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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

६६ काव्यादर्श [३।५३
२. अर्धाभ्यासः समुद्गः स्यादस्य भेदास्त्रयो मताः ।
३. पादाभ्यासोऽप्यनेकात्मा; व्यज्यते स निदर्शनैः ॥ ५३ ॥
(२) आधेकी आवृत्ति समुद्ग होता है । इसके तीन भेद माने गये हैं ।
(३) पादकी आवृत्ति भी अनेक प्रकारकी होती है । उसे उदाहरणोंसे
व्यक्त किया जा रहा है ॥ ५३ ॥
प्रथम ‘योजिता’ पद √युज् + णिच् + क्त (कर्मणि) से है तथा द्वितीय
‘योजिता’ √युज् + णिच् से आदिकर्ममें कर्तृवाच्यमें क्तसे है : योजितवती ।¹
ममासनेयतेका पदच्छेद टीकाकारोंने मम आस न इयते (अथवा नेयते)
किया है । आस को अस् भुवि (अदादि) से कर्तरि लिट्, प्रथम, ए० व०
में व्युत्पादित किया है । इसमें दो दोष हैं : (१) सामान्य भूतार्थक ‘क्त’ के
प्रकरणमें तदुत्तरवर्ती क्रियाको परोक्ष भूतकालमें रखना कालैकवाक्यताकी
दृष्टिसे अनुचित है । (२) आदादिक √अस् + लिट्में (क) वेदमें या (ख)
अनुप्रयोगमें ही प्रयुक्त होती है । (ग) अन्यत्र लोक में √अस् के स्थानमें
√भू का ही प्रयोग शिष्टसम्मत है । दण्डी जैसे सावधान और समर्थ
आचार्यसे शिष्टविरुद्ध एवं एकवाक्यताविरुद्ध प्रयोगकी अपेक्षा नहीं की
जा सकती । अतः √असु क्षेपणे (दिवादि) से कर्त्रर्थमें ‘ल्यु’ प्रत्ययसे स्त्री०में
‘असना = क्षेपणी’, दूर हटाने वाली, व्याख्या निर्दोष एवं प्रसङ्गानुकूल है ।
चतुर्थ पादमें इसके पूर्व ‘अपि’ भी इसी व्याख्यामें अनुकूल है । अन्यथा
‘अनङ्गतापिताङ्गता होते हुए भी मुझे इतना ताप नहीं देती’, यह विपरीत
अर्थ निकलता है । यदि ‘नेयते = न इयते = अनियते = अपरिमिताय’ अर्थ भी
कर लें, तब भी ‘अपि’ से क्या वैपरीत्य अभीष्ट है ?
यहाँ प्रथमपादान्तगत ‘मदेन सा’ द्वितीयपादान्तगत ‘न योजिता’ तृतीय-
पादान्तवर्ती ‘ङ्गतापिता’ बहुवर्णसमुदाय निरन्तर अगले पादमें आवृत्त होकर
दो पादोंको जैसे सँडसीसे पकड़ लेते हैं; उन्हें जोड़ देते हैं । इसके अतिरिक्त
प्रकारका कोई यमक यहाँ नहीं हैं । इसलिये यह शुद्ध चतुष्पाद अव्यपेत
सन्दष्ट यमक का उदाहरण है । ‘तापितापाय’ में मृदुवर्णोंकी आवृत्तिसे
विप्रलम्भ रतिके अनुकूल अनुप्रास यहाँ माधुर्योत्पादक है । छन्द वंशस्थ
है ॥ ५२ ॥
(२) समुद्ग यमक—‘समुद्ग’ शब्द ‘सम्पुटक’ (दौने) का पर्याय है ।
इस सजावटी यमककी परिकल्पना भरतने इस प्रकार की है : जो वृत्त
१. वादितीका : ‘न योजिता’ इत्यादि कर्तरि क्तः । अष्टा० ३।४।७१ :
आदिकर्मणि क्तः कर्तरि च ।