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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

तिलमिश्रा हुत्वा प्राश्नाति ॥ ११ ॥ पुरस्तादग्नेः कल्माषं
दण्डं निहत्य पश्चादग्नेः कृष्णाजिने धाना अनुमन्त्रयते ॥१२॥
सूक्तस्य पारं गत्वा प्रयच्छति ॥१३॥ सकृज्जुहोति ॥१४॥
दण्डधानाजिनं ददाति ॥१५॥ अहं रुद्रेभिरिति शुक्ल-
पुष्पहरितपुष्पे किंस्त्यनाभिपिप्पल्यौ जातरूपशकलेन
प्राक्स्तनग्रहात् प्राशयति ॥ १६॥ प्रथमप्रवदस्य मातु-
रुपस्थे तालुनि सम्पातानानयति ॥ १७ ॥ दधिमध्वाश-
यति ॥ १८ ॥ उपनीतं वाचयति वार्षशतकं कर्म ॥१९॥
त्वं नो मेघे द्यौश्च म इति भक्षयति ॥ २० ॥ आदित्य-
मुपतिष्ठते ॥२१॥ यदग्ने तपसेत्याग्रहायण्यां भक्षयति
॥ २२ ॥ अग्निमुपतिष्ठते ॥२३॥ प्रातरग्निं गिरावर्गराटेषु
को जाया करे तब २ ब्रह्मचारी जप किया करे ॥९॥ लावा, घी, मिला-
कर हवन करे ॥१०॥ तिल रें., घी मिलाकर हवन कर शेष हवि को
प्राशन करे ॥११॥ काले रंग के दण्ड को अग्नि के पीछे धर कर काले
रंग के मृग चर्म पर धाना धर कर उस का अनुमंत्रण करे ॥१२॥ सूक्त
को पढ़ लेने पर देवे ॥१३॥ धान को अजिन के द्वारा एक बार आहुति
देवे ॥१४॥ और उपाध्याय के लिये दण्ड धान अजिन देवे ॥१५॥ “अहं
रुद्रेभिः” इत्यादि से शंखपुष्पिका, अन्धपुष्पिका, शंखनाभि, पिप्पली
को सोने के शलाका से घस कर माँ के दूध पीने के पहिले बालक को
चटावे ॥ और बच्चे को भली भाँति वर्चस्वी बनाने के लिये और
मेधावि बनाने वाला पहिले माता के गोद में बच्चे को देकर “अहं रुद्रेभिः”
सू० से पाँच कर्मों को जात कर्म में करे और सम्पात को तालु पर डाले
॥१६॥१७॥ और दही मधु मिलाकर बच्चे को चटावे ॥१८॥ और बालक
के पास “अहं रुद्रेभिः” सूक्त एवं “आयातु मित्र” इत्यादि गण के अन्त के
वचन को पढ़े—जो बच्चे की आयुः सौ वर्ष की चाहे वह इस कर्म को करे
॥१९॥ “त्वं नो मेघे०” मंत्रों से भक्षण करावे ॥२०॥ आदित्य का उपस्थान
करे ॥२१॥ “यदग्ने तपसे०” इत्यादि से आग्रयण की पौर्णमासी को मेधा-
जनन कर्म कर के और बच्चे को शेष हवि भक्षण करावे ॥ २२ ॥ और

२४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
दिवस्पृथिव्या इति संह्राय मुखं विमार्ष्टि ॥२४॥१॥१०॥
पूर्वस्य ब्रह्मचारि साम्पदानि ॥१॥ औदुम्बर्यादयः ॥२॥
ब्रह्मचार्यावसथादुपस्तरणान्यादधाति ॥३॥ पिपीलिकोद्वापे
मेदोमधुश्यामाकेषीकतूलान्याज्यं जुहोति ॥ ४ ॥ आज्य-
शेषे पिपीलिकोद्वापानोप्य ग्राममेत्य सर्वहुतान् ॥ ५ ॥
ब्रह्मचारिभ्योऽन्नं धानास्तिलमिश्राः प्रयच्छति ॥६॥ एता-
निग्रामसाम्पदानि ॥ ७ ॥ विकारस्थूणामूलावत्तक्षणानि
समानामुपस्तरणानि ॥८॥ ग्रामीणेभ्योऽन्नम् ॥९॥ सुरां
सुरापेभ्यः ॥ १० ॥ औदुम्बर्यादीनि भक्षणान्तानि सर्व-
साम्पदानि ॥११॥ त्रिज्योतिःकुरुते॥१२॥ उपतिष्ठते॥१३॥
सव्यात्पाणिहृदयाल्लोहितं रसमिश्रमश्नाति ॥ १४॥
पृश्निमन्थः ॥ १५ ॥ जिह्वाया उत्साद्यमक्ष्योः परिस्तरण-
अग्नि का उपस्थान करे ॥२३॥ "प्रातरग्नि०" इत्यादि पढ़ कर सोते से उठ
कर मुख का प्रक्षालन करे ॥२४॥ १॥ यह दशमी कण्डिका पूरी हुई ॥१०॥
पौर्णमासी को निर्ऋति कर्म करके एक वार प्रातःकाल में ब्रह्मचारी
"त्रिषप्तीय०" सूक्त से साम्पद् कर्म करे ॥ उदुम्बर आदि १०।४
सूत्रोक्त अग्नि का आधान करे ॥२॥ ब्रह्मचारी अपने घर से तृणादि को
लाकर आधान करे ॥३॥ चूँटियों से फेकी वा निकाली हुई मट्टी के छिद्र
में मेद, मधु, श्यामक, शरपुष्प इनको आज्य के साथ आहुति देवे ॥४॥
आज्य शेष में पिपीलिका की मट्टी को थाली में धर कर ग्राम में आकर
एक वार हवन करे ॥५॥ ब्रह्मचारियों के लिये अन्न, और तिल मिला धान
देवे ॥६॥ पूर्व दिन में निर्ऋति कर्म करके ग्राम साम्पद् का अधिकार
होता है। समिद् का विकार, स्थूणा (खूँटी) के जड़, इनके अवतक्षण
(चीर, फाड़, कर, ) को यज्ञ के उपस्तरण करे ॥७।८॥ ग्रामीणों को
अन्न, सुरा पीने वाले को सुरा देवे ॥९।१०॥ औदुम्बर, पलाश, बैर
आदि और क्षीरौदन, पुरोडाश, रस ये सर्वकामनाओं के लिये हैं ॥११॥
तीनवार ज्योतिःकरै ॥१२॥ तब उपस्थान करे ॥१३॥ सव्य हाथ से लाल
सहजन को पानी में मिलाकर खावे ॥१४॥ गौ का मट्ठा ॥१५॥ मस्तु

