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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

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पृष्ठ 358

अष्टम लम्बक ३२७
तब विद्याधरों की सेना के साथ श्रुतशर्मा के चले जाने पर उसका दूत आकर सूर्यप्रभ
से इस प्रकार बोला—॥८०॥
'जैसा कि हमारे स्वामी श्रुतशर्मा तुमको आज्ञा देते हैं कि यदि तुम्हें अपने जीवन से
कार्य है, तो इस तरकस को मुझे दे दो' ॥८१॥
तब सूर्यप्रभ ने उत्तर दिया—'दूत उससे जाकर कह दो कि मेरे बाणों से छिदा हुआ तेरा
शरीर ही तरकस बन जायगा' ॥८२॥
उत्तर सुनकर दूत के चले जाने पर वे सब श्रुतशर्मा की मूर्खता-पूर्ण बातों पर हँसने
लगे ॥८३॥
तब सुमेरु ने सूर्यप्रभ का आलिंगन करके उससे कहा—'भाग्य से ही आज शिवजी की बात
निःसन्देह सफल हुई ॥८४॥
इस तूणीर-रत्न के सिद्ध हो जाने पर तेरी चक्रवर्तिता सिद्ध हुई। अब आओ धनुष-रत्न
को सिद्ध करें' ॥८५॥
सुमेरु के वचन सुनकर और उसी के आगे-आगे चलने पर सूर्यप्रभ आदि उसके पीछे-पीछे
वहाँ से हेमकूट पर्वत पर गये ॥८६॥
वे उसके समीप ही उत्तर की ओर मानस-सरोवर पर पहुंचे जो सरोवर समुद्र के निर्माण
के लिए मानों ब्रह्मा का साधन हो ॥८७॥
जलक्रीडा करती हुई देवांगनाओं के मुखों से मानों वह सरोवर खिले हुए स्वर्ण-कमलों से
अपने को छिपा रहा था ॥८८॥
जबतक वे लोग मानस-सरोवर की शोभा देखते हैं, तबतक श्रुतशर्मा आदि विद्याधर
वहाँ आ गये ॥८९॥
तब सूर्यप्रभ और वे सब विद्याधर घृत और कमलों से हवन करने लगे। उसी क्षण उस
सरोवर से एक भयानक बादल निकला ॥९०॥
वह मेघ आकाश में जाकर घोर वर्षा करने लगा उसी वर्षा में मेघ से एक भीषण काला
साप गिरा ॥९१॥
सूर्यप्रभ के कहने पर सुमेरु ने उसे कसकर पकड़ा। बाणों से बींधा जाता हुआ भी वह काला
साप उसी क्षण धनुष बन गया ॥९२॥
उस साप के धनुष बन जाने पर दूसरा साप फिर गिरा उसके मुख से निकलते हुए
विष और आग की लपटों के भय से सभी आकाशचारी विद्याधर भयभीत हो काँपने
लगे ॥९३॥
पहले साप के समान ही उस साप के भी सूर्यप्रभ द्वारा पकड़े जाने पर वह (साप) धनुष
की डोरी बन गया और वह मेघ भी नष्ट हो गया ॥९४॥