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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

कवितावली १०२
पहुँचनेके स्थानतक एक ही पर्वत मालूम होता था । ]
चल्यो हनुमानु, सुनि जातुधानु कालनेमि
पठयो, सो मुनि भयो, पायो फलु छलि कै ।
सहसा उखारो है पहारु बहु जोजनको,
रखवारे मारे भारे भूरि भट दलि कै ॥
बेगु, बलु, साहसु, सराहत कृपाल रामु,
भरतकी कुसल, अचलू ल्यायो चलि कै ।
हाथ हरिनाथके बिकाने रघुनाथु जनु,
सीलसिंधु तुलसीस भलो मान्यो भलि कै ॥५५॥
हनुमान्‌जीका जाना सुन रावणने राक्षस कालनेमिको भेजा ।
उसने मुनिका वेष बनाया और इस प्रकार छल करनेका फल पाया,
अर्थात्‌ मारा गया । हनुमान्‌जीने अनेकों योजनके पर्वतको सहसा
उखाड़ लिया और रक्षकोंको मारकर बड़े-बड़े अनेक वीरोंका नाश
कर दिया । 'देखो, हनुमान्‌जी चलकर पर्वत और भरतजीका
कुशल-समाचार लाये हैं'—ऐसा कहकर कृपालु रघुनाथजी उनके
बल, साहस और वेगकी सराहना करने लगे । मानो श्रीरामचन्द्रजी
कपिनाथ (हनुमान्‌जी) के हाथ बिक गये । तुलसीदासके
स्वामी शीलसिन्धु श्रीरामचन्द्रने सम्यक् प्रकारसे उनका उपकार
माना ।
युद्धका अन्त
बाप दियो काननु भो आननु सुभाननु सो,
बैरी भो दसाननु सो, तीयको हरनु भो ।
बालि बलसालि दलि, पालि कपिराजको,