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २५

मस्तृहणं हृदयं दूशं उपनह्य तिस्रो रात्रीः पल्पूलने
वासयति ॥१६॥ चूर्णानि करोति ॥१७॥ मैश्रधान्ये मन्थ
ओप्य दधिमधुमिश्रमश्नाति ॥ १८ ॥ अस्मिन् वसु यदा
बध्नन्नव प्राणानिति युग्मकृष्णलं वासितं बध्नाति ॥१९॥
सारूपवत्सं पुरुषगात्रं द्वादशरात्रं सम्पातवन्तं कृत्वा-
˙नभिमुखमश्नाति ॥ २० ॥ २ ॥ ११ ॥
कथं मह इति मादानकश्रुतं क्षीरौदनमश्नाति ॥१॥
चमसे सरूपवत्साया दुग्धे व्रीहियवाववधाय मूर्च्छयि-
त्वा मध्वासिच्याशयति ॥ २ ॥ पृथिव्यै श्रोत्रायेति
जुहोति ॥३॥ वत्सो विराज इति मन्थान्तानि ॥४॥ सहृ-
दयं तदू षु संजानीध्वमेह यातु·सं वः पृच्यन्तां सं वो
मनांसि संज्ञानं न इति सांमनस्यानि ॥ ५ ॥ उदकुलिजं
संम्पातवन्तं ग्रामं परिहृत्य मध्ये निनयति ॥६॥ एवं सुरा-
लङ्कक में धूलक आदि को पुराने वस्त्र में बांधकर तीन रात तक गौ के
गोबर में वासे और चौथे दिन पुराने वस्त्र सहित को चूर्ण करे ॥ और
मैश्रधान्ये में मथन को डालकर दधि, मधु मिलाकर खावे ॥१॥१६॥१७॥१८॥
“अस्मिन्वसु यदा बध्नन्नव प्राणान् इस मंत्र से उक्त प्रतीकों में कृष्णमणि
को वास कर सब कामना सिद्धि चाहने वाला इस को हाथ या गले में
बांधे ॥१९॥ एक वर्ण बच्चे वाली गौके दूध में पके ओदन को पुरुषाकृति
बनाकर १२ दिन तक उस पर दूध में पके ओदन को ढारे ॥२०॥२॥११॥
दूसरी कण्डिका पूरी हुई ॥२॥
सम्पत्ति चाहने वाला “कथमहं” इत्यादि मादानक वृक्ष के काठ से
पके क्षीरोदन को खावे ॥१॥ चमसा में सरूप वत्सा गौ के दूध में
व्रीहि, यव डालकर मूर्च्छना देकर उस में मधु देकर खावे ॥२॥ और
“पृथिव्यै श्रोत्राय०” से आहुति देवे॥३॥ “त्रिज्योतिः कुरुते” इत्यादि से
पृश्निमंथ-तक कर्म्म होते हैं ॥४॥ “सहृदयम्०” इत्यादि से सांमनस्य
कर्म कहे गये हैं ॥५॥ चूने वाले घड़े को बनाकर गाँव में भ्रमण करावे
४

२६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
कुलिजम् । ७॥ त्रिहायिण्या वत्सतर्याः शुक्तानि पिशिता-
न्याशयति ॥८॥ भक्तं सुरां प्रपां सम्पातवतूकरोति ॥९॥
पूर्वस्य ममाग्ने वर्च इति वर्चस्यानि ॥१०॥ औदुम्बर्यादीनि
त्रीणि ॥ ११ ॥ कुमार्या दक्षिणमूरुमभिमन्त्रयते ॥१२॥
वपां जुहोति ॥ १३॥ अग्निमुपतिष्ठते ॥ १४ ॥ प्रातरग्निं
गिरावरगराटे षु दिवस्पृथिव्या इति दधिमध्वाशयति
॥१५॥ कीलालमिश्रं क्षत्रियं कीलालमितरान् ॥१६॥३।१२॥
हस्तिवर्चसमिति हस्तिनम्। १॥हास्तिदन्तंबध्नाति।२।
लोमानि जतुना संदिह्य जातरूपेणापिधाप्य ॥३॥ सिंहे
व्याघ्रे यशो हविरिति स्नातकसिंहव्याघ्रबस्तकृष्णवृषभराजां
नाभिलोमानि॥४॥दशानां शान्तवृक्षाणां शकलानि॥५॥
[L13

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २७

सप्तमर्माणि स्थालीपाके पृक्तान्यश्नाति ॥६॥ अकुशलं
यो ब्राह्मणो लोहितमश्नीयादिति गार्ग्यः ॥७॥ उक्तो
लोममणिः ॥८॥ सर्वैराप्लावयति ॥६॥ अवसिञ्चति ॥१०॥
चतुरङ्गुलं तृणं रजोहरणं बिन्दुनाभिश्रोद्ध्योवमध्य ॥११॥
शुनि किलासमजे पलितं तृणे ज्वरो यो ऽस्मान्द्वेष्टि यं च
वयं द्विष्मस्तस्मिन् राजयक्ष्म इति दक्षिणा तृणं निरस्य-
ति गन्धप्रवादाभिरलंकुरुते ॥१२॥४॥१३॥
पूर्वस्य हस्तित्रसनानि ॥१ रथचक्रेण सम्पातवता-

खावे ॥६॥ इस रुधिर को जो ब्राह्मण खावे उसका कल्याण नहीं होता है
ऐसा गार्ग्य—कहते हैं ॥७॥ लोमणि के विषय में कहा गया ॥८॥ यह
कर्म क्षत्रियों के लिये है ब्राह्मण के लिये नहीं ॥८॥ पाँच प्रतीकों से
( मंत्रों से ) जल से नहवा कर, जलसे उस को सेक करे ॥९॥१०॥ चार
अङ्गुल परिमाण के तृण को—"रजउदक” कहते हैं । जिस के द्वारा धूलि
निकल जाती है। आकाश के जल ( मेघ-का पानी ) द्वारा किसी पात्रमें
नीचे छिद्रकर के उस में चार अङ्गुल वाला तृण लटका देवे और तृण के
नीचे दूसरा जलपात्र धर देवे जिस में शुद्ध जल गिरेगा। "शुनि किलास
समये" इत्यादि मंत्र से उस शुद्ध जल को मथकर तृण को दक्षिण दिशा में
फेक देवे एवं यस्ते गन्धः" इत्यादि तीन ऋचाओं से यक्ष्मा रोग वाले के
शरीर में सुगन्धित-पदार्थ उस जल में मिलाकर नित्य अनुलेपन करे
तो रोग छूट जावेगा ॥९॥१०॥११॥१२॥४॥१३॥ यह तेरहवीं कण्डिका
पूरी हुई ॥१३॥
अब राज कर्मों को कहेगे ॥ इन में से युद्ध सम्बन्धि कर्मों के तंत्र
को पहिले कहेंगे ॥१॥ अश्वत्थ वधक के वृक्ष के काठ की अरणियो द्वारा
अग्नि मन्थन कर "इन्द्रो मन्थतु" ० इत्यादि मंत्र से मन्थन करते हुए
अनुमंत्रण करे और "पूति रज्जूः”० इत्यादि आधी ऋचा से अग्नि गिरने
के स्थान में रज्जु को धरे । 'धूर्म परादृश्य०" आधी ऋचा से उत्पन्न अग्नि
को अनुमंत्रण करे । इस अग्निका नाम "सेनाग्नि" है ॥ अव्यचसश्च०”
सेना अग्नि का प्रणयन, ग्रहण, पंच गृहीत आज्य । अभ्यातानान्त आहु-
तियाँ करके लाल अश्वत्थ की शाखा को उत्तर भाग में रोपन कर

