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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 361 में से

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पृष्ठ 238

२०६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मण्डलानि चतुरस्राणि वा शौनकिनाम् ॥८॥ तथाहि दृश्य-
न्ते ॥६॥ यावान् पुरुष ऊर्ध्वबाहुस्तावानग्निश्चितः ॥१०॥
सव्यानि दक्षिणाद्वाराण्ययुग्मशिलान्ययुग्मेष्टकानि च
॥११॥ इमां मात्रां मिमीमह इति दक्षिणतः सव्य-
रज्जुं मीत्वा ॥१२॥ वारयतामघमिति वारणं परिधिं
परिदधाति शङ्कुं च निचृतति ॥१३॥ पुरस्तान्मीत्वा
शमेभ्योऽस्त्वघमिति शामीलं परिधिं परिदधाति शङ्कुं
च निचृतति ॥१४॥ उत्तरतो मीत्वा शाम्यत्वघमित्यौ-
दुम्बरं परिधिं परिदधाति शङ्कुं च निचृतति ॥१५॥ पश्चा-
न्मीत्वा शान्तमघमिति पालाशं परिधिं परिदधाति
शङ्कुं च निचृतति ॥१६॥ अमासीत्यनुमन्त्रयते ॥१७॥
अक्ष्णया लोहितसूत्रेण निबध्य ॥१८॥ स्तुहि श्रुतमिति
मध्ये गर्तं खात्वा पाशिसिकतोषोदुम्बरशङ्कशालूक-

( बे जोड संख्या ) मान परिमण्डलों के लिये या चतुष्कोण समचौरस
श्मशान भूमि को बनावे यह विकल्प पक्ष शौनक शाखा वालों का है
॥८॥ लोक में ऐसा ही देखा जाता है ॥९॥ जितना ऊँचा पुरुष बाहु
उठाने पर होता है, उसी परिमाण का अग्निचित् होता है ॥१०॥ दक्षिण
के दरवाजे सव्य होवें, विषम संख्यक शिलायें या इष्टिका ( ईंटें ) ये
होवें ॥११॥ “इमां मात्रां मिमीमह०” से दक्षिण से सव्य रज्जु को नाप
करके “वारयतामघं०” से वारण परिधि को घरे और शङ्कु को गाड़े
॥१२॥१३॥ पूर्व से नाप करके “शमेभ्योऽस्त्वघं०” इत्यादि से शामील-
परिधि को घरे और शङ्कु को गाड़े ॥१४॥ उत्तर से नाप कर “शाम्यत्वघं०”
से गूलर की परिधि को घर कर शङ्कु को गाड़े ॥१५॥ पश्चिम भाग को नाप
करके “शान्तमघं०” से पलाश की परिधि को धरकर शङ्कु को गाड़े
॥१६॥ “अमासि०” से अनुमंत्रण करे ॥१७॥ अक्ष्णा द्वारा लाल सूत से
बान्ध देवे ॥१८॥ “स्तुहि श्रुतं०” से बीच में गर्त खोदकर पाशि, बालु-
का, उषा, गूलर, शङ्क, शालूक, सर्व सुरभि, शमी इनके चूर्णों को उस