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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 270 में से

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पृष्ठ 114

३।७५] १ यमक (७. ख) श्लोकार्ध-प्रतिलोम यमक ६१
(ख) नादिनोमोदना धीः स्वा, न मे काचन कामिता ।
तामिका न च कामेन स्वाधीना दमनोदिना ॥ ७५ ॥
(ख) मुझ प्रणव नादकी भावना वालेकी अपनी बुद्धि मदनसे रहित है ।
(मुझे) कोई एषणा नहीं (शेष रही) है। इन्द्रियोंके दमनको खण्डित करने
वाले कामके द्वारा अपने (कामके) अधीन रहने वाली कालिख (मुझे) नहीं
है ॥ ७५ ॥
चुभलानेके बाद अनुलोम-प्रतिलोम पाठकी चर्वणासे जन्य रसके आस्वादके
आगे रति चातुरी बहुत उपेक्षित हो जाती है । अतः इस प्रकारके यमक
माधुर्यविरोधी हैं ।
यह प्रतिलोम विन्यास भिन्नार्थक प्रतीति कराता है । पर अभिन्नार्थक
भी हो सकता है । जैसे- माघके एक श्लोकमें पादको अनुलोम और प्रतिलोम
पढ़नेसे एक ही वर्णविन्यास तनिकसे क्रमभेदसे उपलब्ध होता है ।¹ दोनों
पाठोंमें इसलिये अर्थ एक ही प्रकट होता है। यह विधा दण्डीके पादप्रतिलोम-
यमकके उदाहरणसे भिन्न प्रकारकी है ॥ ७४ ॥
(७. ख) श्लोकार्ध प्रतिलोम यमक — ७५वें श्लोकमें आचार्य दण्डीने किसी
प्रणवनादाभ्यासी पाशुपत योगीके आत्मतोषका वर्णन किया है । दण्डीके कालमें
तन्त्र एवं योगके राजयोग तथा हठयोग मार्गोंके मिश्रणसे कई शैव, शाक्त,
वैष्णव साधनामार्ग प्रचलित थे । उसके अनुसार प्रणव (ओङ्कार) का अजपा
जप (इसे 'अजपा गायत्री' भी कहा जाता था) किया जाता था । इसके अवि-
च्छिन्न सन्तानसे मूलाधार चक्रमें सुषुम्णामें एक अमूर्त नाद (अव्यक्त ध्वनि)
श्वास-प्र-श्वासकी क्रियाके समान सहज रूपसे उन अभ्यासियोंमें सिद्ध हो
जाता था ।² इसे 'अन्तः प्रणव', 'ब्रह्म प्रणव' या 'महावैराज प्रणव' के नामसे
कहा गया है ।³ इस प्रकारकी वेदान्तानुकूल साधनामें जपका मन्त्र 'अहं सः'
१. विदितं दिवि केऽनीके तं यातं निजिताऽऽजिनि ।
विगदं गवि रोद्धारो योद्धा यो नतिमेति न ।। माघ० १६।२०
२. मूलाधारात् सुषुम्णा च बिसतन्तुनिभा शुभा ।। ध्यानबिन्दूपनिषद् १०१
अमूर्ती वर्तते नादो वीणादण्डसमुत्थितः । १०२
उपनिषद् ब्रह्मयोगी : तत्र सुषुम्णाश्रयवीणादण्डे समुत्थितः सन्नमूर्ती नादो
वर्तते ! अत एव वीणादण्डमध्यमेव नादोत्पत्तिस्थानम् ।
३. पाशुपतब्रह्मोपनिषद्, उत्तरकाण्ड ३; ध्यानबिन्दूपनिषद् १, ३०, ४६ ।