२८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
प्रतिप्रवर्तयति ॥२॥ यानेनाभियाति ॥३॥ वादित्रैः ॥४॥
दृतिवस्त्योरोप्य शर्कराः ॥५॥ तोत्रेण नग्नप्रच्छन्नः ॥६॥
विद्मा शरस्य मा नो विदन्नदारसृत्स्वस्तिदा अवमन्यु-
र्निर्हस्तः परिवर्त्मान्यभिभूरिन्द्रो जयात्यभित्वेन्द्रोति सा-
ङ्ग्रामिकानि ॥७॥ आज्यसक्तूञ्जुहोति ॥८॥ धनुरिध्मे
धनुःसमिधमादधाति ॥६॥ एवमिष्विध्मे ॥१०॥ धनुःस-
म्पातवद्विमृज्य प्रयच्छति ॥११॥ प्रथमस्येषुपर्ययणानि
॥१२॥ द्रुघ्न्यार्त्तीज्यापाशत्तृणमूलानि बध्नाति ॥१३॥ आ-
प्रधान कर्म करे। इस के अनन्तर उत्तर तंत्र में विशेषता है। संनति
होमांत तक करके "इमे जयंतु स्वाहेभ्य०" इत्यादि मंत्र से आज्य की आहुति
देवे। पश्चात् वधक काष्ठ प्रज्वलित अग्नि में बायें हाथ से इङ्गिड की
'पराभिजयन्तादुराहामोभ्यः ओं स्वाहेति" मंत्र से आहुति देवे। तब
शाखाओं पर दक्षिणा में- "नीललोहितेनामून्" मंत्र से डाले स्विष्ट-
कृत् आदि उत्तर तंत्र-हुआ। यह सांग्रामिकतंत्र है। सांग्रामिक तंत्रों
में सब जगह मंत्रों का उच्चारण ऊंचे स्वर से होगा परन्तु प्रधान
मंत्रों ही को ऊंचे स्वर से बोलना चाहिये ॥ अब शत्रु के हाथियों को
डराने के कर्मों का विधि कहेंगे ॥१॥ शत्रु सेना के हाथियों को युद्ध
में प्रवर्त्तमान के सम्मुख राजा अपनी सेना की हस्तिनियों को आगे करे
और रथचक्र के आगे हाथियों को प्रवृत्त करे घोड़े आदि को सम्पात् से
संस्कृत करके शत्रु सैन्य के सम्मुख करे ॥ पुरोहित बाजों के (भेरी,
मृदङ्ग झलरि आदि) साथ जावें, दृति (चमड़े का मोट) अनुवासना
चर्म इन दोनों में शर्करा (अस्त्र विशेष) को डाल कर हाथी पर प्रतोद
लेकर लग्न हो छिपाकर, हाथी को अङ्कुशादि से दण्ड देकर आगे शीघ्र
चलावे ॥२॥३॥४॥५॥६॥ "विद्मा शरस्य०" इत्यादि सूक्तों से आज्य
आहुतियाँ देवे ॥८॥ प्रादेशमात्र लम्बी सरपत की इध्म अग्नि में डाले
॥१०॥ और धनुष को सम्पात की तरह करके (अग्नि पर झुका कर)
राजा को देवे ये विजय कर्म समाप्त हुए ॥ इन कर्मों से शत्रु से न लड़ने
पर भी विजय होता है क्योंकि शत्रु सेना इन कर्मों को देखते ही
भाग जायेगी॥११॥ इषु निवारण कर्म को कहते हैं। द्रुघ्नी, आर्त्ती, ज्या,

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २९
रेऽसावित्यपनोदनानि ॥१४॥ फलीकरणतुषबुसावतक्ष-
णान्यावपति ॥१५॥ अन्वाह ॥१६॥ अग्निर्नः शत्रूनग्निनों
दूत इति मोहनानि ॥१७॥ ओदनेनोपयम्य फलीकर-
णानुलूखलेन जुहोति ॥१८॥ एवमणून् ॥१९ एकविंश-
त्या शर्कराभिः प्रतिनिष्पुनाति ॥२०॥ अप्वां यजते
॥२१॥ संशितमिति शितिपदीं सम्पातवतीमवसृजति
॥२२॥ उद्वहत्सुयोजयेत् ॥२३॥ इममिन्द्रेति युक्तयोः
प्रदानान्तानि ॥२४॥ दिग्युक्ताभ्यां नमो देववधेभ्य
इत्युपतिष्ठते ॥२५॥ त्वया मन्यो यस्ते मन्यो इति संर-
म्भणानि ॥२६॥ सेने समीक्षमाणो जपति ॥२७॥ भाङ्ग-
पाश, इन तृणों में किसी एक की जड़ को बांधे इस का फल शत्रु प्रयुक्त
शस्त्र

३० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मौञ्जान् पाशानिङ्गिडालंकृतान् सम्पातवतोऽनूक्तान्सेना-
क्रमेषु वपति ॥२८॥ एवमामपात्राणि ॥२९॥ इङ्गिडेन
संप्रोक्ष्य तृणान्याङ्गिरसेनाग्निना दीपयति ॥३०॥ यां धूमो
ऽवतनोति तां जयन्ति ॥३१॥५॥१४॥
ऋधद्धान्त्रस्तदिदासेत्याश्वत्थ्यां पात्र्यां त्रिवृतिगो-
मयपरिचये हस्तिपृष्ठे पुरुषशिरसि वामित्राञ्जुह्वदभि-
प्रक्रम्य निवपति ॥१॥ वराहविहिताद्राजानो वेदिं कुर्व-
न्ति ॥२॥ तस्यां प्रदानान्तानि ॥३॥ एकेष्वाहतास्यादहन
उपसमाधाय दीर्घदण्डेन स्रुवेण रथचक्रस्य खेन समधा
जुहोति ॥४॥ योजनीयां श्रुत्वा योजयेत् ॥५॥ यदि
चिन्जु त्वा नमो देववधेभ्य इत्यन्वाह ॥६॥ वैश्याय प्रदाना-
हारती हुई देख कर जप करे ॥२७॥ और भाङ्ग मौञ्जपाशों को इंगिड से
अलंकृत करके सम्पात वान् करके जिस ओर सेना आक्रमण करती
हो, उसी प्रदेश में डाले ॥२८॥ इसी प्रकार कच्चे पात्रों को डाले ॥२९॥
इङ्गिड से संप्रोक्षण कर शर तृणों को चाण्डालाग्नि से जलावे ॥३०॥
जलाने पर धूम जिस सेना को ढाक लेवे उसकी हार समझो ॥३१॥
यह चौदहवी कण्डिका समाप्त हुई ॥५॥१४॥
“ऋधद्धान्त्रस्तदिदाम०” इत्यादि मंत्र से तीन बार धरे हुए अश्वत्थ
की पात्री हाथी के पीठ पर या पुरुष के शिर पर धर कर उसमें शत्रुओं
के प्रति हवन करता हुआ धावा करे और पैदल चलने वाले पुरुष के
शिर पर पात्री को धर कर उसमें भी आहुतियाँ करता जावे ॥१॥ यह
जय कर्म है॥ सूकर द्वारा निकाली हुई मिट्टी से राजा लोग यज्ञ वेदि
बनावें और उस में प्रदानान्त मंत्रों को पढ़ कर हवन करें ॥३॥ संग्राम
में एक बाण से मरे हुए को दहन करने पर्य्यन्त इध्मों का आधान कर
ने पर चक्र को रख कर बड़े दण्डे वाले स्रुव से रथ चक्र के छिद्र द्वारा
पास ही आहुति देवे ॥४॥ और शत्रु सैन्य की तय्यारी देख कर अपनी
सेना को धावा बोल देवे ॥५॥ पर सैन्य को लक्ष्य कर यदि “चिनुत्वा
नमो देव वधेभ्यः” इस को प्रति दिन जप करें ॥६॥ वैश्य राजा प्रदानान्त

