न वर्धते कर्मणा” | इसके सिवा श्रुतिसे “आत्मा कर्मसे
(बृ० उ० ४ । ४ । २३) इत्यादि । | बढ़ता नहीं है” इत्यादि और स्मृतिसे
भी “यह आत्मा अविकार्य कहा
स्मृतेश्च “अविकार्योऽयमुच्यते” | जाता है” इत्यादि कहा गया
(गीता २ । २५) इति । न च | है। “शुद्ध और पापरहित” इत्यादि
सञ्चिकीर्षितः “शुद्धमपाप- | श्रुतियोंसे [ प्रकट होता है कि ]
आत्माका संस्कार करना भी अभीष्ट
विद्धम्” (ई० उ० ८) इत्यादि- | नहीं है । इसके सिवा अपनेसे
अभिन्न होनेके कारण भी वह संस्कार्य
श्रुतिभ्यः; अनन्यत्वाच्च; अन्ये- | नहीं है क्योंकि संस्कार अन्य वस्तुके
नान्यत्संस्क्रियते । न चात्म- | द्वारा अन्यका ही हुआ करता है।
आत्मासे भिन्न कोई क्रिया भी नहीं है;
नोऽन्यभूता क्रिया अस्ति, न च | और स्वयं आत्माके योगसे ही आत्मा-
स्वेनैवात्मना स्वमात्मानं सञ्चि- | के संस्कारकी इच्छा कोई न करेगा ।
कीर्षेत्। न च वस्त्वन्तराधानं | एक वस्तुका दूसरी वस्तुपर आधान
करना अथवा एक वस्तुको दूसरी
नित्यप्राप्तिर्वा वस्त्वन्तरस्य | वस्तुका प्राप्त होना नित्य नहीं हो