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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 270 में से

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पृष्ठ 87

६४ काव्यादर्श [३।५१
हुई है ।' यदि यही सन्दष्ट यमक है, तो पादादियमक' क्या होगा ? तब इसमें
अन्तर केवल चारों पादोंमें विजातीय (सन्दष्ट) और सजातीय (पादादि)
शब्दाभ्यासका होगा, जो अवान्तर भेद है : यह मुख्य भेदका निमित्त नहीं हो
सकता । अतः अन्तादि नियत स्थानमें अव्यपेत आवृत्तिके इस भेदको दण्डीने
सँडसीके समान दोनों पादोंको पकड़नेके कारण 'सन्दंश' नाम दिया है । रुद्रट
ने 'संदंश' और 'सन्दष्टक'को परस्पर भिन्न माना है : प्रथम पाद और
तृतीय पादके आदिमें समान वर्ण होनेपर 'संदंश' है एवं द्वितीय पादकी
आवृत्ति चौथे पादमें होनेपर 'सन्दष्टक' यमक होता है । रुद्रटकी सन्दष्टक
की अवधारणा भरतपर आधारित है। उन्होंने भरतके निरूपणके अन्य भेदोंसे
साङ्कर्यका परिहार करके उनके उदाहरणके द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें
शब्दाभ्यासके आधारपर अपना सन्दष्टक यमक बनाया । रुद्रटके (क) सन्दंश
और (ख) सन्दष्टकमें आवृत्तिकी (क) प्रथम-तृतीयपादवर्तिता और (ख)
द्वितीय-चतुर्थपादवर्तिता, अर्थात् (क) विषमपादवर्तिता और (ख) समपाद-
वर्तिताके अतिरिक्त कोई अन्तर नहीं है । सँडसीके (क) पुच्छभागमें आवृत्ति
होनेसे 'संदंश' और (ख) मुखभागमें आवृत्ति होनेसे सन्दष्टक' भेद रुद्रटने
माना है । (ग) मध्यभाग - द्वितीय तृतीय पादों में आवृत्तिसे रुद्रटने 'गर्भ-
यमक' माना है ।३
दण्डिप्रोक्त सन्दष्ट यमक पीछे ४६-५० श्लोकोंमें अव्यपेत-व्यपेत यमकके
विभिन्न भेदोंमें नाना रूपोंमें आ चुका है। तद् यथा - ४६वें श्लोकके रत्नश्री-
१. पश्य-पश्य रमणस्य मे गुणान् येन-येन वशगां करोति माम् ।
येन-येन दिनमेति दर्शनं, तेन-तेन वशगां करोति माम् ।। नाट्य० १६।७७
२. आदौ पादस्य यत्र स्यात् समावेशः समाक्षरः ।
'पादादि-यमकं' नाम तद् विज्ञेयं बुधैर्यथा ।। नाट्य० १६।७८
विष्णुः सृजति भूतानि, विष्णुः संहरते प्रजाः ।
विष्णुप्रसूतं त्रैलोक्यं, विष्णुर्लोकादिदैवतम् ॥ ७६
३. (क) सन्नारीभरणोमायमाराध्य विधुशेखरम् ।
सन्नारीभरणोमायस्ततस्त्वं पृथिवीं जय ।। काव्याल० ३।५६ :
(ख) इदं च येन स्वयमात्मभोग्यतां समस्तकाञ्चीकमनीयताकुलम् ।
नितम्बबिम्बं कथमस्तु नो नृणां स समस्तकाञ्चीकमनीयताकुलम् ।।
(ग) यो राज्यमासाद्य भवत्यचिन्तः समुद्रतारम्भरतः सदैव ।
समुद्रतारं भरतः स दैव प्रमाणमारभ्य पयस्युदास्ते ॥ ८