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३१
न्तानि ॥७॥ त्वया वयमित्यायुधिग्रामण्ये ॥८॥ नि तह-
धिष इति राज्ञोदपात्रं द्वौ द्वाववेक्षयेत् ॥६॥ यन्न पश्येन्न
युध्येत ॥ १० ॥ नि तद्दधिषे वनस्पते ऽद्याविष्ठाग्न इन्द्रो
दिशश्चतस्र इति नवं रथं राजानं ससारथिमास्थापयति
॥११॥ ब्रह्म जज्ञानमिति जोवितविज्ञानम् ॥१२॥ तिस्रः
स्नाव्रज्जूरङ्गारेष्ववधाय ॥१३॥ उत्कुचतीषु कल्याणम्
॥१४॥ साङ्ग्रामिकमेता व्यादिशति मध्ये मृत्युरितरे सेने
॥१५॥ पराजेष्यमाणान्मृत्युरतिवर्तते ज्येष्यन्तो मृत्युम्
॥१६॥ अग्रेषूत्कुचत्सु मुख्या हन्यन्ते मध्येषु मध्या
अन्तेष्ववरे ॥१७॥ एवमिषीकाः ॥१८॥६॥१५॥
तक करे ॥७॥ “त्वयावयं०” इत्यादि अस्त्र पर ग्राम में करें ॥८॥ अपनी
सेना का जय पराजय और पुरुषों के मारे जाने की शंका में इसका
विज्ञान यह है कि राजा अपने जलपात्र को अभिमंत्रण करके दो २
योद्धाओं को राजा देखे जिसको न देखे अर्थात् रहते हुए जो न दीख
पड़े उसको न लड़ने देवे ॥९॥१०॥” नितद्दधिषे०” इत्यादि मंत्र पढ़
कर नये रथ को तय्यार कर पुरोहित राजा को उस पर सवार करावे
॥११॥ रोगी पुरुप के अच्छा होने का ज्ञान होने की विधि-पुरोहित
“ब्रह्मजज्ञानं०” इत्यादि से जीवित ज्ञान के लिये कि यह रोगी जीवित
रहेगा या नहीं ? इस संशय में तत्त्व जानने की चिन्ताकरके चमड़े के
ताँत की तीन रज्जू को आग में डाल कर चिन्ता करे कि यह जीयेगा या
नहीं ? यदि अङ्गार में की ज्वाला ऊपर को उठे तो जानना यह रोगी
जीवेगा ॥१४॥ अब सांग्रामिक विधान को कहते हैं-तीन रज्जुओँ में से
एक अपनी सेना की रज्जू दूसरी मध्य में मृत्यु सूचक तीसरी रज्जू पर
सेना सूचक हो । इस प्रकार संकल्प करके आग में तीनों रज्जुओं को
डालकर जिसके ऊपर मृत्यु वाली रस्सी जावे उसकी सेना का जय होगा
॥१५॥१६॥ मृत्यु रज्जुके आगे सरपत की तीन इषिका अग्नि में डाले
यदि पहिली इषिका-जल कर ऊपर को उठे तो सेना के प्रधानों की मृत्यु
जानो, मध्यम इषिका फल-सेना के मध्यम पुरुषों की मृत्यु जानो

३२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
उच्चैर्घोष उपश्वासयेति सर्ववादित्राणि प्रक्षाल्य
तगरोशीरेण संधाव्य सम्पातवन्ति त्रिराहृत्य प्रयच्छति
॥१॥ विहृदयमित्युच्चैस्तरां हुत्वा स्रुवमुद्धर्तयन् ॥ २ ॥
सोमांशं हरिणचर्मण्युत्सीव्य क्षत्रियाय बध्नाति ॥३॥
परिवर्त्मानीन्द्रो जयातीति राजा त्रिः सेनां परियाति
॥४॥ उक्तः पूर्वस्य सोमांशूः ॥५॥ संदानं व आदानेनेति
पाशैरादानसंदानानि ॥ ६ ॥ मर्माणि त इति क्षत्रियं
संनाहयति ॥७॥ अभयानामप्ययः ॥८॥ इन्द्रो मन्थत्विति
॥६॥ पूतिरज्जुरिति पूतिरज्जुमवधाय ॥१०॥ अश्वत्थवध-
कयोरग्निं मन्थति ॥११॥ धूममिति धूममनुमन्त्रयते ॥१२ ।
और अन्तवाली इपिका फल-अपर पुरुषों की मृत्यु जानना ॥१७॥१८॥६
यह पन्द्रहवीं कण्डिका पूरी हुई ॥१५॥ “उच्चैर्घोष उप श्वासय०” इत्यादि
सब बाजाओं को प्रक्षालन करके तगर और वीर द्वारा संधापन कर
सम्पात वन्ति करके पुरोहित तीन बार लेकर दमयितृओं को देवे ॥१॥
विध्यम्०” इत्यादि मंत्र से ऊँचे स्वर से बोलकर आहुति देकर स्रुव ऊपर
को बर्तता हुआ होम करे ॥२॥ और सोमलत्ता को हरिण के चमड़े में
सीकर क्षत्रिय के लिये बांध देवे ॥३॥ परिवर्त्मानीन्द्रो जयति” से
राजा बैठी हुई सेना को “त्रिषप्तीय०” सूक्त से तीन बार परिक्रमा करे ॥
सोमलता के विषय में कहा गया सेना के आक्रमणों में केवल पचन का
ही आदेश किया जावे ॥६॥ मर्माणि त०” इत्यादि मंत्र से संनाह पहनावे
॥७॥ अब अभय कर्म को कहते हैं ॥ “स्वस्तिदा विशा ब्राह्मणेन
को प्रयुक्तासि न तना अवारिणुक कण्ठो अभयं मित्रावरुणावभयं द्यावा-
पृथिवी अस्मै ग्रामाय हत तर्ह्यपूषेमा आशा इन्द्रः सूत्रामा मैते पथा
स्वस्तिदा विशां पतिर्नमस्ते घोषिणीभ्य आ ते राष्ट्रमिदमुच्छ्रेयो यत इन्द्र
भयामह-”यह अभय गण है ॥८॥ ‘इन्द्रो मन्थ” से अग्नि मन्थन करे
और समिदाधान का प्रयोग करे ॥९॥ “पूति रज्जुः०” से पुरानी रज्जु
को अग्नि रखने की जगह लावे ॥१०॥ अश्वत्थ और वधक काष्ठों से
मन्थन कर अग्नि उत्पन्न करे ॥११॥ “धूमम्०” इत्यादि से धूम का अनु-

