कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 1079 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसलिए, बुद्धिवर ! तुम श्रेष्ठ सो छिपे हुए राजपूतों की सेना लेकर पाटलिपुत्र
जाओ। मैं अपनी प्यारी की तुरन्त प्रतिक्रिया (प्रत्युपकार) करके पुनः यहाँ आने के लिए
वहीं आता हूँ ॥७४-७५॥
विक्रमादित्य ने मन्त्री को ऐसा कहकर और दिन भर के कार्य करके नौकरों और
सिपाहियों के साथ मन्त्री को भेज दिया ॥७६॥
इस प्रकार मन्त्री के चले जाने पर, राजा ने भावी वियोग की उत्कण्ठा में वह रात
मदनमाला के साथ व्यतीत की ॥७७॥
वह मदनमाला दूर होनेवाले राजा के वियोग की मानो सूचना देते हुए हृदय से संयुक्त
होकर आलिंगन करती हुई उस रात में सोई नहीं ॥७८॥
प्रातःकाल राजा नित्य कृत्य करके जप करने के बहाने अकेला ही देवता के पूजा-घर
में गया ॥७९॥
वहाँ उसने स्मरण करने से ही उपस्थित कुबेर देवता को बुलाकर और प्रणाम करके
इस प्रकार प्रार्थना की—॥८० ॥
'हे देव ! पहले स्वीकार किये हुए वर के अनुसार तुम मुझे मांस के ऐसे पाँच अगम
पुरुष प्रदान करो जिन्हें प्रतिदिन बार-बार काटकर दान कर देने पर उनके कटे अंग पुनः
पूर्ववत् हो जायें ॥८१-८२॥
'ऐसा ही होगा जैसा पुरुष तुम चाहते हो तुम्हें मिलेगा तथा' कहकर कुबेर देवता
अन्तर्धान हो गये ॥८३॥
राजा ने भी उसी समय उस देवमन्दिर में अकस्मात् रखे हुए सोने के पाँच पुरुष देखे।
तब राजा भी अपनी प्रतिज्ञा का बिना बताये देवगृह से निकलकर और आकाश से उड़कर
पाटलिपुत्र नगर को चला गया ॥८४-८५॥
वहाँ रानियों, मन्त्रियों एवं जनता के द्वारा अभिनन्दित किया गया राजा प्रतिज्ञानन्द
की ओर बुद्धि लगाये हुए रहने लगा ॥८६॥
इधर शूरसेन में उसकी प्यारी प्रेयसी मदनमाला आसन्न वियोग देखकर राजा को त्याग
देने के लिए उस देवगृह में गई ॥८७॥
१२