कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
१८८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
ति मूर्ध्नोः संपातानानयति ॥११॥ उदपात्र उत्तरान्
॥१२॥ शुम्भन्द्याञ्जल्योर्निंनयति ॥१३॥ तेन भूतेनेति
समशनम् ॥१४॥ रसानाशयति स्थालीपाकं च ॥१५॥
यवानामाज्यमिश्राणां पूर्णाञ्जलिं जुहोति ॥१६॥४॥७८॥
सप्त मर्यादा इति तिसृणां प्रातरावपते ॥१॥ अक्ष्यौ
नाविति समाञ्जाते ॥२॥ महीम् ष्विति तल्पमालम्भ-
यति ॥३॥ आरोह तल्पमित्यारोहयति ॥४॥ तत्रोप-
विश्येत्युपवेशयति ॥५॥ देवा अग्रे इति संवेशयति ॥६॥
अभित्वेत्यभिच्छादयति ॥७॥ सं पितराविति समावेश-
यति ॥८॥ इहेमाविति त्रिः सन्नुदति ॥६॥ मधुघमणिमौ-
क्षेडपनीयेयं वीरुदमोऽहमिति संस्पृशतः ॥१०॥ ब्रह्म-
प्रसवानां०” इत्यादि से दोनों के शिरों पर आहुतियों का ढार देवे
॥१०॥११॥ “तेन भूतेन०” से रसों और स्थाली पाक का दोनों को
भोजन करावे ॥१२॥१३॥१४॥१५॥ और आठ ऋ० वाले कल्पजसूक्त,
एवं “आगच्छत०” इत्यादि ३ ऋ० वाले सूक्त और “सविता प्रसवानां०”
सूक्त–इन सूक्तों से यव मिले आज्य की अञ्जुलियों से वर वधू हवन करें
और सम्पातों को वर वधू के शिर पर डालते जावें ॥१६॥४॥७८॥ यह
अठहत्तरवी कण्डिका पूरी हुई ।
“सप्त मर्यादा०” इत्यादि ऋ० से प्रातःकाल आहुति करें । “अक्ष्यौ
नौ०” से दोनों परस्पर एक दूसरे को कज्जल से नेत्रों में अञ्जन करें
॥१॥२॥ और “महीमूषु०” से शय्या को स्पर्श करें । “आरोह तल्प०”
कहने पर शय्यापर चढ़ावें “तत्रोपविशेत्” कहने पर–उन्हें बिठलावे
और “देवा अग्रे०” पढ़कर दोनों को शय्या पर संवेशन करावे ॥६॥
“अभित्वामनुजातेन०” से दोनों को वस्त्र ओढ़ा देवे ॥७॥ “संपितरौ०”
इत्यादि ४ ऋचाओं से दोनों को एक दूसरे के मुख सम्मुख करे ॥८॥
“इहेमौ०” से एक दूसरे के कण्ठ को ग्रहण करे ॥६॥ मधुघ-मणि को
सुगन्ध में डालकर पीसकर उबटन बनाकर “इयं वीरुत्०” इस सूक्त से
दोनों को उबटन लगावे ॥ “अमोऽहं०” इस दो ऋचा से अक्षत पढ़कर
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १८९
जज्ञानमित्यङ्गुष्ठेन व्यचस्करोति ॥११॥ स्योनाद्योनेरित्यु-
त्थापयति॥१२॥परिधापनीयाभ्यामहतेनाच्छादयति॥१३॥
बृहस्पतिरिति शष्पेणाभिघार्य व्रीहियवाभ्यामभिनि-
धाय दर्भपिञ्जूल्या सीमन्तं विवृतति ॥१४॥ शणशक-
लेन परिवेष्ट्य तिस्रो रात्रीः प्रति सुप्तास्ते ॥१५॥ अनु-
वाकाभ्यामन्वारब्धाभ्यामुपदधीत ॥१६॥ इहेदसाथेत्येत-
या शुल्कमपाकृत्य ॥१७॥ द्वाभ्यां निवर्तयतीह मम राध्य-
तामत्र तवेति ॥१८॥ यथा वा मन्यन्ते ॥१९॥ परा देही-
ति वाधूर्यं ददतमनुमन्त्रयते ॥२०॥ देवैर्दत्तमिति प्रति-
गृह्णाति ॥२१॥ अपास्मत्तम इति स्थाणावासजति ॥२२॥
एक दूसरे को कण्ठ ग्रहण करे और “ब्रह्म जज्ञानं०” से वर वधू के नाभि
प्रदेश को ( जननेन्द्रिय को ) स्पर्श करे ॥१०॥११॥ “स्योनाद्योनेः०” से
दोनों को उठावे ॥१२॥ “या अकृन्तन्नत्वष्टा वासो०” इत्यादि दो ऋ०
से दोनों के अखण्ड नये वस्त्रों को ओढ़ा देवे ॥ “बृहस्पति०” इत्यादि
मंत्र से शष्प द्वारा अभिधारण कर व्रीहि और यवों का दर्भ पिञ्जुलि
से वधू के मांग को ( सीमन्त ) केशों को शिर के बीचो बीच दोनों
ओर फाड़कर सज देवे ॥१३॥१४॥ शण के टुकड़े से वधू के जूड़े को
लपेट कर बान्ध देवे और तीन रात्रि दोनों साथ सोवें ॥१५॥ सब कर्म-
काण्डों में आज्य की आहुति होती है । परन्तु तन्त्र की विधि है “आज्य,
समिध, पुरोडाश, व्रीहि, यव, तिल आदि में से किसी एक से आहुति
देवे । अतएव आज्य आदि १३ हविष्य वस्तुओं में से-किसी एक की
“सत्येनोत्तभित०” इन दो अनुवाकों से आहुतियाँ देवे ॥१६॥ यदि चतुर्थी
कर्म के भीतर वधू रजस्वला हो जावे तो उसका प्रायश्चित करे ॥ “इहे-
दसाथ०” ऋचा से वर वधू को अलग २ दहेज देवे ॥१७॥ “द्वाभ्यां
निवर्तयतीह०” इत्यादि वर पढ़े ॥१८॥ या जैसा चाहें वैसा करें ॥१९॥
“परादेहि०” से बहू को पहनने को वस्त्र देते समय अनुमंत्रण करे ।
और “देवैर्दत्तं०” से वस्त्र को ग्रहण करे ॥२०॥२१॥ “अपास्मत्तम०”
से वस्त्र को वर वधू के शरीरों पर डाल देवे ॥२२॥ “यावतीः कृत्या०”
१९० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
यावतीः कृत्या इति व्रजेत् ॥२३॥ या मे प्रियतमेति
वृक्षं प्रतिच्छादयति ॥२४॥ शुम्भन्त्याप्लुत्य ॥२५॥ ये अन्ता
इत्याच्छादयति ॥२६॥ नवं वसान इत्याव्रजति ॥२७॥
पूर्वापरं यत्र नाधिगच्छेदब्रह्मापरमिति कुर्यात् ॥२८॥
गौर्दक्षिणा प्रतीवाहः ॥२९॥ जीवं रुदन्ति यदिमे केशिन
इति जुहोति ॥३०॥ एष सौर्यो विवाहः ॥३१॥ ब्रह्माप-
रमिति ब्राह्म्यः ॥३२॥ आवृत्तः प्राजापत्याः प्राजापत्याः
॥३३॥५॥७६॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे दशमोऽध्यायः
समाप्तः ॥१०॥
अथ पितृमेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥ दहननिधानदेशे-
परिवृक्षाणि निधानकाल इति ब्राह्मणोक्तम् ॥२॥ दुर्बली-
