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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 270 में से

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पृष्ठ 116

३।७५ ] १ यमक : (७. ख) श्लोकार्ध प्रतिलोम ६३
उनका भी क्षय हो जाता है । ऐसे अभ्यासियोंके तामिका (मल) न होनेसे
क्रियमाण कर्म बन्धनकारी नहीं होते, गुणस्वभावसे प्राप्त मात्र होते हैं ।
यह मल कामके अधीन है । चित्तमें विद्यमान होते हुए भी यह मल तब तक
काम नहीं करता, जब तक कि चित्तमें मदन = काम = इच्छा का उदय न हो
जाये । साधक लोग इस कामका उदय कभी नादाभ्याससे व्युत्थानकी स्थिति
में न हो जाये, इसके लिये ‘दम’ (इन्द्रियदमन) का, अपने चित्तकी वृत्तियोंके
दमनका, आश्रय लिया करते हैं ।१ इस दमपाशको तहस-नहस करने वाला
मत्तमातङ्ग कामकरी ही है ।२ इसलिये कविने उसे ‘दम-नोदी’ (दमको उखाड़
फेंकने वाला) कहा है । मनुष्यकी दृक् और क्रिया (११ ज्ञानकर्मेन्द्रियों) को
आच्छादित करने वाले चित्तमलको कविने ‘तामिका’ कहा है । यह मल
चावलपर भूसीके समान है । अर्थात् जब तक मनमें यह मल है, तब तक ही
मन रूपी चावल अङ्कुरणमें समर्थ है । इस तुषके हट जानेपर यह अङ्कुरित
नहीं हो सकता । अथवा यह मल (तामिका) ताँबे (धातु) पर स्थित मैलके
समान है । जबतक धातुपर मैल है, तब तक धातुका स्वरूप प्रकाशित नहीं
होता ।३ नादाभ्यासके कारण यह तामिका भी नष्ट हो जाती है ।
प्रकृत श्लोकमें पूर्वार्ध और उत्तरार्धमें अनुलोम-विलोम भाव सम्बन्ध है ।
पूर्वार्ध अनुलोम है और उत्तरार्ध उसका प्रतिलोम है । अतः यहाँ श्लोकार्ध-
प्रतिलोम यमक है । आचार्यने प्रथम पादके अनुलोम नाधीः स्वा के प्रतिलोम
पाठमें विसर्गको यमकभञ्जक नहीं माना है । भारविने भी (किराता० १५।
२२-२३में) विसर्गको यमकभञ्जक नहीं माना है । इसी धारणाकी अभि-
व्यक्ति वाग्भटने ‘अनुस्वार और विसर्ग चित्र अलङ्कारको भङ्ग करने वाले
नहीं माने जाते’४ कहकर की है । वाग्भटके इस कथनमें ‘चित्र’ शब्द सभी
दुष्कर बन्धोंका उपलक्षक है५ ॥ ७५ ॥
१. महानारायणोपनिषत् २२।१ : दमेन दान्ताः किल्बिषमवधुन्वन्ति । दमेन
ब्रह्मचारिणः सुवरगच्छन् । दमो भूतानां दुराधर्षम् । दमे सर्वं प्रतिष्ठितम् । तस्माद् दमः परमं वदन्ति ।
२. कुर्यां हरस्यापि पिनाकपाणेर्धैर्यच्युतिं के मम धन्विनोऽन्ये ? कुमार० ३।४
३. एको ह्यनेकशक्तिर्दृक्क्रिययोश्छादको मलः पुंसः ।
तुषतण्डुलवज्ज्ञेयस्ताम्रस्थितकालिकावद् वा ।। तत्त्वप्रकाशिका १८
४. नानुस्वारविसर्गौ च चित्रभङ्गाय सम्मतौ । वाग्भटाल० १।२०
५. श्लोक ७८ के पूर्व ‘चित्र का अर्थ’ प्रकरण, पृष्ठ ६५, देखें ।