कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)

कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)
Kaushitaki Shankhayana Brahmana with Udaya Commentary
महर्षि कौषीतकि (टीकाकार: उदयसूरि) द्वारा
DevanagariSanskritpublished119 पृष्ठ
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$$XIX, 3, २८-5, २ \qquad\qquad\qquad कौषीतकिब्राह्मणे \qquad\qquad\qquad 92$$
चरन्ति ॥२८॥ रेतःसिक्तिर्वै त्वाष्ट्रः ॥२९॥ उपांशु वै रेतः सिच्यते ॥३०॥ पर्यग्निकृतमुत्सृजन्ति
न संस्थापयन्ति ॥३१॥ रेतःसिक्तिर्वै त्वाष्ट्रः ॥३२॥ नेद् रेतः सिक्तं पुरा कालात् संस्था-
पयामेति ॥३३ ॥३॥
$^1 L. P. ॰मनुषपेति \qquad ^2 L. P. ॰च्छमयति \qquad ^3 L. P. Here ends Khaṇḍa 4$
$^4 L. P. अत्र \qquad ^5 L. (var.) सर्वान् \qquad ^{6-6} L. (var.) तस्मादेव स्वस्ता; P. तस्माद्देवस्य स्ता$
$^7 L. P. Here ends Khaṇḍa\text