से वस्त्रों को लेकर चले ॥२३॥ “या मे प्रियतम०” से वस्त्र से वृक्ष को
ढाके, “नवं वसान०” पढ़कर आवै, यदि पुरोहित विवाह कर्म कराने
में पूर्वापर कर्म का अनुक्रम न जाने तो “ब्रह्मापरं०” इत्यादि ऋ० से
कर्म करावे और अभ्यातानादि उत्तर तंत्र, हस्तहोम, मंत्रों का विकल्प
और यदि पूर्वस्थण्डिल में अग्नि करे तो उत्तर तंत्र करना चाहिये और
“कामस्तदग्र०” इत्यादि काम सूक्त का जप करे ॥२४—२८॥ कर्त्ता
( पुरोहित ) को गौदक्षिणा देवे ॥२९॥ यदि वधू पिता घर पर रोवे तो
“जीवं रुदन्ति०” इत्यादि से आहुतियाँ देवे ॥३०॥ यह “सौर्यविवाह”
कहलाता है ॥३१॥ “ब्रह्मापरं०” इत्यादि से जो विवाह होता है वह
“ब्राह्म्य” विवाह कहलाता है ॥३२॥ विना मंत्र के जो विवाह होता
है वह प्राजापत्यविवाह होता है या शूद्र का विवाह है ॥३३॥५॥७६॥
इय उन्यासीवी कण्डिका समाप्त हुई ।
यह अथर्ववेद के कौशिक सूत्र का दशम अध्याय समाप्त हुआ ॥१०॥
अब अन्त्येष्टि कर्म्म को कहेंगे । वृक्ष रहित प्रदेश में दहन स्थान
बनावे—ऐसा ब्राह्मण ग्रन्थ में लिखा है ॥१॥२॥ जब पित आदि दुर्बल
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९१
भवन्तं शालातृणेषु दर्भानास्तीर्य स्योनास्मै भवेत्यवरोह-
यति ॥३॥ मन्त्रोक्तावनुमन्त्रयते ॥४॥ यत्ते कृष्ण इत्यव-
दीपयति ॥५॥ आहिताग्नौ प्रेते सम्भारान् सम्भरति ॥६॥
आज्यं च पृषदाज्यं चाजं च गां च ॥७॥ वसनं पञ्चमम्
॥८॥ हिरण्यं षष्ठम् ॥६॥ शरीरं नान्वालभते ॥१०॥
अन्यं चेष्टन्तमकुमन्त्रयते ॥११॥ शान्त्युदकं करोत्यसकलं
चातनानां चान्त्वावपते ॥१२॥ शान्त्युदकोदकेन केशश्म-
श्रुरोमनखानि संहारयन्ति ॥१३॥ आप्लावयन्ति ॥१४॥
अनुलिम्पन्ति ॥१५॥ स्रजोऽभिहरन्ति ॥१६॥ एवं स्नातम्-
लंकृतमहतेनावाग्दशेन वसनेन प्रच्छादयत्येतत्ते देव एत-
अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हो जावें या मरणापन्न हो जावें ( यह संस्कार
आहिताग्नि और एकाग्नि का है) तो अग्निशाला या आवसथ्यशाला में
शाला तृणों को बिछाकर उस पर दर्भ तृणों को डालकर “स्योनास्मै
भव०” इत्यादि से मृत वा मरणापन्न को उस बिछाये तृणों पर
अवरोहण करावे ॥३॥४॥ “यत्ते कृष्ण०” से दीप जला देवे ॥५॥ यदि
काक, पिपीलिका, सर्प, व्याघ्र, सींग वाले जन्तु, श्वापद, आदि जन्तुओं
के सींग, नख, दन्त आदि के काटने से मनुष्य का मृत्यु होवे, तो उसका
प्रायश्चित्त इस प्रकार होगा “यत्ते कृष्णः शकुनि०” इत्यादि ३ ऋचा से
अग्नि को अभिमंत्रित कर दंशित-व्रण को उससे जला देवे ॥६॥• आहि-
ताग्नि के मरने पर वक्ष्यमाण सामग्रियों को एकत्र कर रक्खे ॥६॥ शुद्ध
अग्नि, दर्भ, तिल, घृत, हिरण्य शकल, चन्दनकाठ, गोपीचन्दन, तुलसी,
पिष्ट, ताम्रपात्र, गोबर, कुदार, अखण्ड नयावस्त्र, सूत ॥७॥८॥९॥ सात
कुर्सी के भीतर के व्यक्तियों को अन्य लोग बिना शुद्ध हुए नहीं स्पर्श
करते हैं ॥१०॥ चेष्टा करते हुए अन्य व्यक्ति को अनुमंत्रण करे ॥११॥
कर्त्ता सकल प्रतीकत्रय से और ओषधित्रय से मातृ नाम प्रतीकत्रय को
शान्त्युदक में आवपन करे ॥१२॥ शान्ति जल से, शिरके केश, दाढ़ी,
मूँछ, लोम और नखों को कटवावे ॥१३॥ और प्रेत शरीर को जलाशय
में डुबाकर स्नान करावें ॥१४॥ श्मशान भूमि को लीपे और स्रज से
अग्नि को लावे ॥१४॥१५॥१६॥ इस भाँति नहवा धोलाकर के अखण्ड
१९२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
त्वा वासः प्रथमं न्वागन्निति ॥१७॥ अपेममित्यग्निषु
जुहोति ॥१८॥ उखाः कुर्वन्ति ॥१९॥ ताः शकृदाभ्यन्तरं
लिम्पन्ति शुष्केण वा पूरयन्ति ॥२०॥ ताः पृथगग्निभिः
संतापयन्त्या शकृदादीपनात् ॥२१॥ तेषां हरणानुपूर्व-
माहवनीयं प्रथमं ततो दक्षिणाग्निं ततो गार्हपत्यम् ॥
॥२२॥ अथ विदेशे प्रेतस्या रोहत जनित्रीं जातवेदस इति
पृथगरण्योश्वग्नीन्समारोपयन्ति ॥२३॥ तेषु यथोक्तं क-
रोति ॥२४॥ अपि वान्यवत्साया वा संधिनीक्षीरेणैक-
शालाकेन वा मन्थेनाग्निहोत्रं जुहोत्या दहनात् ॥२५॥
दर्शपूर्णमासयोः कृष्णकतण्डुलानां तस्या आज्येन नान्तं
न बहिः ॥२६॥ पलालानि बर्हिः ॥२७॥ तिल्पिञ्ज्या इध्माः
॥२८॥ ग्रहानाज्यभागौ पुरस्ताद्धोमसंस्थितहोमानुद्धृत्य
॥२९॥ प्राणापानावुरुद्ध्यै निधनाभिर्जुहुयात् ॥३०॥ अथो-
चीरे दार नये वस्त्र से “एतत्ते देव०” मंत्र से प्रेत को ढाक देवे ॥१७॥
“अपेमं०” मंत्र से अग्नि में आहुतियाँ देवे ॥१८॥ और “उखायें”
तय्यार करे ॥१९॥ उखाओं को गोबर से लीप देवे या सूखे गोबर से
उनको भर देवे ॥२०॥ उनमें एकही वार में अग्नि डाल कर सूखे गोबर
को जलावे ॥२१॥ उनका हरणानुक्रम से आहवनीय अग्नि को पहिले।
तब दक्षिणाग्नि को और अन्त में गार्हपत्याग्नि को ॥२२॥ यदि देशान्तर
में मृत्यु हो तो आहिताग्नि का कर्म इस भाँति करे। “प्रेतस्यारोहत०”
मंत्र से अरणी द्वारा अग्नि उत्पन्न कर उनमें यथोक्त प्रकार से कर्म करे
