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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 270 में से

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पृष्ठ 88

३।५२] १. यमकके विशिष्ट भेद : (१) सन्दष्ट ६५
उपोढरागाऽप्यबला मदेन सा मदेनसा मन्युरसेन योजिता ।
न योजिताऽऽत्मानमनङ्गतापिताऽङ्गतापि तापाय ममास नेयते ॥५२॥
(यौवनके अथवा मदिराके) मदके कारण बढ़े हुए प्रेमभाव वाली भी
वह अबला मेरे अपराधके द्वारा क्रोधके रससे युक्त कर दी गई है । कामदेव
के द्वारा तपाये हुए अङ्गोंसे युक्तता वाली होते हुए भी वह अपने आपको
(मुझसे) युक्त नहीं कर रही (मानके कारण मुझसे दूर-दूर रह रही) है ।
मुझे परे करने वाली (रूठी हुई वह प्रिया) मुझे इतना कष्ट देने वाली हो
गई है ॥ ५२ ॥
सम्मत पाठमें प्रथम-द्वितीय, तृतीय-चतुर्थ पादोंके बहुवर्णवृत्तिसे सन्धानके
रूपमें है । ४७वेंमें चारों पादोंके द्विवर्णवृत्तिसे सन्धानके रूपमें है । ४८वें
श्लोकमें चारों पादोंके बहुवर्णवृत्तिसे सन्धानके कारण सन्दष्ट यमक है । ४६वें
में आदि-मध्यान्त व्यपेत यमकके साथ चतुष्पादान्तादिके द्विवर्णवृत्तिसे
सन्धानके कारण है, तो ५०वेंमें इसी प्रकारके यमकके बहुवर्णवृत्तिसे सन्धानके
कारण अव्यपेत सन्दष्ट यमक है । महाराज भोजने दण्डीके इस प्रकारके
यमकोंके आधारपर अन्य भेदोंके अनुच्छेद और उच्छेदसे सूक्ष्म, स्थूल भेदोंकी
कल्पना की है¹ ॥ ५१ ॥
उदाहरण — ५२वें श्लोकमें प्रदत्त सन्दष्ट यमकके इस उदाहरणमें
आचार्यने अन्य स्त्रीके सम्भोगचिह्न आदिसे युक्त होनेके कारण नायिकाके
प्रति अपराधी किसी नायककी मानवती नायिकाके मानके कारण होने
वाले कष्टका वर्णन किया है ।
मन्यु-रसेन—मन्यु (क्रोध) रौद्ररस नहीं है, उसका स्थायी भाव है ।
तथापि शृङ्गाराङ्ग क्रोध अन्य क्रोधोंसे भिन्न है । वह नायकको प्रियाकी
अन्य ही शोभाका दर्शक होनेके कारण आनन्ददायी है । इसलिये इसका
रसत्व औपचारिक है ।² नायिकाके मानके कारण नायकके तापका आधिक्य
प्रेमकी अधिकता सूचित करनेके कारण मन्युकी रसताका पोषक है ।
१. सरस्वतीकण्ठाभरण २।१२६-१३१ देखें ।
२. वादी जी ने इसे भिन्न प्रकारसे कहा है : यद्यपि क्रोधो रौद्ररसस्य
स्थायिभावो, न रसः, तथाऽप्यभेदोपचारात् कार्यकारणयोः कथञ्चि-
देकत्वपरिणामात् क्रोधोऽपि रस एवेति मन्युरसस्य क्रोधव्याख्याने न
दोषः ।