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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक १५३
उसने मरण-धर्मवाले मानवों की सृष्टि की थी। अब तुम अमृत बनाकर उन्हें अमर
(देवता) बनाना चाहते हो ? ॥१७॥
ऐसा करने पर देवता और मानव में क्या अन्तर रह जायगा। यज्ञ करनेवाले और यज्ञ में
भाग लेनेवालों के अभाव में संसार की स्थिति (मर्यादा) भंग हो जायगी ॥१८॥
इसलिए, हमारे कहने से इस अमृत-साधना को बन्द करो। नहीं तो क्रुद्ध देवता तुम्हें अवश्य
ही शाप देंगे ॥१९॥
जिस पुत्र के शोक के कारण तुम यह प्रयत्न करते हो वह तुम्हारा पुत्र तो यहाँ स्वर्ग में है।
इन्द्र के ऐसा कहने पर वे दोनों ही उनके आगमन से प्रसन्न नागार्जुन के पास आये और उसे
इन्द्र का सन्देश सुनाया ॥२०-२१॥
और यह भी कहा कि तुम्हारा पुत्र स्वर्ग में देवताओं के साथ आनन्दपूर्वक रह रहा है।
तब नागार्जुन खिन्न होकर सोचने लगा—॥२२॥
यदि मैं इन्द्र की बात न मानूं, तो देवताओं के शाप की बात तो दूर रहे क्या ये अश्विनी
कुमार ही मुझे शाप नहीं दे सकते हैं ? ॥२३॥
इसलिए, अमृत-निर्माण की योजना जाने दी जाय। मेरा पुत्र तो अपने पूर्व पुण्यों के प्रभाव से
अशोचनीय गति को प्राप्त हो गया है ॥२४॥
ऐसा सोचकर नागार्जुन अश्विनीकुमारों से बोला— मैंने इन्द्रकी आज्ञा शिरोधार्य की।
अब अमृत बनाने की क्रिया समाप्त करता हूँ। यदि आप दोनों न आते तो पाँच दिनों में ही
अमृत-निर्माण होने पर सारी पृथ्वी अजर-अमर हो जाती' ॥२५ २६॥
ऐसा कहकर नागार्जुन ने उनके सामने ही अधपच तैयार हुए अमृत को पृथ्वी में गाड़
दिया ॥२७॥
तब प्रसन्न होकर अश्विनीदेव ने नागार्जुन से पूछकर और स्वर्ग में जाकर इन्द्र को
सारा वृत्तान्त सुनाया और देवराज इन्द्र भी प्रसन्न हुआ ॥२८॥
इधर नागार्जुन के स्वामी राजा चिरायु ने अपने जीवहर नामक पुत्र को युवराज-पद पर
अभिषिक्त कर दिया। अभिषेक किये हुए प्रसन्नचित्त और प्रणाम करने के लिए आये हुए पुत्र को
प्रसन्न देखकर उसकी माता धनपरा बोली—॥२९-३०॥
'बेटा ! इस यौवराज्य को प्राप्तकर क्या झूठे ही प्रसन्न हो रहे हो। यह राज्य का क्रम तो
तपस्या से भी नहीं चल सकता ॥३१॥
२