॥२३॥२४॥ अथवा अन्य वत्सा को गौ के पास धरकर जो दूध दूहा
जाता—ऐसी गौ के दूध से एक शला का द्वारा या मन्थ से अग्निहोत्र
की आहुति करे जब तक प्रेत का दाह होता रहे ॥२५॥ दर्शपूर्णमास
में काले चावलों की उक्त गौ के दूध से न अन्त में न बाहर आहुति करे
॥२६॥ पलालौ से बर्हि होम करे ॥२७॥ तिल के डांठ का इध्म करे ॥२८॥
ग्रह होम, आज्यभाग के होम, पुरस्तात् होम, संस्थित होमों को निकाल
कर, प्राण, अपान वायु को रोककर निधनाग्नि से आहुति करे ॥२९॥३०॥
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९३
भयोरुत्तिष्ठेत्युत्थापयति ॥३१॥ प्रच्यवस्वेति त्रिः संहा-
पयति यावत्कृत्वश्चोत्थापयति ॥३२॥ एवमेव कूर्दी जघने
निबध्य ॥३३॥ इमौ युनज्मीति गावौ युनक्ति पुरुषौ वा
॥३४॥ उत्तिष्ठ प्रेहि प्रच्यवस्वोदन्वतीत एतेऽग्नीषोमेदं
पूर्वमिति हरिणीभिर्हरेयुरति द्रवेत्यष्टभिः ॥३५॥ इदं
त इत्यग्निमग्रतः ॥३६॥ प्रजानत्यद्य इति जघन्यं गामे-
धमग्निं परिणीय ॥३७॥ स्योनास्मै भवेत्युत्तरतोऽग्नेः
शरीरं निदधाति ॥३८॥ अध्वर्यव इष्टिं निर्वपन्ति ॥३९॥
तस्यां यथादेवतं पुरस्ताद्धोमसंस्थितहोमानुद्धृत्य ॥४०॥
प्राणापानावरुद्ध्यै निघनाभिर्जुहुयात् ॥४१॥ अथोभयो-
रपेत ददामीति शान्त्युदकं कृत्वा सम्प्रोक्षणीभ्यां काम्पी-
लशाखया दहनं सम्प्रोक्ष्य ॥४२॥ उदीरतामित्युद्धृत्या-
भ्युक्ष्य लक्षणं कृत्वा पुनरभ्युक्ष्य प्राग्दक्षिणमेधश्चिन्वन्ति
॥४३॥ इयं नारीति पत्नीमुपसंवेशयति ॥४४॥ उदीष्र्वेत्यु-
॥३०॥ अब “उभयोरुत्तिष्ठेत्०” मंत्र से दोनों का उत्थापन करे ॥३१॥
इसी प्रकार कूर्दी को जंघे में बान्धकर “इमौ युञ्जि०” मंत्र से दो गौ
या दो पुरुषों को गाड़ी में जोते ॥३२॥३३॥३४॥ “उत्तिष्ठ प्रेहि०” इत्यादि
से हरिणी से कलश को उठाकर “द्रव०” इत्यादि आठ ऋचाओं से
हड्डियों को अभिमंत्रित करके “इदं त०” से प्रेत के आगे अग्नि को धर
कर “प्रजानत्यद्य०” से जघन्य गौ को अग्नि की परिक्रमा करके “स्यो-
नास्मै भव०” से अग्नि के उत्तर भाग में शरीर को रख देवे ॥३५॥३६॥
३७॥३८॥ और अध्वर्युगण इष्टि को निर्वपन करें ॥३९॥ पुरस्तात् होम
और संस्थित होमों को निकाल कर प्राणापान को रोककर निघनाग्नि से
आहुति देवे ॥४०॥४१॥ “अथोभयोरपेत ददामि०” से शान्ति उदक को
करके संप्रोक्षणियों से काम्पील शाखा द्वारा दहन स्थान का मार्जन करके
॥४२॥ “उदीरतां०” इत्यादि से अभ्युक्षण कर रेखा खींच कर पुनः मार्जन
करके पूर्व दक्षिण भाग में समिधों को आधान करे और “इयं नारी०”
मंत्र से पत्नी को मरणार्थ प्रेत के स्थान सोला देवे ॥४३॥४४॥ “उदीष्र्वं०”
२५
१९४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
त्थापयति ॥४५॥ यद्धिरण्यं बिभर्ति तद्दक्षिणे पाणावा-
दायाज्येनाभिघार्य ज्येष्ठेन पुत्रेणादापयतीदं हिरण्यमिति
॥४६॥ स्वर्गं यत इति दक्षिणं हस्तं निर्मार्जयति ॥४७॥
दण्डं हस्तादिति मन्त्रोक्तं ब्राह्मणस्यादापयति ॥४८॥
धनुर्हस्तादिति क्षत्रियस्य ॥४९॥ अष्ट्रामिति वैश्यस्य
॥५०॥ इदं पितृभ्य इति दर्भानेधान्स्तृणाति ॥५१॥
तत्रैनमुत्तानमादधीतेजानश्चित्तमारुक्षदग्निमिति ॥५२॥
प्राच्यां त्वा दिशीति प्रतिदिशम् ॥५३॥ नेत्युपरिबभ्रवः
॥५४॥ अनुमन्त्रयते ॥५५॥ अथास्य सप्तसु प्राणेषु सप्त
हिरण्यशकलान्यवास्यत्यमृतमस्यमृतत्वायामृतमस्मिन्धे-
हीति ॥५६॥॥८०॥
अथाहिताग्नेदर्भेषु कृष्णाजिनमन्तर्लोमास्तीर्य ॥१॥
तत्रैनमुत्तानमाधाय ॥२॥ अथास्य यज्ञपात्राणि पृषदा-
मंत्र से उसे उठावे ॥४५॥ और जो सोने का भूषण पहने हो उसको
दहिने हाथ में लेकर आज्य के साथ घी का धार देकर जेठे पुत्र
द्वारा “इदं हिरण्यं०” मंत्र पढ़कर दिलवावे ॥४६॥ “स्वर्गं यतः०” से
दहिने हाथ को मार्जन करे ॥४७॥ “दण्डं हस्तात्०” मंत्रोक्त विधि से
ब्राह्मण का दिलवावे “धनुर्हस्तात्०” से क्षत्रिय का और “अष्ट्रां०” से
वैश्य का ॥४८॥४९॥५०॥ “इदं पितृभ्यः०” डाभ तृणों का आस्तरण करे
॥५१॥ उन बिछाये हुए कुशों पर “जानश्चित्तमारुक्षदग्निं०” से प्रेत को
चित्त ( उत्तान ) डाल देवे ॥५२॥ “प्राच्यां त्वा दिशि०” से प्रति दिशा
में करे ॥५३॥ “उपरिबभ्रवः” आचार्य्यगण ऐसा नहीं करते ॥५४॥ अनु-
मंत्रण करे ॥५५॥ अब १ मुख, २ कान, दो नाक के छिद्र और दो नेत्र
इन सात प्राणों में सोने के सात टुकड़ों को “अमृतमसि०” इत्यादि से
डाले ॥५६॥॥८०॥ यह अस्सीवी कण्डिका समाप्त हुई ॥
अब आहिताग्नि के अग्नि के पास बिछाये हुए कुशों पर काले मृग-
चर्म को लोम ऊपर को करके बिछा देवे ॥१॥ उस पर प्रेत को उत्तान
रख देवे ॥२॥ और इसके यज्ञपात्रों को पृषदाज्य से पूरा करके अनुरूप
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९५
ज्येन पूरयित्वानुरूपं निदधाति ॥३॥ दक्षिणे हस्ते जुहूम्
॥४॥ सव्य उपभृतम् ॥५॥ कण्ठे ध्रुवां मुखेऽग्निहोत्र-
हवणीं नासिकयोः स्रुवम् ॥६॥ तान्यनुमन्त्रयते जुहू-