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३३
अग्निमित्यग्निम् ॥१३॥ तस्मिन्नरण्ये सपत्नक्षयणी-
रादधात्यश्वत्थबधकत्वाद्वङ्गाह्वखदिरशराणाम् ॥ १४॥
उक्ताः पाशाः॥१५॥आश्वत्थानि कूटानि भाङ्गानि जालानि
॥ १६ ॥ बाधकदण्डानि ॥ १७॥ स्वाहैभ्य इति मित्रेभ्यो
जुहोति ॥१८॥ दुराहामीभ्य इति सव्येनेङ्गडममित्रेभ्यो
बाधके ॥ १९ ॥ उत्तरतोऽग्नेर्लोहिताश्वत्थस्य शाखां
निहृत्य नीललोहिताभ्यां सूत्राभ्यां परितत्य नीललो-
हितेनामूनिति दक्षिणा प्रहापयति ॥ २० ॥ ये बाहव
उत्तिष्ठतेति·यथालिङ्गं सम्प्रेष्यति ॥२१॥ होमार्थे पृषदा-
ज्यम् ॥२२॥ प्रदानान्तानि वाप्यानि ॥२३॥ वाप्यैस्त्रिष-
न्धीनि वज्ररूपाण्यर्बुदरूपाणि ॥२४॥ शितिपदीं सम्पा-
मंत्रण करे ॥ १२ ॥ “अग्नि” इस आधी ऋचा से उत्पन्नाग्नि का
अनुमंत्रण करे ॥१३॥ इसी अग्नि में सेना कर्म करे । यह कर्म वन में होगा
न कि सेना में ॥ शत्रुक्षयणी कहे इध्मों का अर्थात् अश्वत्थ, वधक, एरण्ड,
पलाश, खदिर और शर इनका आधान करे ॥१४॥ इस कर्म में सूत्रोक्त
पाश काम में लाये जाय जो भाङ्ग एवं मौज का प्रयोग करे ॥१५॥ स्वाभा-
विक गर्त्त को कूट कहते हैं । सेनाकार्य्य में पीपल का कूट बनावे और
जानवरों को बांधने के लिये जाल होती है इसको भाङ्ग का बनावे॥१६॥
और बाधक वृक्ष का दण्ड करे ॥१७॥ स्वाहैभ्यः इत्यादि और “अमित्रेभ्यो”
से आहुति करे ॥१८॥ “दुराहामीभ्य०” को पढ़कर वधक के काठ से
प्रज्वलित अग्नि में वाम हाथ से इङ्गिड को और शत्रु के लिये बाधक
अग्नि में आहुति देवे ॥१९॥ अग्नि के उत्तर भाग में लाल अश्वत्थ की
शाखा को काटकर नीले एवं लाल रंग के सूतों से लपेट करके “नील
लोहितेनामून्”० इत्यादि से दक्षिण द्वार होकर छोड़ देवे ॥२०॥ “ये
बाहव उत्तिष्ठत”० इत्यादि इस अनुवाक को शुद्ध समय में कर्ता जप
करे ॥ और संकेतानुसार संप्रेषण करे ॥२१॥ होम के लिये पृषदाज्य
(दही का छिटा दिया घृत) लेवे ॥२२॥ सब स्थानों में—पाश में
अश्वत्थ के कूट में, भाङ्ग के जालों में, बाधक दण्डों में, वज्र रूप पात्रों
में और इङ्गिड के अलङ्करण में क्रुद्धानुमंत्रण करे ॥२३॥२४॥ शितिपदी
५

३४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
तवर्तीं दर्भरज्ज्वा क्षत्रियायोपासङ्गदण्डे बध्नाति ॥२५॥
द्वितीयामस्यति ॥२६॥ अस्मिन् वस्विति राष्ट्रावगमनम्
॥२७॥ आनुशूकानां व्रीहीणामात्रस्कजैः काम्पलैः शृतं
सारूपवत्समाशयति ॥२८॥ अभीवर्त्तेनेतिरथनेमिमणि-
मयः सीसलोहरजतताम्रवेष्टितं हेमनाभिं वासितं बद्ध्वा
सूत्रोतं बर्हिषि कृत्वा सम्पातवन्तं प्रत्यूचं भृष्टीरभीव-
र्त्तोत्तमाभ्यामाच्योतति ॥२९॥ अचिक्रदद्धा त्वा गन्निति
यस्माद्राष्ट्रादवरुद्धस्तस्याशायां शयनविधं पुरोडाशं
दर्भेषूदके निनयति ॥३०॥ ततो लोष्टेन ज्योतिरा-
यतनं संस्तीर्य क्षीरौदनमश्नाति ॥३१॥ यतो लोष्टस्ततः
संभाराः ॥ ३२ ॥ तिसृणां प्रातरशिते पुरोडाशे व्यह्यन्ते
को पृषदाज्य से सम्पात करके दर्भरज्जु से क्षत्रिय के विश्रामार्थ उर्ध्वज
दण्ड में बांध देवे ॥२५॥ और दूसरी शितिपदी को शत्रु सेना में फेंक देवे
॥२६॥ “अस्मिन्वसु”० से अपने राष्ट्र में प्रवेश करे ॥ जो शत्रु द्वारा
अपने राष्ट्र से निकाला जाकर पुनः अपने राष्ट्र में जाता है उसके लिये
यह प्रवेश विधि है ॥२७॥ आनुशूक ( पहिले बार के काटे जाने पर
फिर उत्पन्न हो ) धान्य ( यव आदि ) के कटने पर श्रपण काठ और
गुण्डारोचन लता से समान रूप रंग के बच्चा वाली गौ के दूध में पका
कर राजा को खिलावे ॥२८॥ रथचक्र के बाहर पुष्टि के अवयव को
मणि के आकार का बनाकर सीसा, लोहा, चान्दी, तामा, इनसे वेष्टित
कर नाभिमणिद्वार को सुवर्ण मणिद्वार बनाकर कस्तूरी से त्रयोदशी
आदि तिथि में बान्ध देवे और सूत से पोहकर कुश पर धरकर “अभी-
वर्त्तोत्तमामुदसोसपत्नक्षयणः” इत्यादि दो ऋचाओं से प्रत्येक ऋचा से
दूध का धार मणि से देवे ॥२९॥ जिस देश से शत्रु राजा द्वारा निकाला
गया हो उस राष्ट्र की ओर के क्षेत्र से व्रीहि, जल, दर्भ आदि लेकर
निवास देश में शयन स्थान में विधि पुरोडाश को करके-कुशों को
बिछाकर मंत्र के अन्त में जल के साथ लावे ॥३०॥ परराष्ट्र की दिशा
से मट्टी का ढेला लेकर चूर्णित करे एवं उसको अग्नि स्थान के उत्तर
भाग में विकिर देवे । जहाँ से मट्टी का ढेला लेवे वहीं से अन्य साधनों

