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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक ८८५
उसके विवाह की एक मास की अवधि को एक युग के समान मानते हुए नववधू के
लिए उत्सुक-हृदय नरवाहनदत्त को चैन नहीं मिल रहा था। ॥२॥
गोमुख के मुख से यह समाचार जानकर उसके पिता वत्सराज ने स्नेह के कारण वसन्तक
के साथ अपने मित्रों को भेजा ॥३॥
उनलोगों के गौरव (आश्वासन) से नरवाहनदत्त के कुछ धीरज धरने पर चतुर
मन्त्री गोमुख ने वसन्तक से कहा—॥४॥
'आर्य वसन्तक युवराज के मन को प्रसन्न करनेवाली कोई नई और रोचक कथा
सुनाओ' ॥५॥
मयोधर और लक्ष्मीधर की कथा
तब बुद्धिमान् वसन्तक ने कथा प्रारम्भ की। मालव देश में श्रीधर नाम का प्रसिद्ध
और श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था। उसके यहाँ एक साथ दो बालक उत्पन्न हुए। बड़े का नाम यशोधर
और छोटे का नाम लक्ष्मीधर था ॥६-७॥
युवावस्था में आये हुए वे दोनों भाई विद्याध्ययन के लिए पिता की आज्ञा से दूर देश को
चले गये ॥८॥
क्रमशः मार्ग में चलते हुए उन्हें एक विशाल जगल मिला। वह पानी और पेड़ों की
छाया से हीन था और तपी हुई बालू से भरा था। उसमें जाते हुए वे दोनों घाम से विकल
और प्यास से व्याकुल होकर सायंकाल फल और छायावाले एक विशाल वृक्ष के समीप
पहुँचे ॥९-११॥
उन्होंने उस वृक्ष के नीचे कलम से बनी हुई, शीतल और निर्मल जल से भरी हुई
और कमलों की सुगन्धि से युक्त एक बावली देखी ॥११॥
उसमें नहाकर, भोजन करके और शीतल-मधुर जल पीकर तृप्त हुए वे दोनों एक पत्थर
की चट्टान पर बैठकर विश्राम करने लगे ॥१२॥
सूर्य के अस्त हो जाने पर, सन्ध्या-वन्दन करके हिंसक जन्तुओं के भय से रात बिताने के
लिए वे दोनों पेड़ पर चढ़ गये ॥१३॥
रात्रि होने पर उस बावली के जल के बीच से उनके देखते-देखते बहुत-से पुरुष
निकले ॥१४॥
उनमें से कोई भूमि को साफ करने लगा कोई लीपने लगा और किसी ने वहाँ पाँच रंगों के
फूल फैला दिये ॥१५॥