र्दाधार यां ध्रुव आ रोहेति ॥७॥ ललाटे प्राशित्रहरणम्
॥८॥ इममग्ने चमसमिति शिरसीडाचमसम् ॥९॥
देवा यज्ञमित्युरसि पुरोडाशम् ॥१०॥ दक्षिणे पार्श्वे स्फ्यं
सव्य उपवेषम् ॥११॥ उदरे पात्रीम् ॥१२॥ अष्ठीवत्तोरु-
लूखलमुसलम् ॥१३॥ श्रोण्योः शकटम् ॥१४॥ अन्तरे-
णोरू अन्यानि यज्ञपात्राणि ॥१५॥ पादयोः शूर्पम् ॥१६॥
अपो मृन्मयान्युपहरन्ति ॥१७॥ अयस्मयानि निदधाति
॥१८॥ अमा पुत्रा च दृषत् ॥१९॥ अथोभयोरपश्यं युव-
तिं प्रजानत्यध्न्य इति जघन्यां गां प्रसव्यं परिणीय-
मानामनुमन्त्रयते ॥२०॥ तां नैर्ऋतेन जघनताघ्नन्त
उपवेशयन्ति ॥२१॥ तस्याः पृष्ठतो वृक्कावुद्धार्य पाण्योर-
शरीर के प्रत्येक अंगों पर घरे ॥३॥ दहिने हाथ पर जुहू को, वाम हाथ
में उपभृत् , कण्ठ में ध्रुवा को, मुख में अग्निहोत्र हवणी, नाक के छिद्रों
में स्रुव को—उनको “जुहूर्दाधार०” मंत्र से अनुमंत्रण, ललाट पर प्राशि-
त्रहरण को घरे “इममग्ने चमसं०” से इडाचमस को घरे ॥९॥ “देवा
यज्ञं०” से कलेजे पर पुरोडाश को घरे ॥१०॥ दक्षिणपार्श्व में स्फ्य
को वामपार्श्व में उपवेश को घरे ॥११॥ पेट पर पात्री को घरे ॥१२॥
और अष्ठीवत में उलूखल और मुसल क्रम से घरे ॥१३॥ श्रोणी में शकट
को, दोनों जंघों के भीतर अन्यान्य यज्ञपात्रों को, दोनों पैरों पर शूर्प
को ॥१४॥१५॥१६॥ जल को माटी के बर्तनों में लावे लोहे के बर्तनों
को घरे, लोढ़ा, सीलवट ॥१७॥१८॥ अब “अथोभयोरपश्यं युवतिं प्रजा-
त्यघ्न्य०” से जघन्या गौ को वामभाग से चलकर परिक्रमा करता हुआ
अनुमंत्रण करे ॥२०॥ उस गौ को नैर्ऋत कोण से हनन करता हुआ उप-
वेशन करे ॥२१॥ उसके पृष्ठभाग से दोनों वृक् को निकाल कर दोनों
१९६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
स्याद्धस्त्यति द्रव श्वानाचिति ॥२२॥ दक्षिणे दक्षिणं
सव्ये सव्यम् ॥२३॥ हृदये हृदयम् ॥२४॥ अग्नेर्वर्मेति
वपया सप्तच्छिद्रया मुखं प्रच्छादयन्ति ॥२५॥ यथागात्रं
गात्राणि ॥२६॥ दक्षिणैर्दक्षिणानि सव्यैः सव्यानि ॥२७॥
अनुबद्धशिरःपादेन गोशालां चर्मणावच्छाद्य ॥२८॥ अजो
भाग उत्त्वा वहन्त्विति दक्षिणतोऽजं बध्नाति ॥२९॥
अस्माद्वै त्वमजायथा अयं त्वदधि जायतामसौ स्वाहे-
त्युरसि गृहे जुहोति ॥३०॥ तथाग्निषु जुहोत्यग्नये स्वाहा
कामाय स्वाहा लोकाय स्वाहेति ॥३१॥ दक्षिणाग्नावि-
त्येके ॥३२॥ मैनमग्ने वि दहः शं तप आरभस्व प्रजानन्त
इति कनिष्ठ आदीपयति ॥३३॥ आदीप्ते स्रुवेण यामान्
होमाञ्जुहोति परेयिवांसं प्रवतो महोरिति ॥३४॥ यमो
नो गातुं प्रथमो विवेदेति द्वे प्रथमे ॥३५॥ अङ्गिरसो नः
पितरो नवग्वा इति संहिताः सप्त ॥३६॥ यो ममार
हाथों पर “अतिद्रव श्वानौ०” से दहिने पर दहिने को, वाम पर वाम
को ॥२२॥२३॥ हृदय पर हृदय को “अग्नेर्वर्म०” से वपा द्वारा सात
छिद्रों को ढाक देवे ॥२४॥२५॥ जिस प्रकार शरीर के अंग हैं उसी
प्रकार प्रत्येक अंगों को घरे ॥२६॥ दहिने पर दहिनों को, बायें पर
बायों को घरे ॥२७॥ शिर पैरों को बांधकर गौ को गोशाला में चमड़े
से ढाक देकर “अजो भाग उत्त्वा वहन्तु०” से दक्षिणभाग में बकरे को
बान्धे ॥२९॥ “अस्माद्वै०” से हृदय पर आहुति देवे ॥३०॥ उसी प्रकार
अग्नये स्वाहा०” इत्यादि से अग्नियों में आहुतियाँ देंवे ॥३१॥ दक्षिणाग्नि
में आहुति देवे—ऐसा कोई २ आचार्य कहते हैं ॥ ३२ ॥ “मैनमग्ने
विदह०” इत्यादि से सब से छोटा पुत्र अग्नि प्रज्वलित करे ॥ ३३ ॥
अग्नि प्रज्वलित हो जाने पर स्रुव से “परेयिवांसं प्रवतो महीः०” मंत्र से
याम होमों की आहुतियाँ देवे ॥३४॥ “यमो नो गातुं०” इत्यादि पहिली
दो आहुतियाँ देवे ॥३५॥ “अङ्गिरसो नः पितरो नवग्वा”इत्यादि से लगा-
तार ७ आहुतियाँ देवे ॥३६॥ “यो ममार प्रथमो मर्त्यानां०” इत्यादि से
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९७
प्रथमो मर्त्यानां ये नः पितुः पितरो ये पितामहा
इत्येकादश ॥३७॥ अथ सारस्वताः ॥३८॥ सरस्वतीं
देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीं पितरो हवन्ते सरस्वति या
सरथं ययाथ सरस्वति व्रतेषु त इदं ते हव्यं घृतवत्सर-
स्वतीन्द्रो मा मरुत्वानिति ॥३६॥ दक्षिणतोऽन्यस्मिन्न-
नुष्ठाता जुहोति ॥४०॥ सर्वैरुपतिष्ठन्ति त्रीणि प्रभृति-
भिर्वा ॥४१॥ अपि वानुष्ठानीभिः ॥४२॥ एता अनुष्ठान्यः
॥४३॥ मैनमग्ने वि दह इति प्रभृत्यव सृजेति वर्जयित्वा
सहस्रनीथा इत्यतः ॥४४॥ आ रोहत जनित्रीं जातवे-
दस इति पञ्चदशभिराहिताग्निम् ॥४५॥ मित्रावरुणा
परि मामधातामिति पाणी प्रक्षालयते ॥४६॥ वर्चसा
मामित्याचामति ॥४७॥ विवस्वान्न इत्युत्तरतोऽन्यस्मि-
न्ननुष्ठाता जुहोति ॥४८॥२॥८१॥
यवीयः प्रथमानि कर्माणि प्राङ्मुखानां यज्ञोपवीतिनां
दक्षिणावृताम् ॥१॥ अथैषां सप्तसप्त शर्कराः पाणिष्वाव-
११ आहुतियाँ देवे ॥३७॥ अब सारस्वत हवन करे ॥३८॥ “सरस्वतीं
देवयन्तो हवन्ते०” इत्यादि मंत्रों से दक्षिण भाग में आहुतियाँ देवे और