॥३३॥७॥१६॥ भूतो भूतेष्विति राजानमभिषेक्ष्यन्महानदे
शान्त्युदकं करोत्यादिष्टानाम् ॥१॥ स्थालीपाकं श्रपयित्वा
दक्षिणतः परिगृह्याया दर्भेषु तिष्ठन्तमभिषिञ्चति ॥२॥
तल्पार्षभं चर्मारोहयति ॥३॥ उदपात्रं समासिञ्चेते ॥४॥
विपरिधाने ॥५॥ सहैव नौ सुकृतं सह दुष्कृतमिति ब्रह्मा
ब्रूयात् ॥६॥ यो दुष्कृतं करवत्तस्य दुष्कृतं सुकृतं नौ
सहेति ॥७॥ आशयति ॥८॥ अश्वमारोह्यापराजितां प्रति-
पादयति ॥९॥ सहस्रं ग्रामवरो दक्षिणा ॥१०॥ विपरिधा-
नान्तमेकराजेन व्याख्यातम् ॥११॥ तल्पे दर्भेष्वभिषि-
ञ्चति ॥१२॥ वर्षीयसि वैयाघ्रं चर्मारोहयति ॥१३॥ ऋत्वा-
को भी ग्रहण करे ॥३२ ॥ राष्ट्र के तीन जनों के प्रातःकाल भोजन कर
लेने पर पुरोडाश से हवन करे ॥३३॥७॥१६॥ यह सोलहवीं कण्डिका
समाप्त हुई ॥१६॥
अब लघुअभिषेक विधि को कहेंगे ॥ माण्डलिक, सामन्त, युवराज,
सेनापति, या अन्य किसी का अभिषेक कर्म जानना । राजा आदि अभि-
षेक करने की इच्छा वाला महानदी गंगा, यमुना आदि के जल से
पुरोहित मंत्रोक्त जल से तय्यार करे ॥१॥ स्थालीपाक को पकाकर
अग्नि के दक्षिण भाग में बिछाये हुए कुशों पर बैठे राजा आदि को
पुरोहित यथाविधि “भूतोभूतेषु”० इत्यादि अभिषेक गण मंत्रों से
अभिषेक करे ॥२॥ पलङ्ग पर लाल बैल के चर्म को बिछा कर उसपर
राजा को पुरोहित आरोहण करावे ॥ जलपात्र को जल से सिञ्चन करे
॥४॥ पुरोहित राजा के बदले “सह नौ सुकृतं सह दुष्कृतम्” ऐसा ब्रह्मा
कहे ॥६॥ राजा उत्तर देवे । “यो दुष्कृतं करवत्तस्य दुष्कृतं सुकृतं नौ
सह” ॥७॥ स्थाली पाक को भक्षण करे ॥८॥ राजा घोड़ा पर चढ़कर
पश्चिम दिशा की ओर जावे ॥९॥ सहस्र गौ दक्षिणा में पुरोहित को
देवे ॥१०॥ सार्वभौम राजा का अभिषेक, माण्डलिक राजा के अभिषेक
की अपेक्षा भिन्न है ऐसा कहा गया जानना ॥११॥ मंचान पर, कुशों
पर, बैठे हुओं को अभिषिंचन करे इसका विकार फिर कुशोंपर का
कहना तल्प के सम्बन्धार्थ जानना ॥१२॥ अधिक उमर वाले व्याघ्र के

३६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

रो राजपुत्रास्ताल्पाः पृथक् पादेषु शयनं परामृश्य सभां
प्रापयन्ति ॥१४॥ दासः पादौ प्रक्षालयति ॥१५॥ महा-
शूद्र उपसिञ्चति ॥१६॥ कृतसम्पन्नानक्षानातृतीयं विचि-
नोति ॥१७॥ वैश्यः सर्वस्वजैनमुपतिष्ठत उत्सृजायुष्म-
न्निति ॥१८॥ उत्सृजामि ब्राह्मणायोत्सृजामि क्षत्रियायो-
त्सृजामि वैश्याय धर्मो मे जनपदे चर्यतामिति ॥१९॥
प्रतिपद्यते ॥२०॥ आशयति ॥२१॥ अश्वमारोह्यापराजि-
तां प्रतिपादयति ॥२२॥ सभामुदायाति ॥२३॥ मधुमिश्रं
ब्राह्मणान् भोजयति ॥२४॥ रसानाशयति ॥२५॥ महि-
षाण्युपयाति ॥२६॥ कुर्युर्गामिति गार्ग्यपार्थश्रवसौ नेति
भागलिः ॥२७॥ इममिन्द्र वर्धय क्षत्रियं म इति क्षत्रियं
प्रातः प्रातरभिमन्त्रयते ॥२८॥ उक्तं समासेचनं विपरि-
धानम् ॥२९॥ सविता प्रसवानामिति पौरोहित्ये वत्स्य-
चर्म पर आरोहण करावे ॥१३॥ और राजपुत्र राजा के शयन-शय्या के
पैर की ओर जब तक राजा को नींद न आवे तब तक शयन सम्बन्धि
बातें करे और सभा को पहुँचावे ॥१४॥ शूद्रदास राजा के पैरों को
प्रक्षालन करे ॥१५॥ महाशूद्र प्रक्षालन करते समय जल ढारा करे
॥१६॥ पुष्टिद्यूत के लिये बहेरा के फलों को चूने और द्यूत के लिये अक्षों
को तय्यार कर तीसरे पाशा को चुन लेवे यों राजा द्यूत खेले ॥१७॥
“उत्सृज आयुष्मन्”० ऐसा कहकर वैश्य राजा के पास बैठे ॥१८॥ “उत्सृ-
जामि”० इत्यादि मंत्र राजा पढ़े और वैश्य, राजा के निकट पहुँचे
॥१९॥२०॥ सब वर्णों से आज्ञा पाकर वैश्य सब पटरानियों के घरों में
जावे और राजा को घोड़े पर चढ़ाकर पश्चिम दिशा में पहुँचा कर
सभा में राजा को लेकर आवे ॥२३॥ और मधु मिला अन्न ब्राह्मणों को
भोजन करावे । रसों को भोजन करावे ॥२५॥ और सब महिषियों के
घरों में राजा जावे ॥२६॥ “कुर्युर्गाम्”–ऐसा गार्ग्य पार्थश्रवस ये दो
आचार्य मानते हैं और भागलि नहीं मानते हैं ॥२७॥ 'इममिन्द्र वर्धय
क्षत्रियम्'० प्रति दिन प्रातः समय पुरोहित अभिमंत्रणा किया करे

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३७
न्वैश्वलोपीः समिध आधाय ॥३०॥ इन्द्र क्षत्रमिति
क्षत्रियमुपनयीत ॥३१॥ तदाहुर्न क्षत्रियं सावित्रीं वाच-
येदिति ॥३२॥ कथं नु तमुपनयीत यन्न वाचयेत् ॥३३॥
वाचयेदेव वाचयेदेव ॥३४॥८॥१७॥ इत्यथर्ववेदे कौशिक-
सूत्रे द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥२॥
पूर्वस्य पूर्वस्यां पौर्णमास्यामस्तमित उदकान्ते कृष्ण-
चेलपरिहितो निर्ऋतिकर्माणि प्रयुङ्क्ते ॥१॥ नाव्याया
दक्षिणावर्ते शापेटं निखनेत् ॥२॥ अपां सूक्तैरवसि-
ञ्चति ॥३॥ अप्सु कृष्णं जहाति ॥४॥ अहतवसन उपमु-
च्योपानहौ जीवघात्याया उदाव्रजति ॥५॥ प्रोष्य तामुत्त-
रस्र्यां साम्पदं कुरुते ॥६॥ शापेटमालिप्याप्सु निबध्य
तस्मिन्नुपसमाधाय संपातवन्तं करोति ॥७॥ अश्नाति
॥२८॥ जलका आसेचन विपरियान करके कहा गया है ॥२९॥ “सविता
प्रसवाना”० इत्यादि मंत्र से अमावस्या को पुरोहित उपवास रहकर
समिदाधान करे ॥३०॥ “इन्द्रक्षत्रम्”० से क्षत्रिय का उपनयन करे
॥३१॥ सो कहा है कि क्षत्रिय से सावित्री मंत्र न बचवावे ॥३२॥ तो
कैसे उसका उपनयन किया जावे ? (जब सावित्री न बचवायी जावे)
॥३३॥ बचवावे ही बचवावे ही ॥३४॥ ८॥१७॥ यह सतरहवीं कण्डिका
पूरी हुई ॥१७॥ और अथर्ववेद के कौशिकसूत्र के दूसरे अध्याय का
भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥
“पूर्वं त्रिषप्तीयम्”० सूक्त के अनुसार पहिली पौर्णमासी को सूर्यास्त
समय जल के पास जाकर काला वस्त्र पहन कर निर्ऋति कर्मों (दरिता
दूर करने के लिये) को करने में प्रयुक्त होवे ॥१॥ नाव के दक्षिण भाग
में शापेट को खने और अप सूक्तों से जल से सिंचन करे ॥२॥३॥
और जो काला वस्त्र पहिना है उसको जल में छोड़ देवे ॥४॥ और
अखण्ड नये वस्त्र और जीवित पशु को मारकर जो चर्म लिया गया हो
उससे बने जूते को छोड़ पीछे लौट कर देखता हुआ घर को आवे ॥५॥
उस रात्रि में वहाँ रहकर दूसरी रात्रि में ब्रह्मचारि साम्पद् करे ॥६॥

