सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 1079 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 298

अष्टम लम्बक २६१
इस प्रकार की आकाशवाणी ने उनके मरण प्रयत्न को शान्त कर दिया और वे पहले
की भाँति चन्द्रप्रभ की प्रतीक्षा में वहीं रुके रहे ॥७६॥
इसी बीच पाताल के उस देवमन्दिर में बैठे हुए और अपने बन्धु-बान्धवों से घिरे हुए चन्द्रप्रभ
से मयासुर ने कहा—॥७७॥
'हे राजन् एकाग्रचित्त होकर सुनो। मैं तुम्हें अत्यन्त उत्तम योग का उपदेश दूंगा
जिसके द्वारा दूसरे शरीर में प्रवेश किया जा सकता है' ॥७८॥
ऐसा कहकर उसने चन्द्रप्रभ को रहस्य के साथ सांख्य और योग द्वारा परकाय प्रवेश
का उपदेश दिया ॥७९॥
वह योगीन्द्र कहने लगा—यह सिद्धि है और यह वह स्वतेजस् ज्ञान है जो ऐश्वर्य और
अणिमा आदि अष्ट सिद्धियों को देनेवाला है ॥८०॥
इस ऐश्वर्य को प्राप्तकर देवता मोक्ष को भी नहीं चाहते। इसी की प्राप्ति के लिए
अन्य मनुष्य जप-तप का क्लेश उठाते हैं ॥८१॥
और वे इच्छानुरूप व्यक्ति मिलने हुए स्वयं-मुक्त को भी नहीं चाहते। मैं इस सम्बन्ध
में एक कथा कहता हूँ सुनो'—॥८२॥
काल ब्राह्मण की कथा
प्राचीन समय कालनाम का एक ब्राह्मण था उसने पुष्कर तीर्थ में आकर दिन रात
जप करना प्रारम्भ किया ॥८३॥
जप करते हुए उसे दो सौ दिव्य वर्ष व्यतीत हो गये तब उसके सिर से एक अविराम ज्योति
पैदा फूट पड़ी ॥८४॥
हजारों सूर्यों से भी अधिक उस प्रचंड ज्योति ने आकाश में उठकर सिद्ध विद्याधर और
आकाशचारियों की गति को रोक दिया और तीनो लोक उस ज्वाला के तेज से सन्तप्त
होने लगे ॥८५॥
तब ब्रह्मा इन्द्र आदि देवता उस ब्राह्मण के समीप आकर बोले— हे ब्रह्मन् तुष्ट जो
भी अभीष्ट हो वर लो। तुम्हारे तप के तेज से तीनो लोक जल रहे हैं ॥८६॥
उस ब्राह्मण ने कहा— मैं यही चाहता हूँ कि जप को छोड़कर अन्यत्र कहीं मेरा मन न
लगे। इसके अतिरिक्त मैं कुछ वर नहीं चाहता ॥८७॥
उन देवताओं के बहुत आग्रह करने पर तंग आकर वह ब्राह्मण उत्तर दिशा में हिमालय के
पास जाकर फिर जप करने लगा ॥८८॥