दूसरे अग्नि में अनुष्ठाता आहुति देवे ॥३८॥३९॥ ४० सब मंत्रों से या
तीन मंत्रों से उपस्थान करें ॥४१॥ या अनुष्ठानी ऋचाओं से उपस्थान
करें ॥४२॥ ये अनुष्ठानी ऋचायें हैं ॥४३॥ “मैनमग्ने विदह०” इत्यादि
से “अवसृज०” तक छोड़ कर सहस्रनीथा०” इत्यादि तक जानो ॥४४॥
“आ रोहत जनित्रीं जातवेदस०” इत्यादि १५ ऋचाओं से आहिताग्नि
को उपस्थान करे ॥४५॥ “मित्रावरुणा०” इत्यादि से दोनों हाथों को
प्रक्षालन करे ॥४६॥ “वर्चसा मां०” इत्यादि से आचमन करे ॥४७॥
“विवस्वान्न०” से उत्तरभाग में आहुति करे और अन्य अग्नि में अनु-
ष्ठाता आहुति करे ॥४८॥२॥८१॥ यह एक्यासीवी काण्डका खतम हुई ।
बड़े प्रथम कर्मों को पूर्वमुख हो यज्ञोपवीती होकर दक्षिणावृत्त होप्र
१९८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
पते ॥२॥ तासामेकैकां सव्येनावाचीनहस्तेनावकिरन्तो-
ऽनवेक्षमाणा व्रजन्ति ॥३॥ अपाघेनानुमन्त्रयते ॥४॥ सर्वे-
ऽग्रतो ब्राह्मणा व्रजन्ति ॥५॥ मा प्र गामेति जपन्त उद्-
कान्ते व्यपाचे जपन्ति ॥६॥ पश्चाद्वसिञ्चति ॥७॥ उदु-
त्तममिति ज्येष्ठः ॥८॥ पयस्वतीरिति ब्रह्मोक्ताः पिञ्जूली-
रावपति ॥६॥ शान्त्युदकेनाचम्याभ्युक्ष्याश्वावतीमिति
नदीं तारयते ॥१०॥ नक्षत्रं दृष्ट्वोपतिष्ठते नक्षत्राणां मा
संकाशश्च प्रतीकाशश्चावतामिति ॥११॥ शाम्याकीः समि-
ध आधायाग्रतो ब्रह्मा जपति ॥१२॥ यस्य श्रया गतमनुप्र-
यन्ति देवा मनुष्याः पशवश्च सर्वे । तं नो देवं मनो अधि-
ब्रवीतु सुनीतिर्नो नयतु द्विषते मा रधामेति शान्त्यु दकेनाच-
म्याभ्युक्ष्य ॥१३॥ निस्सालामिति शालानिवेशनं सम्प्रोक्ष्य
॥१४॥ ऊर्जं बिभ्रदिति प्रपादयति ॥१५॥ नदीमालम्भ-
करे ॥१॥ अब इनके सात २ टुकड़े हाथों पर आवपन करे ॥२॥ उनमें
से एक २ को वाम हाथ नीचे करके अवकिरण (छींटें-बखेरें) करते
हुए इधर उधर न देखते हुए जावे ॥३॥ और “अपाघेन०” मंत्र से
अनुमंत्रण करें ॥४॥ सब के आगे २ ब्राह्मण गण जावें ॥५॥ “मा प्र
गाम०” इत्यादि का जप करते हुए जल के पास पहुँच कर जप करें
॥६॥ पीछे जल का सेक करे ॥७॥ “उदुत्तमं०” इत्यादि से जेठा जप
करे ॥८॥ “पयस्वतीः०” से ब्राह्मण के कहने पर पिञ्जुलियों का आवपन
करे ॥९॥ शान्ति जल से आचमन करके अभ्युक्षण कर “अश्वावतीं०”
ऋचा से नदी को पार करे ॥१०॥ नक्षत्र को देख कर “नक्षत्राणां०”
इत्यादि से उपस्थान करे ॥११॥ शाम्याकी समिधों का आधान करके
आगे ब्रह्मा जप करे ॥१२॥ अर्थात् वक्ष्यमाण मंत्र का जप करे-“यस्य
श्रया०” इत्यादि मंत्र का जप करके शान्ति जल से आचमन और अभ्युक्षण
करके “निस्सालां०” शाला में निवास करे और उसका संप्रोक्षण करके
“ऊर्जं बिभ्रदिति०” से टहले ॥१३॥१४॥१५॥ नदी को स्पर्श करे एवं गौ,
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १९९
यति गामग्निमश्मानं च ॥१६॥ यवोऽसि यवयास्मद्वेषो
यवयारातिमिति यवान् ॥१७॥ खल्वकास्येति खल्वा-
न्खलकुलांश्च ॥१८॥ व्यपाद्याभ्यां शाम्याकीराधाप-
यति ॥१९॥ तासां धूमं भक्षयन्ति ॥२०॥ यद्यत्क्रव्याद्
गृह्णेद्यदि क्रव्यादान् नान्तेऽपरेद्युः । दिवो नभः शुक्रं
पयो दुहाना इषमूर्जं पिन्वमानाः ॥ अपां योनिमपाध्वं
स्वधा याश्चकृषे जीवंस्तास्ते सन्तु मधुश्चुत इत्यग्नौ
स्थालीपाकं निष्पुणाति ॥२१॥ आदहने चापि वान्यवत्सां
दोहयित्वा तस्याः पृष्ठे जुहोति वैश्वानरे हविरिदं जुहो-
मीति ॥२२॥ तस्याः पयसि ॥२३॥ स्थालीपाक इत्येके
॥२४॥ ये अग्नय इति पालाश्या दर्व्या मन्थमपमथ्य
काम्पीलीभ्यामुपमन्थनीभ्यां तृतीयस्यामस्थीन्यभिजु-
होति ॥२५॥ उप द्यां शं ते नीहार इति मन्त्रोक्तान्यव-
दाय ॥२६॥ क्षीरोत्सिक्तेन ब्राह्मणस्यावसिञ्चति मधू-
अग्नि, पत्थर को स्पर्श करे ॥१६॥ “यवोऽसि०” इत्यादि से गौओं को
छूए ॥१७॥ और “खल्वकास्य०” मंत्र से खल्वा और खल कुलों को
छूए ॥१८॥ “व्यपाद्या०” से शाम्या की इध्मों का आधान करे ॥१९॥
उनके धूम को भक्षण करे॥२०॥ “यद्यत्क्रव्याद् गृहेत्०” इत्यादि मंत्रों से
अग्नि पर स्थाली पाक को पकावे ॥२१॥ और दहन होते समय तक
अन्य वत्सा को दूहकर उसके पीठ पर “वैश्वानरे हविरिदं जुहोमि०” से
आहुति करे ॥२२॥ उसके दूध में स्थालीपाक पकावे ऐसा कोई २
आचार्य कहते हैं ॥२३॥२४॥ “ये अग्नय०” इत्यादि से पलाश की दर्वी
से मन्थ को उपमथन करके काम्पीली की दोनों उपमन्थनी से तीसरी
उखा में हड्डियों की आहुति देवे ॥२५॥ “उप द्यां शं ते नीहार०” इत्यादि
मंत्र से मंत्रोक्त पदार्थों को लाकर तीसरे या चौथे दिन अस्थि संचय
करके “उप द्यां०” इन दो मंत्रों से, “हिरण्यपाणिं०” इन तीन से और
“शं ते नीहार०” इस एक ऋ० से मंत्र में कही ओषधियों, जल एवं दूध
को एकत्र करके ब्राह्मण की हड्डियों को सिंचन करे ॥ मधु से क्षत्रिय की
२०० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
त्सिक्तेन क्षत्रियस्योदकेन वैश्यस्य ॥२७॥ अव सृजेत्यनु-
