कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली १७४
देवताओंके मुकुटमणि, जानकीरमण श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो !
जय हो !! जय हो !!!
जय जयंत-जयकर, अनंत, सज्जनजनरंजन !
जय विराध-वध विदुष, विबुध-मुनिगन-भय-भंजन !
जय निसिचरी-विरूप-करन रघुवंसविभूषन !
सुभट चतुर्दस-सहस दलन त्रिसिरा-खर-दूषन ॥
जय दंडकवन-पावन-करन, तुलसिदास-संसय-समन !
जगविदित, जगतमनि, जयति जय जय जय जय जानकिरमन !॥
जयन्तको जीतनेवाले, अन्तरहित और साधुजनोंको आनन्द
देनेवाले रामजी ! आपकी जय हो । विराधके वधमें कुशल तथा
देवता और मुनिगणोंका भय दूर करनेवाले प्रभु राम ! आपकी जय
हो । राक्षसी ( शूर्पणखा ) को रूपरहित करनेवाले, रघुकुलके
भूषण ! आपकी जय हो । चौदह सहस्र वीरों और खर, दूषण,
त्रिशिराका नाश करनेवाले ! आपकी जय हो । दण्डकवनको पवित्र
करनेवाले तथा तुलसीदासके संशयका नाश करनेवाले ! आपकी
जय हो । संसारमें प्रख्यात तथा जगत्के प्रकाशक जानकीरमण
भगवान् राम ! आपकी जय हो ! जय हो !! जय हो !!!
जय मायामृगमथन, गीध-सबरी-उद्धारन !
जय कबंधसूदन बिसाल तरु ताल बिदारन !
दवन बालि बलसालि, थपन सुग्रीव, संतहित !
कपि कराल भट भालु कटक पालन, कृपालचित !