३८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
॥८॥ आधाय कृष्णं प्रवाहयति ॥९॥ उपमुच्य जरदुपान-
हौ सव्येन जरच्छत्रं दक्षिणेन शालातृणान्यादीप्य
जीर्णं वीरिणमभिन्यस्यति ॥१०॥ अनावृतमावृत्य सकृ-
ज्जुहोति ॥११॥ सव्यं प्रहरत्युपानहौ च ॥१२॥ जीर्णे
वीरिण उपसमाधायायं ते योनिरिति जरत्कोष्ठाद्व्रीहि-
च्छर्करामिश्रानावपति ॥१३॥ आ नो भरेति धानाः
॥१४॥ युक्ताभ्यां सह कोष्ठाभ्यां तृतीयाम् ॥१५॥ कृष्ण-
शकुनेः सव्यजंघायामङ्कमनुबध्याङ्के पुरोडाशं प्रपतेत इत्य-
नावृतं प्रपादयति ॥१६॥ नीलं सन्धाय लोहितमाच्छाद्य
शुक्लं परिणह्य द्वितीयोष्णीषमङ्केनोपसाद्य सव्येन
सहाङ्केनावाडप्सुप्रविध्यति

हरितबर्हिषमश्नाति ॥२०॥ अन्वक्ताः प्रादेशमात्रीराद-
धाति ॥२१॥ नाव्ययोः सांवेद्ये पश्चादग्नेर्भूमिपरिलेखे
कीलालं मुखेनाश्नाति ॥२२। तेजोव्रतं त्रिरात्रमश्नाति
॥२३॥ तद्दक्षः ॥२४॥ शम्भुमयोभुभ्यां ब्रह्मजज्ञानमस्य
वामस्य यो रोहित उदस्य केतवो मूर्द्धां विषासहिमिति
सलिलैः क्षीरौदनमश्नाति ॥२५॥ मन्थान्तानि ॥२६॥
द्वितीयेन प्रवत्स्यन् हविषामुपदधीत ॥२७॥ अथ प्रत्येत्य
॥२८॥ अथ प्रत्येत्य ॥२९॥ अथ प्रार्थयमाणः ॥३०॥
अथ प्रार्थयमाणः ॥३१॥ चत्वारो धायाः पलाशय-
वस्त्र को लोहदण्ड के साथ जल में डाल देवे ॥ “एता एना०” इस ऋचा
से नील वस्त्र को लोह खण्ड के साथ जल में फेंककर घर को आवे ॥
तब पौष्टिक और सम्पादन कर्मों को करे ॥ निर्ऋति कर्म समाप्त हुआ ॥
“त्रिषप्रीयं०” इत्यादि सूक्त से पौष्टिकादि कर्मों को चैत्र की पौर्णमासी
को या चित्रा नक्षत्र में करे ॥१९॥ पक्षि के घोंसले को जलाकर पक्व
स्थालीपाक को गर्म करके हरे कुश के साथ खावे ॥२०॥ प्रादेश बरा-
बर समिधाओं को जल में भिंगो कर आधान करे ॥२१॥ जिन दो
नदियों में नौकायें आती जाती हों, उनके संगम पर अग्नि धर कर
उसके पश्चिम भाग में भूमि पर रेखा करके परशु की भाँति मुख करके
खावे हाथ से नही ॥२२॥ और तीन रात तक नित्य घी खावे ॥२३॥
उसको खाने वाला ‘शम्भुमयोभुभ्यां०” इत्यादि सलिल गण के मंत्रों से
.क्षीरौदन खावे ॥२५॥ मन्थान्त कर्मों को “त्रिः ज्योतिः कुरुते०” से
करे ॥२६॥ “ब्रह्मजज्ञानमवाप्ता”० इत्यादि से राह चलता मन्थान्त कर्मों
को उपवास रहता हुआ हविष द्वारा आहुति करता हुआ करे ॥२७॥ जब
मार्ग में जावे तब यह कर्म करे। जब गाँव जावे तब यह कर्म करे ॥
यह प्रस्थान-कर्म समाप्त हुआ ॥२८॥२९॥ यथार्थ याचना करने वाला
द्रव्य की कामना से यह कर्म करे॥ या निष्काम भी यह कर्म करे ॥३०॥
॥३१॥ अब समुद्र कर्म (सर्व फल कर्म) को कहेंगे ॥ अभ्यातानान्त
कर्म करके चार फूलका पलाश की समिधाओं का, चार कुशों का फूल का
बारी २ से (एक समिद्धारक, दूसरी उस पर दर्भ भारक) फिर उसी

४० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
ष्टीनां भवन्ति ॥३२॥ दर्भाणामुपोलवानां चत्वारः ॥३३॥
तं व्यतिषक्तमष्टावरमिध्मं सात्रिकेऽग्नावाधायाज्येना-
भिजुहुयात् ॥३४॥ धूमं नियच्छेत् ॥३५॥ लेपं प्राश्नीयात्
॥३६॥ तमु चेन्न विन्देदथ सत्रस्यायतने यज्ञायतनमिव
कृत्वा ॥३७॥ समुद्र इत्याचक्षते कर्म ॥३८॥१॥१८॥
अम्बयो यन्ति शम्भुमयोभुभ्यां ब्रह्म जज्ञानमा
गाव एका च म इति गा लवणं पाययत्युपतापिनीः ॥१॥
प्रजननकामाः ॥२॥ प्रपामवरुणद्धि ॥३॥ सं सं स्रव-
न्त्विति नाड्याभ्यामुदकमाहरतः सर्वत उपासेचम् ॥४॥
तस्मिन् मैश्रधान्यं श्रुतमश्नाति ॥५॥ मन्थं वा दधिमधु-
प्रकार आठ ऊपर करके "ब्रह्मजज्ञानेन सहस्रधारेण" मंत्र से आज्य की
आहुति देवे ॥३२॥३३॥३४॥ आज्य होम के अनन्तर तांत्रिकाग्नि का धूम
भक्षण करे ॥३५॥ पलाश के डांड में से अग्नि के संयोग से "सिलि
सिलिनः" इस मंत्र को पढ़कर प्राशन करे ॥३६॥ सात्रिक अग्नि का
प्रणयन या यज्ञ स्थान में यह कार्य करे । इस कर्म का फल धन, धान्य,
लक्ष्मी, पुत्र, यश, मेधा, धर्म, आयु, बल, प्रजा, सम्पत्, ग्राम,
कूपादि की प्राप्ति होती है । इसलिये इस कर्म का नाम समुद्रकर्म है
॥३७॥३८॥१॥१८॥ यह अठारहवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥१८॥
“अम्बयो यन्ति, शम्भुमयोभुभ्यां ब्रह्मजज्ञानमागावएकाचमे” ०
इत्यादि मंत्रों से गौओं को लवण पान करावे-इससे सारे रोग छूट
कर गौयें हृष्ट पुष्ट हो जाती हैं-परन्तु स्मरण रहे कि लवण देने पर
थोड़ा जल भी पीने को न देवे ॥१॥ गौओं को हृष्ट पुष्ट अच्छे बच्चे
नीरोग हों ऐसी कामनावाले गौ को लवण तो खवावे परन्तु उसे थोड़ा
जल भी पीने को न देवें ॥ गौओं को बहुत दूध होवे, रोग रहित रहें,
ज्वर, गण्डमालादि रोगों में और गर्भ रहने के लिये यह कर्म होता है ॥
॥२॥ तड़ाग को रोक कर तब गौओं को जल पिलावे ॥३॥ सब ही प्रयो-
जन के लिये पुष्टि कर्मों को कहते हैं । दो नदियों के जल को लाकर
उससे सब ओर उपसेचन करे ॥ ४ ॥ उस जल से दूध में मैश्रधान्य को
पकाकर खावे ॥ ५॥ या मन्थ ( दधि मधु मिला ) खावे ॥ ६ ॥

