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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 228 में से

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पृष्ठ 104

१०१ लंकाकाण्ड
है । महाबलशाली बालिको मारकर सुग्रीवकी रक्षा की और
विभीषणको राजा बनाया । इधर स्त्री हरी गयी और भाई भी समरमें
गिर गये; तो भी हृदयमें शरणागतकी ही चिन्ता है । भला, श्रीराम-
चन्द्रजीके समान अपनी भुजाका आश्रय देनेवाला उदार और दयालु
वीर दूसरा कहाँ मिलेगा ?
लीन्हो उखारि पहारु बिसाल,
चल्यो तेहि काल, बिलंबु न लायो ।
मारुतनंदन मारुतको, मनको,
खगराजको वेगु लजायो ॥
तीखी तुरा 'तुलसी' कहतो,
पै हिएँ उपमाको समाउ न आयो ।
मानो प्रतच्छ परब्बतकी नभ
लीक लसी, कपि यों धुकि धायो ॥५४॥
[ लक्ष्मणजीकी मूर्च्छानिवृत्तिके लिये जब सुषेणने सञ्जीवनी
बूटी निश्चित की तो उसे लानेके लिये श्रीहनुमान् जी द्रोणाचल पर्वतपर
गये । तब उसे पहचान न सकनेके कारण ] उन्होंने उस विशाल
पर्वतको उखाड़ लिया और तनिक भी विलम्ब न कर तत्काल चल
दिये । उस समय मारुतनन्दन ( हनुमान्जी ) ने वायु, गरुड़ और
मनकी गतिको भी लज्जित कर दिया । गोसाईंजी कहते हैं कि मैं
उनके प्रचण्ड वेगका वर्णन करता; परन्तु हृदयमें उसकी उपमाकी
सामग्री कहीं नहीं मिली । हनुमान्जी झपटकर ऐसे दौड़े कि
आकाशमें पर्वतकी प्रत्यक्ष लकीर-सी शोभित होने लगी । [ तात्पर्य
यह कि ऐसी शीघ्रतासे हनुमान्जी पर्वत लेकर चले कि चलने और