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सर्वकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 152 में से

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पृष्ठ 145

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३७

ग्रन्थावगाहनका फल
यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके
ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥ ९ ॥
जो निश्चयपूर्वक इस उपनिषद्‌को इस प्रकार जानता है वह
पापको क्षीण करके अनन्त और महान् स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है,
प्रतिष्ठित होता है ॥ ९ ॥
पद-भाष्य
यो वै एतां ब्रह्मविद्याम् | 'केनेषितम्' इत्यादि वाक्यद्वारा
'केनेषितम्' इत्यादिना यथो- | कही हुई तथा 'ब्रह्म ह देवेभ्यः'
क्ताम् एवं महाभागाम् 'ब्रह्म ह | आदि आख्यायिकाद्वारा स्तुत इस
देवेभ्यः' इत्यादिना स्तुतां सर्व- | महाभागा और सम्पूर्ण विद्याओंकी
विद्याप्रतिष्ठां वेद 'अमृतत्वं | आश्रयभूता ब्रह्मविद्याको जो पुरुष
हि विन्दते' इत्युक्तमपि ब्रह्म- | जानता है वह पापको छोड़कर
विद्याफलमन्ते निगमयति— | अर्थात् अविद्या, कामना और
| कर्मरूप संसारके बीजको त्यागकर
| अनन्त—जिसका कोई पार नहीं
| है उस स्वर्गलोकमें अर्थात् सुखरूप
वाक्य-भाष्य
तामेतां तपआद्यङ्गां तत्प्रतिष्ठां | तप आदि अंगोंवाली और उन्हींपर
ब्राह्मीमुपनिषदं सायतनामात्म- | प्रतिष्ठित इस ब्राह्मी उपनिषद्को, जो
ज्ञानहेतुभूतामेवं यथावद्यो वेद. | कि आत्मज्ञानकी हेतुभूत है, जो उसके
अनुवर्ततेऽनुतिष्ठति; तस्यैतत्फलम् | आयतनके सहित इस प्रकार यथायत्
आह—अपहत्य पाप्मानम् अप- | जानता है—जो उसका अनुवर्तन
क्षीय धर्माधर्मावित्यर्थः अन- | यानी अनुष्ठान करता है उसके लिये
न्तेऽपारेऽविद्यमानान्ते स्वर्गे | यह फल बतलाया गया है। वह पापको
लोके सुखप्राये निर्दुःखात्मनि | क्षीण करके अर्थात् धर्म और अधर्मका
| क्षय करके जिसका अन्त न हो उस
| स्वर्गलोकमें अर्थात् दुःखरहित आनन्द-
| प्राय और अनन्त—अपार अर्थात्