मन्त्रयते ॥२८॥ मा ते मनो यत्ते अङ्गमिति सञ्चिनोति
पच्छः ॥२९॥ प्रथमं शीर्षकपालानि ॥३०॥ पञ्चाह्कलशे
समोप्य सर्वसुरभिचूर्णैरवकीर्योत्थापनीभिरुत्थाप्य
हरिणीभिर्हरेयुः ॥३१॥ मा त्वा वृक्ष इति वृक्षमूले
निदधाति ॥३२॥ स्योनास्मै भवेति भूमौ त्रिरात्रमरसा-
शिनः कर्माणि कुर्वते ॥३३॥ दशरात्र इत्येके ॥३४॥ यथा-
कुलधर्मं वा ॥३५॥ ऊर्ध्वं तृतीयस्या वैवस्वतं स्थालीपाकं
श्रपयित्वा विवस्वान्न इति जुहोति ॥३६॥ युक्ताभ्यां
तृतीयाम् ॥३७॥ आनुमतीं चतुर्थीम् ॥३८॥ शेषं शान्त्यु-
दकेनोपसिच्याभिमन्त्र्य प्राशयति ॥३९॥ आ प्रच्यवेथा-
हड्डियों को और जल से वैश्य की हड्डियों की सींचे। मंत्र में कही गयी
ओषधियाँ—शमी की डाल, दूध, शतपत्र, पलाशपत्र, वेतसकर्ण, नदी-
फेन, सीसा, सेमार, मुक्तिका एवं सूक्तिका, ॥२६॥२७॥ हड्डियों को “अव
सृज०” से अनुमंत्रण करे ॥ कलश में घरे ॥ और पलाश के पत्तों से
“मा ते मनो यत्ते अङ्गं०” से पैर से लेकर सब अङ्गों को सींचे। पहिले
शिर एवं कपाल आदि को सींचे। उसके अनन्तर ओषधियों के चूर्ण
को कलशे में धर कर उसे उठाकर “उत्तिष्ठ प्रच्यवस्व उदन्वती इत एत
अग्नीषोमा इदं पूर्वं०” इस मंत्र से कलश को उठाकर “अतिद्रव०”
इत्यादि हरिणी ऋचाओं से अभिमंत्रण करके उत्थापक गण उठावें और
“मा त्वा वृक्ष०” से वृक्ष के मूल में भूमि को खोद कर कलश को गाड़
देवे। और उस पर मट्टी डालकर भर देवे। उस पर पिण्डदान करे ॥२८॥
॥२९॥३०॥३१॥३२॥ “स्योनास्मै भव०” से भूमि में तीन रात्रि तक रस
सहित भोजन करते हुए कर्मों को करें ॥३३॥ कोई कोई दश रात्रि तक
कहते हैं ॥३४॥ किसी का मत है कि कुल में जैसी परिपाटी हो वैसा
करें ॥३५॥ तीसरी रात्रि बीतने पर वैवस्वत स्थालीपाक को पका कर
“विवस्वान्न०” से आहुतियाँ करे। “युक्ताभ्यां०” से तीसरी रात्रि में
आहुति देवे और “आनुमतीं०” से चौथी आहुति करे ॥३६॥३७॥ और
शेष को जल से सींच कर अभिमंत्रण करके प्राशन करे ॥३९॥ “आ प्र-
: "पितृन्निधास्यन्सम्भारान्"? No, there is no 'म्'.
Wait, why is there a '६' under 'न्सं'?
In Hindi books of this era, a small number (like 6, 7) refers to a footnote or variant reading!
Wait, let's look at the dot above:
Wait, is there a dot above 'स'? Yes, there's a very faint dot, or maybe it's just संभारान्?
Wait, look at the second word: संभरति. That has a very clear dot above स.
In पितृन्निधास्यन्सम्भारान् vs पितृन्निधास्यन्संभारान्:
Wait, look at 'न्': 'न' is half (न्). Then 'स' (or 'सं' with dot).
Wait, look at the small '६': it is right below the ligature 'न्सं' / 'न्स'!
Wait, let's write पितृन्निधास्यन्सम्भारान् or पितृन्निधास्यन्संभारान्?
Wait, in Sanskrit text it is पितॄन्निधास्यन्संभारान्संभरति or पितृन्निधास्यन्संभारान् संभरति.
Wait, look at 'पितृ': does it have short 'ृ' or long 'ॄ'?
In L6: "पितृन्निधास्यन्
२०२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
ध्यान्निदह्यतामघमिति ॥७॥ अमावास्यायां निदध्यादमा
हि पितरो भवन्ति ॥८॥ अथावसानम् ॥९॥ तद्यत्समं
समूलमविदग्धं प्रतिष्ठितं प्रागुदक्प्रवणम् ॥१०॥ यत्रा-
कण्टका वृक्षाश्चौषधयश्च ॥११॥ उन्नतं स्वर्गकामश्च ॥१२॥
श्वोऽमावास्येति गां कारयते ॥१३॥ तस्याः सव्यं चाप-
घनं प्रपाकं च निधाय ॥१४॥ भिक्षां कारयति ॥१५॥
ग्रामे यामसारस्वतान् होमान् दत्त्वा॥१६॥ सम्प्रोक्षणीभ्यां
काम्पीलशाखया निवेशनमनुचर्य ॥१७॥ प्राग्दक्षिणं
शाखां प्रविध्य सीरेण कर्षयित्वा शाखाभिः परिवार्य
॥१८॥ पुनर्देहीति वृक्षमूलादादत्ते ॥१९॥ यत्ते कृष्ण इति
भूमेर्वसने समोप्य सर्वसुरभिचूर्णैरवकीर्योत्थापनीभि-
रुत्थाप्य हरिणीभिर्हरेयुः ॥२०॥ अविदन्तो देशात्पांसून्
पितरों का निधान करने से पाप की शान्ति होती है ॥६॥ निदाघ ऋतु
में निधान करने से पाप भस्म हो जाता है ॥७॥ अमावास्या तिथि में
निधान करने से पितृगण अमा (साथ) होते हैं ॥८॥ अब अवसान
(जहां मृत मनुष्य का अस्थि संचय कलश रहता है—उस स्थान को
कहते हैं ।) के विषय में कहते हैं ॥९॥ जो स्थान समचौरस समूल-
जहां मुर्दा न जला हो—और पूर्व या उत्तर को ढालुआ हो ।। जहाँ कांटे,
वृक्ष, ओषधियां न हों ॥१०।११॥ स्वर्ग की इच्छा वाला उन्नत (ऊँची)
भूमि को अवसान बनावे ॥१२॥ कल्ह प्रातःकाल अमावास्या तिथि
होगी—पितृयज्ञ होगा—अतएव आज गौ का प्रबन्ध करवा रक्खे ॥१३॥
उसके वाम चापघन और प्रपाक को लाकर धरे और भिक्षा करवावे
॥१४।१५॥ और ग्राम में याम एवं सारस्वत होमों की आहुतियां देकर
संप्रोक्षणी ऋ० से काम्पील शाखा द्वारा निवेशन (घर) बनाकर पूर्व
पश्चिम भाग में शाखा को गाड़कर उस भूमि को हल से जुतवा कर
शाखाओं से घेरा बनाकर “पुनर्देहि” से वृक्ष के मूल में से अस्थि-
