कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 296अष्टम लम्बक २६७
अष्टम लम्बक २६७
इसलिए, तुम लोग शंका न करो। प्रत्युत तुम्हारा यह राजा जरा-मरण रहित दिव्य और
महाबलवान् शरीर धारण करेगा ॥६२॥
तुम सभी मानव भी रसातल में प्रवेश करके अमृतपान से दिव्य वपुधारी और रोग-रहित
हो जाओगे' ॥६३॥
मयासुर के यह वचन सुनकर उसकी बात को सभी ने मान लिया और उसके विश्वास से
शंका-रहित होकर वे सब सहमत हो गये ॥६४॥
मयासुर के कथनानुसार, दूसरे दिन राजा चन्द्रप्रभ चन्द्रभागा¹ और इरावती नदी के
संगम पर सब राजाओं के साथ गया ॥६५॥
वहाँ वह सेना-सहित सब राजाओं को ठहराकर और सूर्यप्रभ की सभी रानियों को उनकी
संरक्षता में रखकर मयासुर द्वारा निर्दिष्ट गुफा में सूर्यप्रभ तथा सिद्धार्थ आदि मन्त्रियों एवं अपनी
रानियों के सहित प्रवेश कर गया ॥६६-६७॥
उस गुफा में जाकर उसने दूर से एक देव-मन्दिर को देखा और उन सब के साथ वह उस
मन्दिर में गया ॥६८॥
ऊपर जो राजा सूर्यप्रभ की प्रतीक्षा में गुफा के द्वार पर ठहरे थे, उनपर अपनी सेना
के साथ विद्याधर आकाश-मार्ग से टूट पड़े ॥६९॥
उन विद्याधरों ने अपनी मायाओं (विद्याओं) से उन सब को बाँधकर सूर्यप्रभ की सभी
पत्नियों का हरण कर लिया और इसके बाद ही आकाशवाणी हुई—॥७०॥
'अरे पापी श्रुतशर्मन्, यदि तू चक्रवर्ती सूर्यप्रभ की इन पत्नियों का स्पर्श भी करेगा तो
उसी क्षण सेना के साथ मर जायगा ॥७१॥
इसलिए इन स्त्रियों को माता के समान देखते हुए सम्मान के साथ इनकी रक्षा कर। इसी
लिए, मैंने अभी तुझे मारकर इन्हें नहीं छुड़ाया है ॥७२॥
इसमें कुछ कारण है, अतः ये अभी दूसरे स्थान पर रहें।' आकाशवाणी के ऐसा कहकर
बन्द हो जाने पर वे सभी विद्याधर भाग गये ॥७३॥
और, वीरभट आदि राजा अपनी कन्याओं का प्रत्यक्ष आहरण देखकर परस्पर युद्ध करके
प्राणत्याग करने के लिए उद्यत होगये ॥७४॥
'इन कन्याओं का नाश न होगा, तुम लोग फिर इन्हें प्राप्त करोगे, इसलिए मरण का साहस
न करो, तुम्हारा कल्याण हो' ॥७५॥
१. पंजाब की दो प्रसिद्ध नदियाँ चन्द्रभागा—चेनाव और इरावती—
रावी।—अनु.