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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

६२ काव्यादर्श [३।७५
'सोऽहं' से निष्पन्न 'हंसः' ध्वनि (नाद) होता है । इसे 'मानस यज्ञ' कहा
गया है ।^१ अस्तु, इस प्रणवात्मक या महावाक्यात्मक नादके सतत अभ्याससे
मनकी बाह्य वृत्तियां समाप्त हो जाती हैं और मन इस नादमें ही लीन हो
जाता है ।^२ मनकी वृत्तियोंका बीज काम (इच्छा) है ।^३ मनकी वृत्तियाँ
जब लीन हो जाती हैं, तो जीवकी बुद्धि मदनरहित (कामरहित) स्वतः हो
जाती है । इसके परिणामस्वरूप कामकी त्रिविध वृत्तियां (एषणात्रय^४) नादा-
भ्यासी पुरुषके मनमें उदित तो होती ही नहीं हैं, जो प्रारब्धवशात् स्थित हैं,
वे भी कालक्रमसे उनके भोगसे शान्त, व्युपरत हो जाती हैं ।^५ इस प्रकार
नादाभ्यासी पुरुषकी अमदनताकी स्थितिसे अकामता (एषणात्रय-रहितता)
की स्थिति उत्पन्न होती है । चित्तमें जो सञ्चित और प्रारब्ध कर्म स्थित हैं,
१. पाशुपत ब्रह्मोपनिषत्, पूर्वकाण्ड, १२ : मानसो हंसः 'सोऽहं = हंसः' इति
तन्मयं यज्ञो नादानुसन्धानम् । तन्मयविकारो जीवः । उत्तरकाण्ड ३ :
अन्तः प्रणवनादाख्यो हंसः प्रत्ययबोधकः ।
२. स्वात्मानं पुरुषं पश्येन् मनस्तत्र लयं गतम् । ध्यानबिन्दूप० १०५
ब्रह्मप्रणवसंलग्ननादो ज्योतिर्मयात्मकः ।। ४६
मनस्तत्र लयं याति, तद् विष्णोः परमं पदम् । ४७
सदा नादानुसन्धानात् सङ्क्षीणा वासना भवेत् ।। ४६
सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सर्वचिन्ताविवर्जितः ।। ५१
न जानाति स शीतोष्णं, न दुःखं, न सुखं तथा । ५३
अवस्थात्रयमन्वेति न चित्तं योगिनः सदा ॥ ५४
३. कामस्तदग्रे समवर्तताधि, मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । ऋ० १०।१२६।४
४. ईशोपनिषद्भाष्यकुसुमाञ्जली, पृष्ठ १२, देखें ।
५. अधिष्ठाने तथा ज्ञाते, प्रपञ्चे शून्यतां गते ।
देहस्यापि प्रपञ्चत्वात् *प्रारब्धावस्थितिः कुतः ? ।। नादबिन्दूपनिषत् २८
ततः कालवशादेव *प्रारब्धे तु क्षयं गते ।। २६
ब्रह्मप्रणवसन्धाननादो ज्योतिर्मयः शिवः ।
स्वयमाविर्भवेदात्मा मेघापायेऽंशुमानिव ।। ३०

  • अष्टाविंशश्लोकोक्त 'प्रारब्ध'से 'प्रकृत देहारब्ध' अर्थात् 'क्रियमाण
    कर्म' अभीष्ट हैं एवं उनत्रिंश श्लोकमें उक्त 'प्रारब्ध' से सञ्चित और
    क्रियमाणसे भिन्न प्रारब्धभोग कर्म अभीष्ट हैं । अन्यथा 'कालवशात्
    क्षय' कहना आवश्यक नहीं है । उपनिषद् ब्रह्मयोगिने इस प्रकरणमें 'न
    कदापि प्रारब्धादिकर्मत्रयं विद्यते ।' माना है ।