कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॐ
श्रीसीतारामभ्यां नमः
कवितावली
अयोध्याकाण्ड
वन-गमन
कीरके कागर ज्यों नृपचीर, बिभूषन उप्पम अंगनि पाई ।
औध तजी मगबासके रूख ज्यों, पंथके साथ ज्यों लोग-लोगाई ॥
संग सुबंधु, पुनीत प्रिया, मनो धर्मु क्रिया धरि देह सुहाई ।
राजिवलोचन रामु चले तजि बापको राजु बटाउ कीं नाई ॥
श्रीरामके अङ्गोंने राजोचित वस्त्रों और अलंकारोंका त्याग कर
वही शोभा पायी जो सुग्गा अपने पंखोंको त्याग कर पाता है ।
अयोध्याको मार्गनिवास (चट्टी) के वृक्षों और वहाँके स्त्री-पुरुषोंको
रास्तेके साथियोंके समान त्याग दिया । साथमें सुन्दर भाई और
पवित्र प्रिया ऐसे मालूम होते हैं मानो धर्म और क्रिया सुन्दर देह
धारण किये हुए हों। कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी अपने पिताका
राज्य बटोहीकी तरह छोड़कर चल दिये ।
[ जैसे सुग्गा वसन्त-ऋतुमें पुराने पंखोंको त्यागकर
आनन्दित होता है वैसे ही श्रीरामचन्द्रजीने राजवस्त्र और
अलंकारोंको आनन्दसे त्याग दिया । जैसे रास्तेमें निवासस्थानके
वृक्षको त्यागनेमें कुछ भी खेद नहीं होता, वैसे ही उन्होंने