कलश को लाकर भूमि में वस्त्र बिछाकर उस पर धरे । और सर्वसुरभि
के चूर्णों को उस पर बखेर कर उत्थापनी ऋचा को पढ़कर उसे उठा
॥२१॥ अपि वोदकान्ते वसनमास्तीर्यासाविति ह्वयेत्
॥२२॥ तत्र यो जन्तुर्निपतेत्समुत्थापनीभिरुत्थाप्य हरि-
णीभिर्हरेयुः ॥२३॥ अपि वा त्रीणि षष्टिशतानि पला-
शत्सरूणाम् ॥२४॥ ग्रामे दक्षिणोदग्द्वारं विमितं दर्भै-
रास्तारयति ॥२५॥ उत्तरं जीवसंचरो दक्षिणं पितृसंचरः
॥२६॥ अनस्तमित आ यातेत्यायापयति ॥२७॥ आच्या
जान्वित्युपवेशयति ॥२८॥ सं विशन्त्विति संवेशयति
॥२९॥ एतद्वः पितरः पात्रमिति त्रीण्युदकंसांश्चिनयति
॥३०॥ त्रीन् स्नातानुलिप्तान् ब्राह्मणान् मधुमन्थं पाययति
॥३१॥ ब्राह्मणो मधुपर्कमाहारयति ॥३२॥ गां वेदयन्ते
कर हरिणी ऋचा से लावें ॥१६॥१७॥१८॥१९॥२०॥ अस्थि के नाश हो
जाने पर प्रायश्चित्त कर्म को कहते हैं । अस्थि यदि नष्ट हो जावें, उस
स्थान से मट्टी ( पांसु-धूली ) लेकर अस्थि गृह में डाल कर वहाँ से
उठावे ॥२१॥ या जलाशय के पास वस्त्र को बिछाकर “असौ०” ऐसा
कहे ॥२२॥ वहाँ यदि कोई जन्तु गिर पड़े तो उसको उत्थापनी ऋचाओं
से उठाकर हरिणी ऋ० से लावें ॥ या ३६० पलाशकी त्सरु के प्रान्त
भागों से पुरुष बनाकर वहाँ से उत्थापनी ऋ० से उठाकर हरिणी ऋ०
से लावें ॥ शरीर के नाश होने पर भी या दग्ध हो जाने पर भी यही
प्रायश्चित्त होता है ॥२३॥२४॥ ग्राम में जो मण्डप बना है उसके
द्वार एक दक्षिण मुख एवं दूसरा उत्तर मुख बनावे और उसमें डाभों
को बिछावे ॥२५॥ उत्तर द्वार अन्य जीवों का आने जाने का होगा
एवं दक्षिण द्वार पितरों के लिये जानो ॥२६॥ सूर्य रहते समय “आयात”
इत्यादि ऋचा पढ़कर अस्थियों को मण्डप में लावे ॥ और “आच्या
जानु०” इत्यादि से उसको धरे ॥२७॥२८॥ संविशन्तु०” से उसको
संवेशन करे ॥२९॥ “एतद्वः पितरः पात्रं०” से तीन जलपात्र लावे ॥३०॥
और तीन नहाये पूजादि करके निवृत्त हुए ब्राह्मणों को मधुमन्थ को
पिलावे ॥३१॥ ब्राह्मण के लिये मधुपर्क लावे ॥३२॥ गौ को लाकर
२०४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
॥३३॥ कुरुतेत्याह ॥३४॥ तस्या दक्षिणमर्धं ब्राह्मणान्
भोजयति सव्यं पितॄन् ॥३५॥४॥८३॥
वह वपां जातवेदः पितृभ्यो यत्रैतान् वेत्थ निहि-
तान्पराके । मेदसः कुल्या उप तान् स्रवन्तु सत्या एषा-
माशिषः सन्तु कामाः स्वाहा स्वधेति वपायास्त्रिर्जुहोति
॥१॥ इमं यमेति यमाय चतुर्थीम् ॥२॥ एकविंशत्या यवैः
कृशरं रन्धयति युतमन्यत्प्रपाकं च ॥ ३॥ सथवस्थ
जीवाः प्राश्नन्ति ॥४॥ अथेतरस्य पिण्डं निपृणाति ॥५॥
यं ते मन्थमिति मन्त्रोक्तं विमिते निपृणाति ॥६॥ तदु-
द्धतोष्महर्तारो दासा भुञ्जते ॥ ७ ॥ वीणा वदन्त्वित्याह
॥८॥ महयत पितॄनिति रिक्तकुम्भं विमितमध्ये निधाय
तं जरदुपानहाघ्नन्ति ॥९॥ कस्ये मृंजाना इति त्रिः
प्रसव्यं प्रकीर्णकेश्यः परियन्ति दक्षिणानूरूनाघ्नानाः
॥१०॥ एवं मध्यरात्रेऽपररात्रे च ॥११॥ पुरा विवाहात्
दिखलावे और ब्राह्मण कहे कि “करो” ॥३४॥ उस गौ का दहिना अर्द्ध
भाग को ब्राह्मणों को खिलावे और वाम भाग को पितरों के निमित्त
॥३५॥४॥८३॥ यह तिरासीवी कण्डिका खतम हुई ॥
“वह वपां जातवेदः०” इत्यादि से वपा की तीन आहुतियाँ देवे ॥१॥
“इमं यमाय०” से चौथी आहुति देवे ॥२॥ इक्कीस यवों की खिचड़ी बनावे
और दूसरे पाक को बनावे ॥३॥ यव की खिचड़ी को गोत्र वाले (सगो-
त्रीगण) लोग भोजन करें ॥४॥ और दूसरे प्रपाक का पिण्ड बनावे ॥५॥
“यं ते मन्थं०” से मन्त्रोक्त रीति से पिण्ड को विमित (पात्र) में धरे ॥
काम करने वाले दास भोजन करें ॥ प्रैष द्वारा “वीणां वदन्तु” ऐसा
कहें तब बाजा बजावें “महयत पितॄन्०” से खाली घड़े को विमित
में धर कर उसको पुराने जूते से मारें ॥६॥ “कस्येमृजाना०” से वाम
ओर से शिर केशों को खोल कर दहिने जांघ को पीटती हुई तीन बार
परिक्रमा करें ॥१०॥ इसी प्रकार आधीरात और आधीरात के पीछे करें
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । २०५
समांसः पिण्डपितृयज्ञः ॥१२॥ उत्थापनीभिरुत्थाप्य हरि-
णीभिर्हरेयुः ॥१३॥ अथावसायेति पश्चात् पूर्वकृतेभ्यः
पूर्वाणि पूर्वेभ्योऽपराणि यवीयसाम् ॥१४॥ प्राग्दक्षिणां
दिशमभ्युत्तराम्परां दिशमभितिष्ठन्ति ॥१५॥ यथा
चिँतिं तथा श्मशानं दक्षिणापरां दिशमभिप्रवणम् ॥
॥१६॥५॥८४॥
अथ मानानि ॥१॥ दिष्टिकुदिष्टिवितस्तिनिमुष्ट्य-
रत्निपदप्रक्रमाः ॥२॥ प्रादेशेन धनुषा चेमां मात्रां मिमी-
मह इति ॥३॥ सप्त दक्षिणतो मिमीते सप्तोत्तरतः पञ्च
पुरस्तात् त्रीणि पश्चात् ॥४॥ नव दक्षिणतो मिमीते
'नवोत्तरतः सप्त पुरस्तात्पञ्च पश्चात् ॥५॥ एकादश दक्षि-
णतो मिमीत एकादशोत्तरतो नव पुरस्तात्सप्त पश्चात्
॥६॥ एकादशभिर्देवदाशनाम् ॥७॥ अयुग्ममानानि परि-
॥११॥ विवाह के पहिले समांस पिण्डपितृयज्ञ करे ॥१२॥ उत्थापनी ऋ०
