कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम लम्बक ५६१
उस ब्राह्मण युवक के इस प्रकार समयानुसार सोचते हुए वह सारा दिन समाप्त हो
गया ॥२५॥
सायंकाल होते ही उसने उस वृक्ष पर अपने शब्दों से दिशाओं को मुखरित करनेवाले
बड़े-बड़े पक्षियों को देखा॥२६॥
बड़े-बड़े पंखों की वायु से समुद्र में लहर-सी उठाते हुए मीनों का उसने देखा जो मानों
परिचय और प्रेम के कारण उसे लेने के लिए आये हों॥२७॥
तदनन्तर उसने पत्रों की झुरमुट में छिपे हुए और शाखाओं में चिपके हुए एवं
मनुष्यों की वाणी में होनेवाले वार्त्तालापों को सुना॥२८॥
वहाँ जो उस दिन चरने गये थे उनमें से कोई किसी नवीन द्वीप का कोई पक्षी
किसी पर्वत का और कोई किसी दिशा का वर्णन कर रहा था ॥२९॥
उनमें से एक वृद्ध पक्षी ने कहा— आज मैं चरने के लिए कनकपुरी गया गया था।
प्रातःकाल फिर वहीं सुख से चरने के लिए जाऊँगा। व्यर्थ थकावट देनेवाले दूरदेश में जाने से क्या
काम ? ॥३०-३१॥
इस प्रकार सहसा अमृत के सार के समान उस पक्षी के वचन से शक्तिदेव का हृदय शान्त
हुआ और वह सोचने लगा॥३२॥
भाग्य से कनकपुरी का पता तो लगा किन्तु उसे प्राप्त करने के साधन-स्वरूप अब इस
पक्षी को वाहन बनाना है॥३३॥
वह ऐसा सोचकर और धीरे-धीरे चलकर सोये हुए उस वृद्ध पक्षी के पास पहुँचा और
उसके पंखों के अन्दर जाकर चिपक गया॥३४॥
प्रातःकाल होते ही अन्य पक्षियों के इधर उधर उड़ जाने पर दैव के समान पक्षपात
करता हुआ वह पक्षी भी कन्धे पर छिपे हुए शक्तिदेव को लेकर चरने के लिए क्षणभर में कनकपुरी
पहुँचा ॥३५ ३६॥
कनकपुरी के एक उद्यान में उतरकर उस पक्षी के बैठ जाने पर शक्तिदेव धीरे-से उसकी
पीठ से नीचे उतर आया॥३७॥
तत्पश्चात् वह उससे दूर हटकर उस उद्यान में घूमने लगा। घूमते हुए उसने पुष्प-चयन
में लगी हुई दो स्त्रियों को देखा॥३८॥
शक्तिदेव को देखकर चकित हुई उन स्त्रियों के समीप जाकर उसने पूछा— यह कौन
स्थान है और तुम लोगों कौन हो ? ॥३९॥
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