केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य
अपहत्य पाप्मानम् अविद्याकाम- | ब्रह्ममें, जो ज्येये—बड़ा अर्थात्
कर्मलक्षणं संसारबीजं विधूय | सबसे महान् है उस अपने मुख्य
अनन्ते अपर्यन्ते स्वर्गे लोके | आत्मामें स्थित हो जाता है।
सुखात्मके ब्रह्मणीत्येतत् । अनन्ते | तात्पर्य यह है कि वह फिर संसार-
इति विशेषणान्न त्रिविष्टपे अनन्त- | को प्राप्त नहीं होता । 'अमृतत्वं हि
शब्द औपचारिकोडपि स्याद् | विन्दते' इस वाक्यद्वारा पहले
इत्यत आह--ज्येये इति । ज्येये | ब्रह्मविद्याका फल कह भी दिया है,
ज्यायसि सर्वमहत्तरे स्वात्मनि | तो भी इस वाक्यद्वारा उसका अन्तमें
मुख्ये एव प्रतितिष्ठति । न पुनः | फिर उपसंहार करते हैं। 'अनन्त' ऐसा
संसारमापद्यत इत्यभिप्रायः ॥९॥ | विशेषण होनेके कारण 'स्वर्गे लोके'
से देवलोक नहीं समझना चाहिये;
क्योंकि उसमें भी उपचारसे 'अनन्त'
शब्दकी प्रवृत्ति हो सकती है
इसलिये 'ज्येये' यह विशेषण दिया
गया है ॥ ९ ॥
इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥
केनोपनिषत्पदभाष्यम्
सम्पूर्णम्
वाक्य-भाष्य
परे ब्रह्मणि ज्येये महति सर्व- | ज्येष्ठ—महान् यानी सबसे बड़े परब्रह्म-
महत्तरे प्रतितिष्ठति सर्ववेदान्तवेद्यं | में प्रतिष्ठित हो जाता है। अर्थात्
ब्रह्मात्मत्वेनावगम्य तदेव ब्रह्म | सम्पूर्ण वेदान्तवाक्योंसे वेद्य ब्रह्मको
प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | आत्मभावसे जानकर उसी ब्रह्मको
प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥
केनोपनिषद्वाक्यभाष्यम्
सम्पूर्णम्