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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 152 में से

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पृष्ठ 18

१० केनोपनिषद् [ खण्ड १

पद-भाष्य
तत्रैव च पारिव्राज्यविधाने | वहाँ (उस बृहदारण्यकोपनिषद्-
हेतुरुक्तः “किं प्रजया करिष्यामो | में) ही संन्यास ग्रहण करनेमें
येषां नोऽयमात्मायं लोकः” | यह हेतु बतलाया है—"हम प्रजा-
(बृ० उ० ४।४।२२) इति। | को लेकर क्या करेंगे, जिन हमें
तत्रायं हेत्वर्थः-प्रजाकर्मतत्स- | कि यह आत्मलोक ही अभीष्ट
युक्तविद्याभिर्मनुष्यपितृदेवलोक- | है ?" उस हेतुका अभिप्राय
त्रयसाधनैरानात्मलोकप्रतिपत्ति- | इस प्रकार है—'मनुष्यलोक,
कारणैः किं करिष्यामः। न चा- | पितृलोक और देवलोक—इन
स्माकं लोकत्रयमनित्यं साधन- | तीन लोकोंके साधन अनात्म-
साध्यमिष्टम्, येषामस्माकं स्वाभा- | लोकोंकी प्राप्तिके हेतुभूत प्रजा,
कर्म और कर्मसहित ज्ञानसे हमें
क्या करना है; क्योंकि हमलोगोंको
जिन्हें कि, स्वाभाविक, अजन्मा,
वाक्य-भाष्य
न मुञ्चति यथेष्टदेशगमनं प्रति | स्थानपर जानेके लिये स्वतन्त्रता प्राप्त
स्वातन्त्र्ये सति। | होनेपर भी नौकाको न छोड़े—ऐसा
कभी नहीं होता।
न हि स्वभावसिद्धं वस्तु | जो वस्तु स्वतः सिद्ध है उसे कोई
सिषाधयिषति सा- | भी पुरुष साधनोंसे सिद्ध नहीं करना
[आत्मनः] धनैः। स्वभावसिद्ध- | चाहता । आत्मा भी स्वभाव-सिद्ध है;
[अविकार्यत्वादि-] श्चात्मा, तथा न | और इसीलिये वह प्राप्त करनेकी इच्छा
[निरूपणम्] आविषयिषितः, | करने योग्य नहीं है, क्योंकि आत्मस्वरूप
आत्मत्वे सति नित्यप्राप्तत्वात् । | होनेके कारण यह नित्य-प्राप्त ही है।
नापि विविकारयिषितः; आत्मत्वे | इसी प्रकार उसका विकार भी इष्ट
सति नित्यत्वादविकारित्वात् | नहीं है क्योंकि आत्मा होनेके साथ ही
अविषयत्वादमूर्तत्वाच्च । | वह नित्य, अविकारी, अविषय तथा
अमूर्त्त भी है।