सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 178

१७५ उत्तरकाण्ड
जय सिय-वियोग-दुख हेतु कृत-सेतुबंध-वारिधिदमन !
दसर्मीस विभीषन अभयप्रद, जय जय जय जानकिरमन! ॥११४॥
मायामृगरूप मारीचको मारनेवाले तथा जटायु और शबरीका
उद्धार करनेवाले भगवान् राम ! आपकी जय हो । कबन्धको
मारनेवाले और बड़े-बड़े ताड़के वृक्षोंको विदीर्ण करनेवाले प्रभु
राम ! आपकी जय हो ! बलसम्पन्न बालिका नाश करनेवाले,
सुग्रीवको राज्य देनेवाले तथा संतोंका हित करनेवाले ! आपकी जय
हो । भयानक भालु और वानर वर्गोंके कटकका पालन करनेवाले
दयार्द्रचित्त रघुनाथजी ! आपकी जय हो । जानकीजीके वियोगजनित
दुःखके कारण समुद्रका दमन करके उसपर सेतु बाँधनेवाले रामजी !
आपकी जय हो । तथा रावणसे विभीषणको अभय देनेवाले हे
जानकीरमण ! आपकी जय हो ! जय हो !! जय हो !!
रामप्रेमकी प्रधानता
कनकभूधरु केदारु, बीजु सुंदर सुरमनि बर ।
सींचि कामधुक धेनु सुधामय पय विसुद्धतर ॥
तीरथपति अंकुरसरूप जच्छेस रच्छ तेहि ।
मरकतमय साखा-सुपत्र, मंजरिय लच्छि जेहि ॥
कैवल्य सकल फल, कलपतरु सुभ सुभाव सब सुख वरिस ।
कह तुलसिदास, रघुबंसमनि ! तौ कि होइ तुअ कर सरिस॥११५॥
सुमेरु पर्वत थाल्हा हो, सुन्दर चिन्तामणि बीज हो,
कामधेनुके अमृतमय अत्यन्त शुद्ध दुग्धसे उसे सींचा जाय, उससे
तीर्थराज प्रयाग अंकुररूपसे प्रकट हो, उसकी रक्षा स्वयं कुबेरजी