कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७३ उत्तरकाण्ड
बलि जाउँ, राम ! करुनायनन, प्रनतपाल, पातकहरन ।
बलि जाउँ, राम! कलि-भय-विकल तुलसिदासु राखिअ सरन १११
हे महाराज ! हे सेवकसुखदायक राम ! मैं आपकी बलि जाता
हूँ । हे महाराज ! हे सुन्दर और सर्वसमर्थ राम ! मैं आपकी
बलि जाता हूँ । हे महाराज ! हे राम ! आप सब संकटोंसे छुड़ाने-
वाले हैं । मैं आपकी बलि जाता हूँ । हे कमलनयन महाराज
राम ! मैं आपपर बलिहारी हूँ । आप करुणाके धाम, शरणागत-
रक्षक और पापोंको दूर करनेवाले हैं । हे राम ! मैं आपकी बलि
जाता हूँ, कलिकालके भयसे व्याकुल तुलसीदासको आप अपनी
शरणमें रखिये ।
जय ताड़का-सुबाहु-मथन मारीच-मानहर !
मुनिमख-रच्छन-दच्छ, सिलातारन, करुनाकर !
नृपगन-बल-मद सहित संभु-कोदंड-विहंडन !
जय कुठारघरदर्पदलन दिनकरकुलमंडन ॥
जय जनकनगर-आनंदप्रद, सुखसागर, सुषमाभवन !
कह तुलसिदासु, सुरमुकुटमनि, जय जय जय जानकिरवन !११२
ताड़का और सुबाहुका नाश करनेवाले, मारीचके मदको
तोड़नेवाले, विश्वामित्र मुनिके यज्ञकी रक्षामें दक्ष, शिलारूप अहल्या-
को तारनेवाले, करुणाकी खानि, राजाओंके मदसहित शिवजीके
धनुषको तोड़नेवाले ! आपकी जय हो । कुठारधर परशुरामके
अभिमानको चूर्ण करनेवाले, सूर्यकुलभूषण भगवान् राम ! आपकी
जय हो । जनकपुरीको आनन्द देनेवाले, परम सुखसागर, शोभाधाम
श्रीरामचन्द्रजी ! आपकी जय हो । तुलसीदासजी कहते हैं कि