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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 103

कवितावली १००
कहैं 'मैं विभीषनकी कछु न सबील की' ।
लाज बाँह बोलेकी, नेवाजेकी सँभार-सार,
साहेबु न रामु से बलाइ लेउँ सीलकी ॥५२॥
बड़े-बड़े वीर अभिमानी मेघनादसे ललकारकर भिड़ गये और
उन्होंने अपने-अपने पुरुषार्थमें कमी नहीं की । लक्ष्मणजीको घायल
देखकर श्रीरामचन्द्रजी बिलखने लगे और जगत्‌के निवासस्थान
( भगवान् ) के दिलकी आशाएँ शिथिल हो गयीं । तुलसीदासके
स्वामीको न तो भाईका मोह है और न जानकीजीकी ममता है, वे
यही कह रहे हैं कि मैंने विभीषणके लिये कुछ भी प्रबन्ध नहीं
किया । उन्हें तो अपनी शरणमें लियेकी लाज है और अपने
अनुगृहीत दासकी सार-सँभालका ख्याल है । श्रीरामचन्द्रजीके समान
कोई स्वामी नहीं है, मैं उनके शीलकी बलिहारी जाता हूँ ।
कानन बासु, दसाननु सो रिपु,
आननश्री ससि जीति लियो है ।
बालि महा बलसालि दल्यो,
कपि पालि बिभीषनु भूपु कियो है ॥
तीय हरी, रन बंधु पर्यो,
पै भरयो सरनागत-सोच हियो है ।
बाँह-पगार उदार कृपाल कहाँ
रघुबीरू सो बीरु बियो है ॥५३॥
वनमें निवास है और दसमुख रावणके समान प्रबल शत्रु
है, तो भी प्रभुके मुखकी शोभाने चन्द्रमाकी शोभाको जीत लिया