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ४१
मिश्रम् ॥ ६ ॥ यस्य श्रियं कामयते ततो व्रीह्याज्यपय
आहार्य क्षीरौदनमश्नाति ॥ ७ ॥ तदलाभे हरितगो-
मयमाहार्य शोषयित्वा त्रिवृति गोमयपरिचये शृतम-
श्नाति ॥ ८ ॥ शेरभकेति सामुद्रमप्सु कर्म व्याख्यातम्
॥ ९ ॥ अनपहृतधाना लोहिताजाया द्रप्सेन संनीया-
श्नाति ॥१०॥ एतावदुपैति ॥११॥ तृणानां ग्रन्थीनुद्ग-
थ्नन्नपक्रामति ॥१२॥ तानुदाव्रजन्नुदपात्रस्योदपात्रेणा-
भिप्लावयति मुखं विमार्ष्टि ॥१३॥ एह यन्तु पशवः सं
वो गोष्ठेन प्रजावतीः प्रजापतिरिति गोष्ठकर्माणि ॥१४॥
गृष्टेः पीयूषं श्लेष्ममिश्रमश्नाति ॥१५॥ गां ददाति ॥१६॥
उदपात्रं निनयति ॥१७॥ समुह्य सव्येनाधिष्ठायार्धं दक्षि-
जिस धनी के धन को हरण करना चाहे उसके घर से व्रीहि, आज्य,
दूध किसी प्रकार लावे और उसमें क्षीरौदन पकाकर खावे ॥ ७ ॥ यदि
ऐसा न कर सके तो, गीला गोबर लाकर सुखा लेवें और उसको एकत्र
कर उसे पकाकर खावे ॥८॥ यह पुष्टि कर्म समुद्र जल में किया जाता है।
शापैटक को लीपकर जल में निविध कर उस पर अग्नि का प्रणयन कर
“शेरभक०” इत्यादि सूक्त से भात को सम्पातन और अभिमंत्रण कर
खावे ॥ ९ ॥ बिन टुकड़े किये हुए जौओं को लावा भून कर उसको लाल
बकरी के दूध के मट्ठे के साथ मिलाकर खावे ॥ १० ॥ समुद्र जल से
इस कर्म को-इस परिमाण से करे ॥११॥ तृणों को एकत्र कर उनमें गांठे
देकर उन पर वधू को चलावे ॥१२॥ उन गांठे हुए तृणों को लेकर जल
में जाकर जलपात्र को जल में प्रवाहित करे और अपने मुख को जल
से मार्जन करे ॥ १३ ॥ “एह यन्तु०” इत्यादि मंत्रों से वक्ष्यमाण गोष्ठ
कर्मों को करे ॥१४॥ दूसरी बार ब्याई हुई गौ के पहिले दिन के दूध का
नाम पीयूष है॥ इस पीयूष को गौके मुँह के लार को मिलाकर खावे
॥१५॥ ब्राह्मण को गौ देवे ॥१६॥ जलपात्र को अभिमंत्रण कर उसको
गोशाला में लावे ॥१७॥ गौ गृह के भीतर—स्थान को पञ्च भूसंस्कार
करके गोशाला में धूलि को ढेर किये हुए के आधे भाग को दक्षिण
६

४२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
णेन विक्षिपति ॥१८॥ सारूपवत्से शकृत्पिण्डान् गुग्गु-
ललवणे प्रतिनीय पश्चादग्नेर्निखनति ॥१९॥ तिसृणां
प्रातरश्नाति ॥२०॥ विकृते संपन्नम् ॥२१॥ आयमगन्नयं
प्रतिसरोऽयं मे वरणोऽरातीयोरिति मन्त्रोक्तान् वासि-
तान् बध्नाति ॥२२॥ उत्तमस्य चतुरो जातरूपशकलेनानु-
सूत्रं गमयित्वावभुज्य त्रैधं पर्यस्यति ॥२३॥ एतमिध्ममि-
त्युपसमाधाय ॥२४॥ तमिमं देवता इति वासितमुल्लुप्य
ब्रह्मणा तेजसेति बध्नाति ॥२५॥ उत्तमो असीति मंत्रोक्तम्
दिशा में फेक देवे ॥१८॥ सारूपवत्सवाली गौ के गोबर-पिण्डों को,
गुग्गुल लवण में लाकर अग्नि के पश्चिम भाग में गाड़ देवे ॥१९॥ तीन
रात बीत जाने पर प्रातःकाल उसे उखाड़ कर खावे ॥२०॥ और भूमि
में गाड़े हुए पीयूष को निकालने पर वह तय्यार हुआ कि नहीं इसकी
परीक्षा-उसका गन्ध, स्वाद, और रूप की देखभाल चखकर जानना ।
क्योंकि विकार रहित होने ही से यह ठीक हुआ समझना चाहिये ॥२१॥
“आयमग्न०” इत्यादि मंत्र से मणि द्रव्यों को मंत्रों से अभिमंत्रण कर
वासित करके त्रयोदशी आदि नियमों से वासित मणियों को “पुष्टिफ-
लत्वं मह्यं ददतु पुष्टये ।” “अयमागन्न०” से पलाशमणि, आदि वृक्षोंके
“अयं प्रतिसर ।” “अयं मे वरण” से वरण, आडे खादिर, चिबुका ( मुचु-
कुन्दवृक्ष ) ॥ उक्त मणि के सोने की ४ माला लाइ के साथ गांधने के
योग्य करके टेढा करके एक २ माला को तीन २ बार लपेट कर बगल
में सब तरफ लोहे के मोटे पत्तर से एक सौ दक्षिण सुवर्ण सूत्र करे ॥
॥ तात्पर्य यह है कि यह प्रकरण सब कामनाओं की सिद्धि हेतु सर्व-
काममणि शान्ति कहाता है ॥ पलाश मणि को तीन बार वासित करके
डालकर अभिमंत्रण कर त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या इन तीन
तिथियों में दही, मधु में वासना देकर मणि को धारण करे ॥ २२ ॥
॥ २३ ॥, “एतमिध्मम्०” से उपसमाधान करके “तमिमं देवता०”
से मणि को छेदकर “ब्रह्मणा तेजसा०” से अपने उत्तमाङ्ग में बान्धे
॥ २४ ॥ ॥ २५ ॥ “उत्तमो अस्योषधीनां तव वृक्षा०” से जिस द्रव्य का⁻