से उठावें और हरिणी से लावें ॥१३॥ यह कर्म अमावास्या के प्रातःकाल
करे ॥ अर्थात् उन हड्डियों को मण्डप से उठा कर लावें और पाद पर धरें ॥
उसकी विधि यह है कि पीछे पूर्वकृत पितरों के लिये ॥ “अवसाय०”
से पश्चात् पहिले किये हुओं के लिये, और अपरों को युवाओं के लिये
॥१४॥ पूर्व दक्षिण दिशा के सम्मुख उत्तर दिशा और पश्चिम दिशा के
सम्मुख रहें ॥१५॥ जैसे चिति को उसी प्रकार श्मशान को दक्षिण पश्चिम
ढालुआ बनावे ॥१६॥५॥८४॥ यह चौरासीवी कण्डिका खतम हुई ॥
अब मान ( माप, नाप ) के विषय में कहते हैं ॥१॥ दिष्टि, कुदिष्टि,
वितस्ति, निमुष्टि, अरत्नि, पद, प्रक्रम होते हैं ॥२॥ प्रादेश और धनुष से
“इमां मात्रां मिमीमह०” से मण्डप बनाने के लिये भूमि को नाप करे
॥३॥ सात दक्षिण से, सात उत्तर से, ५ पूर्व से और तीन पश्चिम से नाप
करे ॥४॥ नौ दक्षिण से, नौ उत्तर से, सात पूर्व और पांच पश्चिम से
नापे ॥५॥ ग्यारह दक्षिण से, ग्यारह उत्तर से, नौ पूर्व से, पांच पश्चिम
से नाप करे ॥६॥ ग्यारह का नाप देवदर्शियों के लिये ॥७॥ विषम
२०६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मण्डलानि चतुरस्राणि वा शौनकिनाम् ॥८॥ तथाहि दृश्य-
न्ते ॥६॥ यावान् पुरुष ऊर्ध्वबाहुस्तावानग्निश्चितः ॥१०॥
सव्यानि दक्षिणाद्वाराण्ययुग्मशिलान्ययुग्मेष्टकानि च
॥११॥ इमां मात्रां मिमीमह इति दक्षिणतः सव्य-
रज्जुं मीत्वा ॥१२॥ वारयतामघमिति वारणं परिधिं
परिदधाति शङ्कुं च निचृतति ॥१३॥ पुरस्तान्मीत्वा
शमेभ्योऽस्त्वघमिति शामीलं परिधिं परिदधाति शङ्कुं
च निचृतति ॥१४॥ उत्तरतो मीत्वा शाम्यत्वघमित्यौ-
दुम्बरं परिधिं परिदधाति शङ्कुं च निचृतति ॥१५॥ पश्चा-
न्मीत्वा शान्तमघमिति पालाशं परिधिं परिदधाति
शङ्कुं च निचृतति ॥१६॥ अमासीत्यनुमन्त्रयते ॥१७॥
अक्ष्णया लोहितसूत्रेण निबध्य ॥१८॥ स्तुहि श्रुतमिति
मध्ये गर्तं खात्वा पाशिसिकतोषोदुम्बरशङ्कशालूक-
( बे जोड संख्या ) मान परिमण्डलों के लिये या चतुष्कोण समचौरस
श्मशान भूमि को बनावे यह विकल्प पक्ष शौनक शाखा वालों का है
॥८॥ लोक में ऐसा ही देखा जाता है ॥९॥ जितना ऊँचा पुरुष बाहु
उठाने पर होता है, उसी परिमाण का अग्निचित् होता है ॥१०॥ दक्षिण
के दरवाजे सव्य होवें, विषम संख्यक शिलायें या इष्टिका ( ईंटें ) ये
होवें ॥११॥ “इमां मात्रां मिमीमह०” से दक्षिण से सव्य रज्जु को नाप
करके “वारयतामघं०” से वारण परिधि को घरे और शङ्कु को गाड़े
॥१२॥१३॥ पूर्व से नाप करके “शमेभ्योऽस्त्वघं०” इत्यादि से शामील-
परिधि को घरे और शङ्कु को गाड़े ॥१४॥ उत्तर से नाप कर “शाम्यत्वघं०”
से गूलर की परिधि को घर कर शङ्कु को गाड़े ॥१५॥ पश्चिम भाग को नाप
करके “शान्तमघं०” से पलाश की परिधि को धरकर शङ्कु को गाड़े
॥१६॥ “अमासि०” से अनुमंत्रण करे ॥१७॥ अक्ष्णा द्वारा लाल सूत से
बान्ध देवे ॥१८॥ “स्तुहि श्रुतं०” से बीच में गर्त खोदकर पाशि, बालु-
का, उषा, गूलर, शङ्क, शालूक, सर्व सुरभि, शमी इनके चूर्णों को उस
सर्षसुरभिशमीचूर्णानि निवपति ॥१९॥ निःशीयतामघ-
मिति निःशीयमानमास्तृणाति ॥२०॥ असंप्रत्यघम् ॥२१॥
विलुम्पतामघमिति परिचैलं दूर्शं विलुम्पति ॥२२॥
उक्तो होमो दक्षिणतः स्तरणं च ॥२३॥ एतदा रोह ददा-
मीति कनिष्ठो निवपति ॥२४॥ एदं बर्हिरिति स्थित-
सूनुर्यथापरु सञ्चिनोति ॥२५॥ मा ते मनो यत्ते अङ्ग-
मिन्द्रो मोदपूरित्यातोऽनुमन्त्रयते ॥२६॥ धानाः सलिङ्गा-
भिरावपति ॥२७॥६॥८५॥
इदं कसाम्ब्विति सजातानवेक्षयति ॥१॥ ये च जीवा
ये ते पूर्वे परागता इति सर्पिर्मधुभ्यां चरुं पूरयित्वा शीर्ष-
देशे निदधाति ॥२॥ अपूपवानिति मन्त्रोक्तं दिक्ष्वष्टम-
देशेषु निदधाति ॥३॥ मध्ये पचन्तम् ॥४॥ सहस्रधारं
गर्त्त में डाले ॥ १६॥ “निःशीयतामघं०” फटे पुराने कपड़े को बिछावे
॥२०॥ “असंप्रत्यघं०” और “विलुम्पतामघं०” से दूसरा परिचैल
वस्त्र को बिछावे ॥२१॥२२॥ दक्षिण से होम करना एवं स्तरण करना कहा
गया ॥२३॥ उसी स्थान में बाहर धरने से अग्नि कर्म होगा अतएव वस्त्र
से होम और स्तरण दोनों कह गये ॥२३॥ “एतदारोह ददामि०” से सब
से छोटा-( नाते में ) सब हड्डियों को उसी गर्त्त में डाले ॥२४॥ “एदं
बर्हिः०” से कुल में जो ज्येष्ठ हो वह हड्डियों को गर्त्त में डाले ॥२५॥
“मा ते मनो यत्ते०” से अनुमंत्रण करे ॥२६॥ “या ते धाना” ये दो
“धानाधेनुः०” एक ऋचा “एवास्ते असौ धेनव०” यह एक ऋ० “यास्ते
धान्य अस्तु०” यह एक ऋचा इन ऋचाओं से तिल मिश्र धान को
अस्थियों पर डाले ॥२७॥६॥८५॥ यह पचासीवी कण्डिका समाप्त हुई ॥
“इदं कसाम्बु०” से सजाति के लोगों को दिखलावे ॥१॥ “ये च
जीवा ये ते०” इत्यादि से घृत और मधु से दो चरु को भरकर शीर्ष
देश में धरे और आठ चरुओं को अपूपों से भरकर अलग २ आठ
दिशाओं में धरे “अपूपवान्०” से धरे । बीच में पकते हुए चरु को
धरे ॥२॥३॥४॥ “सहस्रधारं शतधारं०” से जल से सींचकर 'पर्जो