कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· कवितावली २६
तेई पाय पाइकै चढ़ाइ नाव धोए बिनु,
खवैहौं न पठावनी कै ह्वैहौं न हँसाइ कै ॥९॥
जिन चरणोंके (धोवनरूप) पवित्र जल—श्रीगङ्गाजीको शिवजी
अपने सिरपर धारण करते हैं, जिन (गङ्गाजी) के यशका वेद
भी गा-गाकर वर्णन करते हैं; जिनके लिये योगीश्वर, मुनिगण और
देवतालोग देहका दमन कर, मन लगाकर अनेक प्रकारके योग और
जप करते हैं; गोसाईंजी कहते हैं, जिनकी धूलिको स्पर्शकर
अहल्या तर गयी और गौतमजी गौनेके समान अपनी
स्त्रीको लिवाकर घर चले गये; उन्हीं चरणोंको पाकर बिना धोये
नावपर चढ़ाकर मैं अपनी मजूरी नहीं खोऊँगा और न अपनी हँसी
कराऊँगा।
प्रभुरुख पाइ कै, बोलाइ बालक घरनिहि,
वंदि कै चरन चहूँ दिसि बैठे घेरि-घेरि।
छोटो-सो कठौता भरि आनि पानी गंगाजूको,
धोइ पाय पीअत पुनीत वारि फेरि-फेरि॥
तुलसी सराहें ताको भागु, सानुराग सुर
बरषैं सुमन, जय-जय कहैं टेरि-टेरि।
विविध सनेह-सानी बानी असयानी सुनि,
हँसैं राघौ जानकी-लखन तन हेरि-हेरि ॥१०॥
श्रीरामचन्द्रजीका रुख देख केवटने अपने लड़के और स्त्रीको
बुलाया। वे सब प्रभुके चरणोंकी वन्दना कर चारों ओरसे उन्हें
घेरकर बैठ गये। पुनः छोटे-से काठके कठौतेमें गङ्गाजीका जल
लाया और चरण धोकर उस पवित्र जलको बार-बार पीने लगा।