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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

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सप्तम लम्बक २९
उस आये हुए हाथी पर विष्णु भगवान् के आज्ञानुसार चढ़कर राजा ने सारी पृथ्वी को
जीतकर राज-कन्याओं का आहरण किया ॥२०॥
वह राजा अस्सी हजार कन्याओं को लाकर रत्नकूटपुर में यथेच्छ विहार करता हुआ
रहने लगा ॥२१॥
और उस श्वेतरश्मि¹ हाथी की शान्ति के लिए प्रतिदिन पाँच सौ ब्राह्मणों को भोजन
कराता था ॥२२॥
किसी समय उस हाथी पर चढ़कर और अनेक द्वीपों का भ्रमण करके वह राजा अपने द्वीप
में आया। वहाँ पर आकाश से भूमि पर उतरते हुए उस हाथी के मस्तक पर गरुड़जातीय पक्षी ने
चोंच से प्रहार किया ॥२३ २४॥
राजा के तीखे अंकुश के प्रहार से वह पक्षी तो मारा गया किन्तु हाथी चोंच की मार
से मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा ॥२५॥
राजा के उतर जाने पर होश में आया हुआ भी वह हाथी उठाये जाने पर भी न उठ
सका और न आहार कर सका ॥२६॥
इस प्रकार, पाँच दिनों तक उस हाथी के निराहार पड़ रहने पर राजा भी निराहार रहकर
दुःखित हुआ और बड़ी चिन्ता में पड़कर बोला—'हे लोकपालो मुझे इस संकट में कोई उपाय
बताओ। नहीं तो मैं अपना सिर काटकर तुम्हें बलि दे दूँगा' ॥२७-२८॥
ऐसा कहकर और तलवार खींचकर अपना गला काटने को तैयार राजा से आकाशवाणी ने
अप्रत्यक्ष रूप से कहा—॥२९॥
'हे राजन् ! ऐसा दुस्साहस कार्य न करो। यदि कोई पतिव्रता स्त्री अपने हाथ से इस
हाथी का स्पर्श करेगी तो यह उठ जायगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है' ॥३०॥
यह सुनकर प्रथम राजा ने अमृतलता नाम की सुप्रतिष्ठ प्रधान रानी को बुलवाया ॥३१॥
जब उसके छूने पर हाथी नहीं उठा तब उसने अन्य सभी रानियों को बुलवाया ॥३२॥
उनके छूने पर भी जब हाथी न उठा तब यह निश्चय हो गया कि इनमें कोई भी
सच्चरित्रा और पतिव्रता नहीं है ॥३३॥
१ किसी-किसी पुस्तक में हाथी का नाम 'शीतरश्मि' लिखा है। किन्तु 'श्वेतरश्मि'
नाम ही उचित प्रतीत होता है।—अनु.